गहरे रंग के फल और सब्जियों, स्वास्थ्य के लिए काफी लाभप्रद होते हैं। दरअसल गहरे रंग के फल और सब्जियों में कैल्शियम और मैग्निश्यिम प्रचूर मात्रा में पाया जाता है। साग-सब्जी का सेवन ब्रोकली, सलाद पत्ता, पत्ता गोभी और दूसरी पत्ते दार सब्जियां कैल्शियम का अच्छा स्रोत हैं।चुकंदर खून को बढ़ाने का काम करता है। इसमें प्रचुर मात्रा में फोलिक एसिड, आयरन और कैल्शियम पाया जाता है। मूली में विटामिन सी, सोडियम और कैल्शियम पाया जाता है। सलाद में सिर्फ चुकंदर, टमाटर और खीरे ही नहीं होते। सलाद में आप सैकड़ों किस्म के फल और सब्जियों को मिला सकते है।आहार के अलावा शारीरिक मेहनत भी हड्डियों के विकास और उनकी ताकत को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है। सलाद खाना स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद होता है। सलाद में प्रचुर मात्रा में विटामिंस, फोलिक एसिड, कैल्शियम, मैग्नीशियम, आयरन और पोटेशियम जैसे पौष्टिक तत्व पाए जाते हैं। जो हमारे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली और हड्डियों को मजबूत रखती है।
Saturday, December 30, 2017
हड्डियों की मजबूती भी बढ़ाती है सलाद
गहरे रंग के फल और सब्जियों, स्वास्थ्य के लिए काफी लाभप्रद होते हैं। दरअसल गहरे रंग के फल और सब्जियों में कैल्शियम और मैग्निश्यिम प्रचूर मात्रा में पाया जाता है। साग-सब्जी का सेवन ब्रोकली, सलाद पत्ता, पत्ता गोभी और दूसरी पत्ते दार सब्जियां कैल्शियम का अच्छा स्रोत हैं।चुकंदर खून को बढ़ाने का काम करता है। इसमें प्रचुर मात्रा में फोलिक एसिड, आयरन और कैल्शियम पाया जाता है। मूली में विटामिन सी, सोडियम और कैल्शियम पाया जाता है। सलाद में सिर्फ चुकंदर, टमाटर और खीरे ही नहीं होते। सलाद में आप सैकड़ों किस्म के फल और सब्जियों को मिला सकते है।आहार के अलावा शारीरिक मेहनत भी हड्डियों के विकास और उनकी ताकत को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है। सलाद खाना स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद होता है। सलाद में प्रचुर मात्रा में विटामिंस, फोलिक एसिड, कैल्शियम, मैग्नीशियम, आयरन और पोटेशियम जैसे पौष्टिक तत्व पाए जाते हैं। जो हमारे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली और हड्डियों को मजबूत रखती है।
शुक्राणु कमी असर समस्या समाधान
पुरुषों के शरीर में शुक्राणुओं की कमी का सीधा असर महिलाओं पर पड़ता है। इससे महिलाओं में फर्टिलिटी की समस्या हो जाती है। जिस व्यक्ति में शुक्राणु कम होते हैं उसे बाप बनने में काफी परेशानी आती है। बदलते लाइफस्टाइल के कारण पुरुषों में यह समस्या आम देखने को मिलती है। इसके लिए कई तरह के इलाज भी मौजूद हैं। इसके अलावा कुछ ऐसे तरीके है जिन्हें अपनाकर पुरुषों में स्पर्म की मात्रा बढ़ाई जा सकती है। आइए जानते हैं इनके बारे में -

गुड़ का सेवन : रोज शाम को गुड खाएं, गुड गर्मी तो देता ही है साथ ही साथ आपका पुरुषत्व भी बढ़ता है।
रात को सोने से पहले शतावरी के चूर्ण में बराबर मात्रा में मिश्री मिला लें और गर्म दूध के साथ लें, शरीर हष्ट पुष्ट होता है और पावर आती है।
शकरकंद : स्वीट पोटैटो भी कहते है मतलब मीठा आलू, इसे उबाल कर या भून कर खाया जा सकता है इसमें मौजूद गजब के पौष्टिक तत्व शरीर को ताकत देते है यह शारीरिक कमजोरी दूर करने के लिए अच्छा स्त्रोत है।
गाजर का हलवा : रोज कम से कम ग्राम गाजर का हलवा खाने से भी मर्दानगी बढ़ती है और ताकत आती है।
शिलाजीत के फायदे तो आपको पता ही है तो फिर देर किस बात की रोज रात को दूध के साथ सेवन कीजिये, फर्क आपको इस सर्दी दिख जाएगा। पुरुषत्व बढ़ाने का असरदार तरीका है।
रात को गाय के दूध के साथ अश्वगंधा का चूर्ण भी मिश्री के साथ बराबर मिला कर ले सकते है निश्चित तौर पर २ महीने में फायदा होगा।
सूखे मेवे : काजू बादाम अखरोट पिस्ता किशमिश, इनका तो कोई मुकाबला नही, सर्दियों में रोज खाइये, शरीर पुष्ट और बलवान हो जाएगा।
सर्दियों में चुकंदर, आलू और बथुआ का प्रयोग सब्जियों में ज्यादा करें ये निश्चित तौर पर आपको ताकत प्रदान करते है।

गुड़ का सेवन : रोज शाम को गुड खाएं, गुड गर्मी तो देता ही है साथ ही साथ आपका पुरुषत्व भी बढ़ता है।
रात को सोने से पहले शतावरी के चूर्ण में बराबर मात्रा में मिश्री मिला लें और गर्म दूध के साथ लें, शरीर हष्ट पुष्ट होता है और पावर आती है।
शकरकंद : स्वीट पोटैटो भी कहते है मतलब मीठा आलू, इसे उबाल कर या भून कर खाया जा सकता है इसमें मौजूद गजब के पौष्टिक तत्व शरीर को ताकत देते है यह शारीरिक कमजोरी दूर करने के लिए अच्छा स्त्रोत है।
गाजर का हलवा : रोज कम से कम ग्राम गाजर का हलवा खाने से भी मर्दानगी बढ़ती है और ताकत आती है।
शिलाजीत के फायदे तो आपको पता ही है तो फिर देर किस बात की रोज रात को दूध के साथ सेवन कीजिये, फर्क आपको इस सर्दी दिख जाएगा। पुरुषत्व बढ़ाने का असरदार तरीका है।
रात को गाय के दूध के साथ अश्वगंधा का चूर्ण भी मिश्री के साथ बराबर मिला कर ले सकते है निश्चित तौर पर २ महीने में फायदा होगा।
सूखे मेवे : काजू बादाम अखरोट पिस्ता किशमिश, इनका तो कोई मुकाबला नही, सर्दियों में रोज खाइये, शरीर पुष्ट और बलवान हो जाएगा।
सर्दियों में चुकंदर, आलू और बथुआ का प्रयोग सब्जियों में ज्यादा करें ये निश्चित तौर पर आपको ताकत प्रदान करते है।
सागो का सरदार बथुवा
सागो का सरदार है बथुवा
सबसे अच्छा आहार है बथुवा
बथुवा अंग्रेजी में Lamb's Quarters, वैज्ञानिक नाम Chenopodium album.
साग और रायता बना कर बथुवा अनादि काल से खाया जाता रहा है लेकिन क्या आपको पता है कि विश्व की सबसे पुरानी महल बनाने की पुस्तक शिल्प शास्त्र में लिखा है कि हमारे बुजुर्ग अपने घरों को हरा रंग करने के लिए प्लस्तर में बथुवा मिलाते थे और हमारी बुढ़ियां सिर से ढेरे व फांस (डैंड्रफ) साफ करने के लिए बथुवै के पानी से बाल धोया करती।
बथुवा गुणों की खान है और भारत में ऐसी ऐसी जड़ी बूटियां हैं तभी तो मेरा भारत महान है।
बथुवै में क्या क्या है?? मतलब कौन कौन से विटामिन और मिनरल्स??
तो सुने, बथुवे में क्या नहीं है?? बथुवा विटामिन B1, B2, B3, B5, B6, B9 और विटामिन C से भरपूर है तथा बथुवे में कैल्शियम, लोहा, मैग्नीशियम, मैगनीज, फास्फोरस, पोटाशियम, सोडियम व जिंक आदि मिनरल्स हैं। 100 ग्राम कच्चे बथुवे यानि पत्तों में 7.3 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 4.2 ग्राम प्रोटीन व 4 ग्राम पोषक रेशे होते हैं। कुल मिलाकर 43 Kcal होती है।
जब बथुवा शीत (मट्ठा, लस्सी) या दही में मिला दिया जाता है तो यह किसी भी मांसाहार से ज्यादा प्रोटीन वाला व किसी भी अन्य खाद्य पदार्थ से ज्यादा सुपाच्य व पौष्टिक आहार बन जाता है और साथ में बाजरे या मक्का की रोटी, मक्खन व गुड़ की डळी हो तो इस खाने के लिए देवता भी तरसते हैं।
जब हम बीमार होते हैं तो आजकल डॉक्टर सबसे पहले विटामिन की गोली ही खाने की सलाह देते हैं ना??? गर्भवती महिला को खासतौर पर विटामिन बी, सी व लोहे की गोली बताई जाती है और बथुवे में वो सबकुछ है ही, कहने का मतलब है कि "बथुवा पहलवानो से लेकर गर्भवती महिलाओं तक, बच्चों से लेकर बूढों तक, सबके लिए अमृत समान है"।
यह साग प्रतिदिन खाने से गुर्दों में पथरी नहीं होती। बथुआ आमाशय को बलवान बनाता है, गर्मी से बढ़े हुए यकृत को ठीक करता है। बथुए के साग का सही मात्रा में सेवन किया जाए तो निरोग रहने के लिए सबसे उत्तम औषधि है। बथुए का सेवन कम से कम मसाले डालकर करें। नमक न मिलाएँ तो अच्छा है, यदि स्वाद के लिए मिलाना पड़े तो काला नमक मिलाएँ और देशी गाय के घी से छौंक लगाएँ। बथुए का उबाला हुआ पानी अच्छा लगता है तथा दही में बनाया हुआ रायता स्वादिष्ट होता है। किसी भी तरह बथुआ नित्य सेवन करें। बथुवे में जिंक होता है जो कि शुक्राणुवर्धक है मतलब किसी भाई को जिस्मानी कमजोरी हो तो उसकॅ भी दूर कर दे बथुवा।
बथुवा कब्ज दूर करता है और अगर पेट साफ रहेगा तो कोइ भी बीमारी शरीर में लगेगी ही नहीं, ताकत और स्फूर्ति बनी रहेगी।
कहने का मतलब है कि जब तक इस मौसम में बथुए का साग मिलता रहे, नित्य इसकी सब्जी खाएँ। बथुए का रस, उबाला हुआ पानी पीएँ और तो और यह खराब लीवर को भी ठीक कर देता है।
पथरी हो तो एक गिलास कच्चे बथुए के रस में शकर मिलाकर नित्य पिएँ तो पथरी टूटकर बाहर निकल आएगी।
मासिक धर्म रुका हुआ हो तो दो चम्मच बथुए के बीज एक गिलास पानी में उबालें । आधा रहने पर छानकर पी जाएँ। मासिक धर्म खुलकर साफ आएगा। आँखों में सूजन, लाली हो तो प्रतिदिन बथुए की सब्जी खाएँ।
पेशाब के रोगी बथुआ आधा किलो, पानी तीन गिलास, दोनों को उबालें और फिर पानी छान लें । बथुए को निचोड़कर पानी निकालकर यह भी छाने हुए पानी में मिला लें। स्वाद के लिए नींबू जीरा, जरा सी काली मिर्च और काला नमक लें और पी जाएँ।
"आप ने अपने दादा दादी से ये कहते जरूर सुना होगा कि हमने तो सारी उम्र अंग्रेजी दवा की एक गोली भी नहीं ली। उनके स्वास्थ्य व ताकत का राज यही बथुवा ही है"।
मकान को रंगने से लेकर खाने व दवाई तक बथुवा काम आता है और हाँ सिर के बाल ...... क्या करेंगे शम्पू इसके आगे।
लेकिन अफसोस , हम किसान ये बातें भूलते जा रहे हैं और इस दिव्य पौधे को नष्ट करने के लिए अपने अपने खेतों में जहर डालते हैं।
तथाकथित कृषि वैज्ञानिकों (अंग्रेज व काळे अंग्रेज) ने बथुवै को भी कोंधरा, चौळाई, सांठी, भाँखड़ी आदि सैकड़ों आयुर्वेदिक औषधियों को खरपतवार की श्रेणी में डाल दिया और हम भारतीय चूं भी ना कर पाये।
और पढ़ लो अंग्रेजी और बन जाओ अंग्रेज, सुनो भाई जो ना सुधरे तो एक दिन इस जहर से कैंसर जैसी बीमारी हम सबको मारेगी क्योंकि हम इस स्वर्ग जैसी जमीन मे जहर डाल के नरक बनाने मे लगे हैं।
सबसे अच्छा आहार है बथुवा
बथुवा अंग्रेजी में Lamb's Quarters, वैज्ञानिक नाम Chenopodium album.
साग और रायता बना कर बथुवा अनादि काल से खाया जाता रहा है लेकिन क्या आपको पता है कि विश्व की सबसे पुरानी महल बनाने की पुस्तक शिल्प शास्त्र में लिखा है कि हमारे बुजुर्ग अपने घरों को हरा रंग करने के लिए प्लस्तर में बथुवा मिलाते थे और हमारी बुढ़ियां सिर से ढेरे व फांस (डैंड्रफ) साफ करने के लिए बथुवै के पानी से बाल धोया करती।
बथुवा गुणों की खान है और भारत में ऐसी ऐसी जड़ी बूटियां हैं तभी तो मेरा भारत महान है।
बथुवै में क्या क्या है?? मतलब कौन कौन से विटामिन और मिनरल्स??
तो सुने, बथुवे में क्या नहीं है?? बथुवा विटामिन B1, B2, B3, B5, B6, B9 और विटामिन C से भरपूर है तथा बथुवे में कैल्शियम, लोहा, मैग्नीशियम, मैगनीज, फास्फोरस, पोटाशियम, सोडियम व जिंक आदि मिनरल्स हैं। 100 ग्राम कच्चे बथुवे यानि पत्तों में 7.3 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 4.2 ग्राम प्रोटीन व 4 ग्राम पोषक रेशे होते हैं। कुल मिलाकर 43 Kcal होती है।
जब बथुवा शीत (मट्ठा, लस्सी) या दही में मिला दिया जाता है तो यह किसी भी मांसाहार से ज्यादा प्रोटीन वाला व किसी भी अन्य खाद्य पदार्थ से ज्यादा सुपाच्य व पौष्टिक आहार बन जाता है और साथ में बाजरे या मक्का की रोटी, मक्खन व गुड़ की डळी हो तो इस खाने के लिए देवता भी तरसते हैं।
जब हम बीमार होते हैं तो आजकल डॉक्टर सबसे पहले विटामिन की गोली ही खाने की सलाह देते हैं ना??? गर्भवती महिला को खासतौर पर विटामिन बी, सी व लोहे की गोली बताई जाती है और बथुवे में वो सबकुछ है ही, कहने का मतलब है कि "बथुवा पहलवानो से लेकर गर्भवती महिलाओं तक, बच्चों से लेकर बूढों तक, सबके लिए अमृत समान है"।
यह साग प्रतिदिन खाने से गुर्दों में पथरी नहीं होती। बथुआ आमाशय को बलवान बनाता है, गर्मी से बढ़े हुए यकृत को ठीक करता है। बथुए के साग का सही मात्रा में सेवन किया जाए तो निरोग रहने के लिए सबसे उत्तम औषधि है। बथुए का सेवन कम से कम मसाले डालकर करें। नमक न मिलाएँ तो अच्छा है, यदि स्वाद के लिए मिलाना पड़े तो काला नमक मिलाएँ और देशी गाय के घी से छौंक लगाएँ। बथुए का उबाला हुआ पानी अच्छा लगता है तथा दही में बनाया हुआ रायता स्वादिष्ट होता है। किसी भी तरह बथुआ नित्य सेवन करें। बथुवे में जिंक होता है जो कि शुक्राणुवर्धक है मतलब किसी भाई को जिस्मानी कमजोरी हो तो उसकॅ भी दूर कर दे बथुवा।
बथुवा कब्ज दूर करता है और अगर पेट साफ रहेगा तो कोइ भी बीमारी शरीर में लगेगी ही नहीं, ताकत और स्फूर्ति बनी रहेगी।
कहने का मतलब है कि जब तक इस मौसम में बथुए का साग मिलता रहे, नित्य इसकी सब्जी खाएँ। बथुए का रस, उबाला हुआ पानी पीएँ और तो और यह खराब लीवर को भी ठीक कर देता है।
पथरी हो तो एक गिलास कच्चे बथुए के रस में शकर मिलाकर नित्य पिएँ तो पथरी टूटकर बाहर निकल आएगी।
मासिक धर्म रुका हुआ हो तो दो चम्मच बथुए के बीज एक गिलास पानी में उबालें । आधा रहने पर छानकर पी जाएँ। मासिक धर्म खुलकर साफ आएगा। आँखों में सूजन, लाली हो तो प्रतिदिन बथुए की सब्जी खाएँ।
पेशाब के रोगी बथुआ आधा किलो, पानी तीन गिलास, दोनों को उबालें और फिर पानी छान लें । बथुए को निचोड़कर पानी निकालकर यह भी छाने हुए पानी में मिला लें। स्वाद के लिए नींबू जीरा, जरा सी काली मिर्च और काला नमक लें और पी जाएँ।
"आप ने अपने दादा दादी से ये कहते जरूर सुना होगा कि हमने तो सारी उम्र अंग्रेजी दवा की एक गोली भी नहीं ली। उनके स्वास्थ्य व ताकत का राज यही बथुवा ही है"।
मकान को रंगने से लेकर खाने व दवाई तक बथुवा काम आता है और हाँ सिर के बाल ...... क्या करेंगे शम्पू इसके आगे।
लेकिन अफसोस , हम किसान ये बातें भूलते जा रहे हैं और इस दिव्य पौधे को नष्ट करने के लिए अपने अपने खेतों में जहर डालते हैं।
तथाकथित कृषि वैज्ञानिकों (अंग्रेज व काळे अंग्रेज) ने बथुवै को भी कोंधरा, चौळाई, सांठी, भाँखड़ी आदि सैकड़ों आयुर्वेदिक औषधियों को खरपतवार की श्रेणी में डाल दिया और हम भारतीय चूं भी ना कर पाये।
और पढ़ लो अंग्रेजी और बन जाओ अंग्रेज, सुनो भाई जो ना सुधरे तो एक दिन इस जहर से कैंसर जैसी बीमारी हम सबको मारेगी क्योंकि हम इस स्वर्ग जैसी जमीन मे जहर डाल के नरक बनाने मे लगे हैं।
सुबह खाली पेट भीगे हुए बादाम खाने से फ़ायदे
बादाम खाने से इंसान की दिल को ताकत मिलती है यह आपके दिल को हमेशा सेहतमंद बनाए रखता है | कई शोधों में यह पता चला है कि सप्ताह में 5 दिन बदाम का सेवन करने से लोगों का 50 फ़ीसदी हार्टअटैक का खतरा कम होता है |
रक्त की शुद्धि को बढ़ाता है बादाम में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है और साथ ही सोडियम भी पाया जाता है, इससे हमारे शरीर में रक्त संचार बना रहता है, रक्त संचार होने से हमारे शरीर में ऑक्सीजन सही प्रकार से पहुंचती रहती है
हड्डियों को मजबूत बनाता है आप सभी जानते हैं कि बादाम में कैल्शियम की मात्रा भरपूर पाई जाती है और यह हड्डियों के लिए बहुत ही फायदेमंद साबित होता है
याददाश्त बढ़ाने के लिए बदाम का सेवन करना सबसे ज्यादा फायदेमंद होता है यदि आप रोजाना रात को 5 बादाम पानी में भिगोकर रख दें, और सुबह उठकर खाली पेट इनका छिलका निकाल कर खा ले ,ऊपर से एक गिलास दूध पी ले तो आपकी याददाश्त तेज हो जाएगी और आप दिमाग की अन्य बीमारियों से सुरक्षित भी रहेगे।।
रक्त की शुद्धि को बढ़ाता है बादाम में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है और साथ ही सोडियम भी पाया जाता है, इससे हमारे शरीर में रक्त संचार बना रहता है, रक्त संचार होने से हमारे शरीर में ऑक्सीजन सही प्रकार से पहुंचती रहती है
हड्डियों को मजबूत बनाता है आप सभी जानते हैं कि बादाम में कैल्शियम की मात्रा भरपूर पाई जाती है और यह हड्डियों के लिए बहुत ही फायदेमंद साबित होता है
याददाश्त बढ़ाने के लिए बदाम का सेवन करना सबसे ज्यादा फायदेमंद होता है यदि आप रोजाना रात को 5 बादाम पानी में भिगोकर रख दें, और सुबह उठकर खाली पेट इनका छिलका निकाल कर खा ले ,ऊपर से एक गिलास दूध पी ले तो आपकी याददाश्त तेज हो जाएगी और आप दिमाग की अन्य बीमारियों से सुरक्षित भी रहेगे।।
Sunday, December 24, 2017
अमीर आयुर्वेद व गरीब ऐलोपैथ में अंतर!!
(विषय को समझाने के लिए लेख थोड़ा लम्बा हो गया है, लेकिन जनहित में यह निश्चित रूप से कारगर है, अवश्य पढ़ें व अधिक से अधिक लोगों में प्रसारित करें!)
यह हैडिंग पढ़कर कई लोग सोच रहें होंगे यह क्या बात लिख दी गई है!! लेकिन वर्तमान समय की यही सबसे बड़ी सच्चाई है कि औषध चिकित्सा के मामले में ऐलोपैथ बिल्कुल असहाय, निरीह व गरीब सा नज़र आ रहा है, वहीँ आयुर्वेद अपने प्राकृतिक सिद्धांतो के कारण प्रभावकारी, समृद्ध व अमीर सा नज़र आता है।
इस उदाहरण से आयुर्वेद की अमीरता को और अच्छे से समझते हैं:
एक 40 वर्षीय पुरुष रोगी ऐलोपैथ डॉक्टर के पास: सर मुझे कमर में कई दिनों से असहनीय दर्द हो रहा है, कई बार यह दर्द पैरो की तरफ जाता है जिससे चलने में परेशानी होती है, इसके अलावा गर्दन में भी दर्द रहता है जो कन्धों की ओर बढ़ता हुआ आ रहा है, हाथ-पैरों में जकड़न रहती है, थकान-कमजोरी भी रहती है। मेरा कार्य ऑफिस में कंप्यूटर पर बैठने का है, वजन लगभग 85 किलो है।
ऐलोपैथ डॉक्टर: रोगी का बी. पी. चेक करने के बाद, आपका बी.पी. 130/90 आया है, वैसे तो यह लगभग नार्मल है, आप एक काम करिये अभी दर्द के लिए एक दवा लिख दी है आप एक-दो दिन इसे खा लीजिये, साथ में कुछ बहुत जरुरी टेस्ट लिखे हैं इनको करवा के मुझसे मिलिए।
टेस्ट का नाम: CBC, RBS, Uric Acid, Lipid profile, Vitamin- D3, Urine- R/M, X-Ray Cervical Spine and C.T. Scan-Lumbar Spine
रोगी: ठीक है सर, टेस्ट काफी सारे लिखे हैं।
ऐलोपैथ डॉक्टर: हाँ, आपकी दिक्कत को सही से समझने के लिए सभी जरुरी हैं।
रोगी: सुबह खाली पेट, बड़ी सी लैब के बाहर लाइन लगाकर खड़ा होकर अपनी बारी का इंतज़ार करने लगा, वहाँ पहुंचने पर उसे यह पता चला जो टेस्ट उसे लिखे गए हैं उनकी जो कुल कीमत है उसमें सिर्फ 500 रूपए ज्यादा देने पर उसके लगभग 40 तरह की जांचों को भी पैकेज में कर दिया जायेगा।
रोगी को लगा चलो अच्छा ऑफर है, इसे भी करवा लेते हैं शायद उसमे कुछ और पता लग जाये।
टेस्ट रिपोर्ट आने के बाद: Vitamin- D3 थोड़ा कम आया, कोलेस्ट्रॉल बॉर्डर लाइन से थोड़ा बढ़ा हुआ आया, बाकी की रिपोर्ट्स नार्मल थीं, X - Ray Cervical Spine and C.T. Scan-Lumbar Spine में Degenerative Changes मिले (जो कि प्रत्येक व्यक्ति में उम्र के हिसाब से स्वाभाविक हैं)
रोगी सभी टेस्ट रिपोर्ट्स को इक्कठा करके अपने ऐलोपैथ डॉक्टर साहब के यहाँ अपनी ऑफिस से छुट्टी लेकर बड़ी टेंशन में पहुंचा। टेंशन के चलते घबराहट बहुत थी, डॉक्टर साहब ने बी.पी. चेक की तो 160/100 निकली।
डॉक्टर साहब ने कहा: जैसा मैंने सोचा था लगभग वैसा ही निकला आपका Vitamin-D3 कम है और कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ है, बी.पी. भी बढ़ी हुई है, साथ में X - Ray, C.T. Scan में Arthritis के लक्षण हैं, आप हमारे यहाँ अपनी ECG और करवा लीजिये फिर मैं देखता हूँ क्या करना है।
मरीज़ भगवान को याद करते हुए अपना ECG करवाता है, ECG करवाने के बाद, ECG करने वाले से पूछता है कि भाई कुछ दिक्कत तो नहीं है इसमें?? ECG करने वाला कहता है की सर यह तो डॉक्टर साहब ही बताएँगे, आप यह ECG की रिपोर्ट लीजिये और डॉक्टर साहब के रूम के बाहर बैठकर अपने नंबर का इंतज़ार करिये।
मरीज़ अपने नंबर का इंतज़ार करते व बढ़ते हुए सस्पेंस के साथ आखिरकार दोबारा डॉक्टर साहब के कमरे में पहुँचता है।
ऐलोपैथ डॉक्टर: ECG देखते हुए, आपकी ECG से कुछ बेहतर समझ नहीं आ रहा, आपके परिवार में किसी को बी.पी. की शिकायत तो नहीं?
मरीज़: हाँ सर मेरे मम्मी-पापा दोनों को ही बी.पी. की शिकायत हैं।
ऐलोपैथ डॉक्टर: ठीक है, जितना जल्दी हो सके ECHO की जांच करवा लेना बाकी आपको बी.पी., कोलेस्ट्रॉल, Vitamin D3, ताकत व दर्द की कुछ दवाइयां लिख रहा हूँ इनको लीजिये, दर्द वाली जगह के लिए एक Ointment भी लिखा है इसकी मालिश करिये, ठंडी चीज़ों का परहेज करिये, थोड़ा exercise करना शुरू करिये, गर्दन के दर्द के लिए एक cervical pillow ले लीजिये, बाहर हमारी Dietitian बैठी हुई है उससे अपना Diet Chart बनवा लीजिये, ECHO करवा के मुझसे दोबारा मिलिए, तब तक यह दवाएं खाइये। मरीज़ डॉक्टर से, सर कोई घबराने की बात तो नहीं है?
डॉक्टर साहब: नहीं ऐसा तो कुछ विशेष नहीं है, ECHO जब हो जाये तो उसे भी दिखाना, बी.पी. की दवा कभी बंद नहीं होगी, बाकी की दवाओं का देखेंगे की आगे क्या करना है।
रोगी डॉक्टर साहब के कमरे से निकलकर dietitian के पास पहुँचता है, वह छोटे-मोटे परहेज़ बताती है, रोगी धीरे से Dietitian से पूंछता है, कभी-कभी Alcohol व Non-Veg ले लेता हूँ, इनको ले सकता हूँ, Dietitian मुस्कुराते हुए, Alcohol कम लेना सर, और Non-veg में Red meat नहीं लेना बाकी थोड़ा-बहुत ले सकते हैं (रोगी मन ही मन सोचते हुए की चलो कम से कम यह बंद करने को नहीं कहा)
रोगी ने ट्रीटमेंट शुरू कर दिया, समय निकालकर ECHO भी करवा लिया, वह नार्मल आया, डॉक्टर साहब से मिलकर थोड़ा निश्चिंत भी हो गया, दवाएं खाते हुए 1 महीना हो गया, चीज़ों में थोड़ा आराम मिला, बी. पी. नार्मल, कोलेस्ट्रॉल नार्मल, Vitamin D3 थोड़ा बढ़ गया, वजन भी इस बीच में 3 किलो और बढ़ गया, डॉक्टर साहब ने सभी दवाएं continue खाने को कहीं, दर्द की दवा को जरुरत होने पर खाने को कहा, रोगी फिर से दवाएं 1 महीने खाता है, लेकिन जब भी दर्द की दवा या ताकत की दवा नहीं लेता तो दर्द और कमजोरी फिर वैसी ही हो जाती है, फिर से डॉक्टर साहब को अपनी परेशानी बताता है, इसके साथ-साथ रोगी को अब एक और नई परेशानी हो जाती है कि अब उसे कब्ज भी रहने लगती है और कभी-कभी एसिडिटी भी बहुत बढ़ जाती है, घुटनो में भी अब दर्द होने लगा है।
ऐलोपैथ डॉक्टर: मैं आपकी दर्द की दवा में बदलाव कर रहा हूँ यह थोड़ा कम नुकसान करेगी इसे आप रेगुलर खा सकते हैं, साथ में पेट साफ़ के लिए एक दवा और लिख दी है इसे रात में सोते समय आप खाना, और सुबह खाली पेट की एक छोटी सी दवा और है इससे आपको एसिडिटी बिल्कुल नहीं होगी।
बीच में रोगी को फिर से दर्द असहनीय होने पर डॉक्टर साहब से मिलना पड़ा, इस बार डॉक्टर साहब ने रोगी को फिजियोथेरेपी करवाने की सलाह दी, रोगी ने कुछ दिन लगातार इसे भी करवाया लेकिन कोई विशेष लाभ नहीं मिला, ऐसा ही अगले 3-4 महीने चलता है रोगी जब दवा खाता है तो आराम, नहीं खाता तो फिर से वही परेशानी, अपने ऐलोपैथ डॉक्टर के पास जाकर रोगी यह परेशानी बताता है, डॉक्टर साहब कहते हैं कि चलने दीजिये, यह दवाएं तो आपको खानी होंगी, थोड़ा वजन कम करिये तो अच्छा फायदा हो सकता है।
आखिरकार रोगी को लगता है कि इस बड़े से सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के बड़े से सुपर स्पेशिलिस्ट डॉक्टर साहब के अलावा के विकल्पों को तलाशा जाये, अपने जानने वालों, अपनी ओर से नेट आदि पर सर्च करने के बाद उसे लगता है कि आयुर्वेद में ट्रीटमेंट कराया जाये।
रोगी आयुर्वेद डॉक्टर के पास जाता है: शुरू से अंत तक अपनी जानकारी आयुर्वेद डॉक्टर को देता है, डॉक्टर साहब से पूछता है कि सर मेरी दिक्कत सही क्यों नहीं हो रही टेस्ट में जो आ रहा है वह कुछ दिनों की दवाओं को खाने के बाद ठीक तो होता है लेकिन जैसे ही दवाएं बंद करता हूँ तो स्थिति फिर से वैसी हो जाती है।
आयुर्वेद डॉक्टर: आप जिस ऑफिस में रहते हैं वहां A.C. है, चाय कितना पीते हैं?
मरीज़ बड़े उत्साह से: हाँ सर मेरे ऑफिस और घर दोनों जगह A.C. है, चाय ऑफिस में रहने की वजह से 3-4 या कभी-कभी इससे भी ज्यादा हो जाती हैं, डॉक्टर साहब मेरी दिक्कत क्या है? क्या आप इसे बता सकते हैं? क्या आप इसे सही कर सकते हैं?
आयुर्वेद डॉक्टर: थोड़ा सा मुस्कुराते हुए, जी मैं आपको सबसे पहले आपकी दिक्कत को समझाता हूँ, आप समझ सकेंगे कि दिक्कत क्या है और इस दिक्कत का उपचार हमारे पास न होकर आपके पास ही है।
आयुर्वेद डॉक्टर की यह बात सुनकर मरीज़ थोड़ा चकराता है और अपनी समस्या का उपचार खुद से ही समझने के लिए और उत्सुक हो जाता है।
आयुर्वेद डॉक्टर: आपकी समस्या से जुडी दिक्कत के विषय में आपको समझाता हूँ, आप सबसे पहले हमारे शरीर के कार्य करने के तरीके को समझिये, हमारे शरीर में Blood एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमता है, हम कुछ खाते हैं तो हम उसे गले तक तो पहुंचा देते हैं लेकिन वह अपने आप फिर पेट में जाता है, आंतो में जाता है, हमारे शरीर से मल बनकर शरीर के बाहर भी आता है, कहने का मतलब यह है कि हमारे शरीर में प्राकृतिक रूप से एक वायु मौजूद रहती है जो हमारे शरीर के अंदर की प्रत्येक गति को नियंत्रित करती है, इसी तरह हम सांस लेते हैं वह भी एक तरह की वायु है, आयुर्वेद में हम इसे “वात” कहते हैं।
ठीक ऐसे ही हमारे सभी के शरीर में टॉक्सिन्स (दूषित चीज़ें) बनते हैं जैसे पसीना-यूरिन-मल लेकिन कई बार हम अपने खाने-पीने या रहने की आदतों में बदलाव कर लेते हैं जिससे यह मल शरीर से सही से बाहर नहीं आ पाते, जैसे आप ज्यादा समय A.C. में रहते हैं जिससे आपको पसीना नहीं आता, Non-veg खाते हैं, Alcohol पीते हैं, अधिक चाय पीते हैं, देर से पचने वाले खान-पान या तली-भुनी चीज़ों को अधिक खाते हैं, लगातार काम में बिजी रहने की वजह से Physical Activity कम करते हैं, शाम को खाना अधिक खाते है और उसके तुरंत बाद सो जाते हैं, इन सभी कारणों से शरीर में दूषित चीज़ें बढ़ जाती हैं, जो शरीर में रहने वाली वायु की वजह से एक जगह से दूसरी जगह पहुँच जाती हैं, जिससे शरीर में दर्द रहना-जकड़न रहना सूजन रहना आदि दिक्कत हो जाती है, आयुर्वेद में हम इसे "आम" कहते हैं।
ऐसे ही हमारी पृथ्वी पर Gravity (गरूत्वाकर्षण) मौजूद है, जिसकी वजह से कोई भी चीज़ ऊपर से नीचे की ओर आती है, शरीर में भी यह सिद्धांत लागू होता है, आयुर्वेद में भी वात की गति को ऊपर से नीचे की ओर माना गया है, इसे आयुर्वेद की भाषा में “वात की अनुलोम गति” कहते हैं, लेकिन जब शरीर में रूखी चीज़े और गरिष्ठ चीज़ें लगातार पहुँचती हैं तो शरीर में भी रुखापन बढ़ जाता है, जिससे वात की गति नीचे न जाकर ऊपर को हो जाती है इसे आयुर्वेद में “वात की प्रतिलोम गति” माना गया है जो बीमारियों को बढाती है, आप खान-पान तो गलत कर ही रहें हैं साथ में केमिकल वाली दवाओं के लेते रहने से यह रूखापन और बढ़ गया है इसलिए ही आपको कब्ज और एसिडिटी बढ़ी है।
अब आपको करना यह है की आपको अपने खाने-पीने में बदलाव करना है, अपनी दिनचर्या में बदलाव करना है आयुर्वेद में हम इसे "निदान परिवर्जन" कहते हैं, अनावश्यक तनाव से बचना है, साथ में आयुर्वेद की कुछ वात को अनुलोम करने वाली दवायें, टॉक्सिन्स (आम) को निकालने व शमन करने वाली दवाओं का सेवन करने से आप स्वस्थ हो सकते हैं, इसलिए आरम्भ में मैंने आपसे कहा था कि इस समस्या का उपचार आपके हाथ में है।
आयुर्वेद चिकित्सक के द्वारा समझाई गई इस प्राकृतिक थ्योरी रोगी को समझ में भी आयी और उसने आयुर्वेद डॉक्टर के बताये अनुसार निदान परिवर्जन व आयुर्वेद चिकित्सा आरम्भ की सिर्फ 2 माह में लाभ हुआ और कुछ माह दवाओं और परहेज के बाद आयुर्वेद दवायें भी बंद कर सके।
(यह स्टोरी किसी व्यक्ति विशेष, किसी चिकित्सा पद्धति आदि को नीचा दिखाने के उद्देश्य से नहीं बताई है, इसका उद्देश्य वर्तमान समय में ऐलोपैथ जगत के चिकित्सा करने के तरीके, चलन और आयुर्वेद के प्राकृतिक सिद्धांत के द्वारा मिल रहे हज़ारों रोगियों के लाभ पर आधारित अनुभवों पर लिखी है, जिसका मकसद सही जागरूकता प्रसारित करना व यह बताना है कि जब तक शरीर में होने वाली समस्याओं का प्राकृतिक तरीके से समाधान नहीं किया जायेगा तब तक रोग में लाभ नहीं मिलता। प्रकृति के नियमों के विपरीत चिकित्सा करने से कुछ स्थितियों में अल्पकालिक लाभ तो मिल सकता है लेकिन स्थाई समाधान कभी नहीं, इसलिए प्रकृति की ओर मुड़ें व अधिक से अधिक लोगों को इस विषय पर जागरूक करें, क्योंकि स्वस्थ व्यक्ति ही बेहतर भविष्य का निर्माण कर सकता है। प्राकृतिक संसाधनों व सिद्धांतो से विहीन चिकित्सा को गरीब कहना हितकर है। आयुर्वेद के चिकित्सकों के पास यह अवसर है की वे आयुर्वेद के जीवन शास्त्र को समाज में सही तरह से प्रसारित करें!) (आयुर्वेदाचार्य)
सही जागरूकता के लिए अधिक से अधिक लोगों तक इस पोस्ट को प्रसारित करें!!
मोतियाबिंद/cataract का आयुर्वेदिक इलाज व बचाव के उपाय
मोतियाबिंद/cataract
मोतियाबिंद एक आम समस्या बनता जा रहा है, अब तो युवा भी इस रोग के शिकार होने लगे हैं। अगर इस रोग का समय रहते इलाज न किया जाए तो रोगी अंधेपन का शिकार हो जाता है।
मोतियाबिंद दो प्रकार का होता है।
1.nuclear cataract. 2.cortical cataract.
उक्त दोनो तरह के मोतियाबिंद बनने से रोकने के लिये विटामिन ए तथा बी काम्प्प्लेक्स का दीर्घावधि तक उपयोग करने की सलाह दी जाती है। अगर मोतियाबिंद प्रारंभिक हालत में है तो रोक लगेगी।
कारण : मोतियाबिंद रोग कई कारणों से होता है। आंखों में लंबे समय तक सूजन बने रहना, जन्मजात सूजन होना, आंख की संरचना में कोई कमी होना, आंख में चोट लग जाना, चोट लगने पर लंबे समय तक घाव बना रहना, कनीनिका में जख्म बन जाना, दूर की चीजें धूमिल नजर आना या सब्ज मोतिया रोग होना, आंख के परदे का किसी कारणवश अलग हो जाना, कोई गम्भीर दृष्टि दोष होना, लंबे समय तक तेज रोशनी या तेज गर्मी में कार्य करना, डायबिटीज होना, गठिया होना, धमनी रोग होना, गुर्दे में जलन का होना, अत्याधिक कुनैन का सेवन, खूनी बवासीर का रक्त स्राव अचानक बंद हो जाना आदि समस्याएँ मोतियातिबिंद को जन्म दे सकती हैं।
मोतियाबिंद का आयुर्वेदिक इलाज
रक्त मोतियाबिंद में सभी चीजें लाल, हरी, काली, पीली और सफेद नजर आती हैं। परिम्लामिन मोतियाबिंद में सभी ओर पीला-पीला नजर आता है। ऐसा लगता है जैसे कि पेड़-पौधों में आग लग गई हो।
सभी प्रकार के मोतियाबिंद में आंखों के आस-पास की स्थिति भी अलग-अलग होती है। वातज मोतियाबिंद में आंखों की पुतली लालिमायुक्त, चंचल और कठोर होती है। पित्तज मोतियाबिंद में आंख की पुतली कांसे के समान पीलापन लिए होती है। कफज मोतियाबिंद में आंख की पुतली सफेद और चिकनी होती है या शंख की तरह सफेद खूँटों से युक्त व चंचल होती है। सन्निपात के मोतियाबिंद में आंख की पुतली मूंगे या पद्म पत्र के समान तथा उक्त सभी के मिश्रित लक्षणों वाली होती है। परिम्लामिन में आंख की पुतली भद्दे रंग के कांच के समान, पीली व लाल सी, मैली, रूखी और नीलापन लिए होती है।
आंखों में लगाने वाली औषधियाँ-
त्रिफला के जल से आंखें धोना:
आयुर्वेद में हरड़ , बहेड़ा और आंवला– इन तीनों को त्रिफला कहते हैं । यह त्रिदोषनाशक है अर्थात् वात, पित्त, कफ इन तीनों दोषों के कुपित होने से जो रोग उत्पन्न होते हैं उन सबको दूर करने वाला है । मस्तिष्क सम्बन्धी तथा उदर रोगों को दूर भगाता है तथा इन्हें शक्ति प्रदान करता है । सभी ज्ञानेन्द्रियों के लिये लाभदायक तथा शक्तिप्रद है । विशेषतया चक्षुरोग के लिये तो रामबाण है । कभी-कभी स्वस्थ मनुष्यों को भी त्रिफला के जल से अपने नेत्र धोते रहना चाहिये । नेत्रों के लिए अत्यन्त लाभदायक है । कभी-कभी त्रिफला की सब्जी खाना भी हितकर है ।
धोने की विधि
त्रिफला को जौ से समान (यवकुट) कूट लो और रात्रि के समय किसी मिट्टी, शीशे या चीनी के पात्र में शुद्ध जल में भिगो दो । दो चम्मच त्रिफला को 250 ml शुद्ध जल में भिगोऐं। प्रातःकाल पानी को ऊपर से नितारकर छान लो । उस जल से नेत्रों को खूब छींटे लगाकर धोयें। सारे जल का उपयोग एक बार के धोने में ही करो।
दूसरा तरीका है आंख धोने के कप का प्रयोग करें। इससे निरन्तर धोने से आंखों की उष्णता, रोहे, खुजली, लाली, जाला, मोतियाबिन्द आदि सभी रोगों का नाश होता है । आंखों की पीड़ा (दुखना) दूर होती है, आंखों की ज्योति बढ़ती है । शेष नीचे बचे हुए गीले त्रिफला को सिर पर रगड़ने से लाभ होता है ।
त्रिफला की टिकिया
(१) त्रिफला को जल के साथ पीसकर टिकिया बनायें और आंखों पर रखकर पट्टी बांध दें । इससे तीनों दोषों से दुखती हुई आंखें ठीक हो जाती हैं ।
(२) हरड़ की गिरी (बीज) को जल के साथ निरन्तर आठ दिन तक खरल करो । इसको नेत्रों में डालते रहने से मोतियाबिन्द रुक जाता है । यह रोग के आरम्भ में अच्छा लाभ करता है ।
मोतियाबिंद की शुरुआती अवस्था में भीमसेनी कपूर स्त्री के दूध में घिसकर नित्य लगाने पर यह ठीक हो जाता है।
हल्के बड़े मोती का चूरा 3 ग्राम और काला सुरमा 12 ग्राम लेकर खूब घोंटें। जब अच्छी तरह घुट जाए तो एक साफ शीशी में रख लें और रोज सोते वक्त अंजन की तरह आंखों में लगाएं। इससे मोतियाबिंद अवश्य ही दूर हो जाता है।
छोटी पीपल, लाहौरी नमक, समुद्री फेन और काली मिर्च सभी 10-10 gm लें। इसे 200 gm काले सुरमा के साथ 500 ml गुलाब अर्क या सौंफ अर्क में इस प्रकार घोटें कि सारा अर्क उसमें सोख लें। अब इसे रोजाना आंखों में लगाएं।
10 gm गिलोय का रस, 1 gm शहद, 1gm सेंधा नमक सभी को बारीक पीसकर रख लें। इसे रोजाना आंखों में अंजन की तरह प्रयोग करने से मोतियाबिंद दूर होता है।
मोतियाबिंद में उक्त में से कोई भी एक औषधि आंख में लगाने से सभी प्रकार का मोतियाबिंद धीरे-धीरे दूर हो जाता है।
सभी औषधियां परीक्षित हैं।
नेत्र रोगों में कुदरती पदार्थों से ईलाज करना फ़ायदेमंद रहता है। मोतियाबिंद बढती उम्र के साथ अपना तालमेल बिठा लेता है। अधिमंथ बहुत ही खतरनाक रोग है जो बहुधा आंख को नष्ट कर देता है। आंखों की कई बीमारियों में नीचे लिखे सरल उपाय करने हितकारी सिद्ध होंगे-
१) सौंफ़ नेत्रों के लिये हितकर है। मोतियाबिंद रोकने के लिये इसका पावडर बनालें। एक बडा चम्मच भर सुबह शाम पानी के साथ लेते रहें। नजर की कमजोरी वाले भी यह उपाय करें।
२) विटामिन ए नेत्रों के लिये अत्यंत फ़ायदेमंद होता है। इसे भोजन के माध्यम से ग्रहण करना उत्तम रहता है। गाजर में भरपूर बीटा केरोटिन पाया जाता है जो विटामिन ए का अच्छा स्रोत है। गाजर कच्ची खाएं और जिनके दांत न हों वे इसका रस पीयें। २०० ml रस दिन में दो बार लेना हितकर माना गया है। इससे आंखों की रोशनी भी बढेगी। मोतियाबिंद वालों को गाजर का उपयोग अनुकूल परिणाम देता है।
३) आंखों की जलन,रक्तिमा और सूजन हो जाना नेत्र की अधिक प्रचलित व्याधि है। धनिया इसमें उपयोगी पाया गया है।सूखे धनिये के बीज १० gm लेकर ३०० ml पानी में उबालें। उतारकर ठंडा करें। फ़िर छानकर इससे आंखें धोएं। जलन,लाली,नेत्र शौथ में तुरंत असर मेहसूस होता है।
४) आंवला नेत्र की कई बीमारियों में लाभकारी माना गया है। ताजे आंवले का रस १० ml ईतने ही शहद में मिलाकर रोज सुबह लेते रहने से आंखों की ज्योति में वृद्धि होती है। मोतियाबिंद रोकने के तत्व भी इस उपचार में मौजूद हैं।
५) भारतीय परिवारों में खाटी भाजी की सब्जी का चलन है। खाटी भाजी के पत्ते के रस की कुछ बूंदें आंख में सुबह शाम डालते रहने से कई नेत्र समस्याएं हल हो जाती हैं। मोतियाबिंद रोकने का भी यह एक बेहतरीन उपाय है।
६) अनुसंधान में साबित हुआ है कि कद्दू के फ़ूल का रस दिन में दो बार आंखों में लगाने से मोतियाबिंद में लाभ होता है। कम से कम दस मिनिट आंख में लगा रहने दें।
७) घरेलू चिकित्सा के जानकार विद्वानों का कहना है कि शहद आंखों में दो बार लगाने से मोतियाबिंद नियंत्रित होता है।
८) लहसुन की २-३ कुली रोज चबाकर खाना आंखों के लिये हितकर है। यह हमारे नेत्रों के लेंस को स्वच्छ करती है।
९) पालक का नियमित उपयोग करना मोतियाबिंद में लाभकारी पाया गया है। इसमें एंटीआक्सीडेंट तत्व होते हैं। पालक में पाया जाने वाला बीटा केरोटीन नेत्रों के लिये परम हितकारी सिद्ध होता है। ब्रिटिश मेडीकल रिसर्च में पालक का मोतियाबिंद नाशक गुण प्रमाणित हो चुका है।
१०) एक और सरल उपाय बताते हैं- अपनी दोनों हथेलियां आंखों पर ऐसे रखें कि ज्यादा दबाव मेहसूस न हो। हां, हल्का सा दवाब लगावे। दिन में चार-पांच बार और हर बार आधा मिनिट के लिये करें। मोतियाबिंद से लडाई का अच्छा तरीका है।
११) किशमिश ,अंजीर और खारक पानी में रात को भिगो दें और सुबह खाएं । मोतियाबिंद की अच्छी घरेलू दवा है।
१२) भोजन के साथ सलाद ज्यादा मात्रा में शामिल करें । सलाद पर थोडा सा जेतून का तेल भी डालें। इसमें प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत करने के गुण हैं जो नेत्रों के लिये भी हितकर है।
खाने वाली औषधियाँ
आंखों में लगने वाली औषधि के साथ-साथ जड़ी-बूटियों का सेवन भी बेहद फायदेमन्द साबित होता है। एक योग इस प्रकार है, जो सभी तरह के मोतियाबिंद में फायदेमन्द है।
500 gm सूखे आँवले गुठली रहित, 500 gm भृंगराज का संपूर्ण पौधा, 100 gm बाल हरड़ , 200 gm सूखे गोरखमुंडी पुष्प और 200 gm श्वेत पुनर्नवा की जड़ लेकर सभी औषधियों को खूब बारीक पीस लें। इस चूर्ण को अच्छे प्रकार के काले पत्थर के खरल में 250 मिलीलीटर अमरलता के रस और 100 ml मेहंदी के पत्रों के रस में अच्छी तरह मिला लें। इसके बाद इसमें शुद्ध भल्लातक का कपड़छान चूर्ण 25 gm मिलाकर कड़ाही में लगातार तब तक खरल करें, जब तक वह सूख न जाए। इसके बाद इसे छानकर कांच के बर्तन में सुरक्षित रख लें। इसे रोगी की शक्ति व अवस्था के अनुसार 2 से 4 gm की मात्रा में ताजा गोमूत्र से खाली पेट सुबह-शाम सेवन करें।
फायदेमन्द व्यायाम व योगासन-
औषधियाँ प्रयोग करने के साथ-साथ रोज सुबह नियमित रूप से सूर्योदय से दो घंटे पहले नित्य क्रियाओं से निपटकर शीर्षासन और आंख का व्यायाम अवश्य करें।
आंख के व्यायाम के लिए पालथी मारकर पद्मासन में बैठें। सबसे पहले आंखों की पुतलियों को एक साथ दाएँ-बाएँ घुमा-घुमाकर देखें फिर ऊपर-नीचे देखें। इस प्रकार यह अभ्यास कम से कम 10-15 बार अवश्य करें। इसके बाद सिर को स्थिर रखते हुए दोनों आंखों की पुतलियों को एक गोलाई में पहले सीधे फिर उल्टे (पहले घड़ी की गति की दिशा में फिर विपरीत दिशा में) चारों ओर घुमाएँ। इस प्रकार कम से कम 10-15 बार करें। इसके बाद शीर्षासन करें।
कुछ खास हिदायतें
मोतियाबिंद के रोगी को गेहूँ की ताजी रोटी खानी चाहिए। गाय का दूध बगैर चीनी का ही पीएँ। गाय के दूध से निकाला हुआ घी भी सेवन करें। आंवले के मौसम में आंवले के ताजा फलों का भी सेवन अवश्य करें। फलों में अंजीर व गूलर अवश्यक खाएं।
सुबह-शाम आंखों में ताजे पानी के छींटे अवश्य मारें। मोतियाबिंद के रोगी को कम या बहुत तेज रोशनी में नहीं पढ़ना चाहिए और रोशनी में इस प्रकार न बैठें कि रोशनी सीधी आंखों पर पड़े। पढ़ते-लिखते समय रोशनी बार्ईं ओर से आने दें।
वनस्पति घी, बाजार में मिलने वाले घटिया-मिलावटी तेल, मांस, मछली, अंडा आदि सेवन न करें। मिर्च-मसाला व खटाई का प्रयोग न करें। कब्ज न रहने दें। अधिक ठंडे व अधिक गर्म मौसम में बाहर न निकलें।
धन्यबाद
मोतियाबिंद एक आम समस्या बनता जा रहा है, अब तो युवा भी इस रोग के शिकार होने लगे हैं। अगर इस रोग का समय रहते इलाज न किया जाए तो रोगी अंधेपन का शिकार हो जाता है।
मोतियाबिंद दो प्रकार का होता है।
1.nuclear cataract. 2.cortical cataract.
उक्त दोनो तरह के मोतियाबिंद बनने से रोकने के लिये विटामिन ए तथा बी काम्प्प्लेक्स का दीर्घावधि तक उपयोग करने की सलाह दी जाती है। अगर मोतियाबिंद प्रारंभिक हालत में है तो रोक लगेगी।
कारण : मोतियाबिंद रोग कई कारणों से होता है। आंखों में लंबे समय तक सूजन बने रहना, जन्मजात सूजन होना, आंख की संरचना में कोई कमी होना, आंख में चोट लग जाना, चोट लगने पर लंबे समय तक घाव बना रहना, कनीनिका में जख्म बन जाना, दूर की चीजें धूमिल नजर आना या सब्ज मोतिया रोग होना, आंख के परदे का किसी कारणवश अलग हो जाना, कोई गम्भीर दृष्टि दोष होना, लंबे समय तक तेज रोशनी या तेज गर्मी में कार्य करना, डायबिटीज होना, गठिया होना, धमनी रोग होना, गुर्दे में जलन का होना, अत्याधिक कुनैन का सेवन, खूनी बवासीर का रक्त स्राव अचानक बंद हो जाना आदि समस्याएँ मोतियातिबिंद को जन्म दे सकती हैं।
मोतियाबिंद का आयुर्वेदिक इलाज
रक्त मोतियाबिंद में सभी चीजें लाल, हरी, काली, पीली और सफेद नजर आती हैं। परिम्लामिन मोतियाबिंद में सभी ओर पीला-पीला नजर आता है। ऐसा लगता है जैसे कि पेड़-पौधों में आग लग गई हो।
सभी प्रकार के मोतियाबिंद में आंखों के आस-पास की स्थिति भी अलग-अलग होती है। वातज मोतियाबिंद में आंखों की पुतली लालिमायुक्त, चंचल और कठोर होती है। पित्तज मोतियाबिंद में आंख की पुतली कांसे के समान पीलापन लिए होती है। कफज मोतियाबिंद में आंख की पुतली सफेद और चिकनी होती है या शंख की तरह सफेद खूँटों से युक्त व चंचल होती है। सन्निपात के मोतियाबिंद में आंख की पुतली मूंगे या पद्म पत्र के समान तथा उक्त सभी के मिश्रित लक्षणों वाली होती है। परिम्लामिन में आंख की पुतली भद्दे रंग के कांच के समान, पीली व लाल सी, मैली, रूखी और नीलापन लिए होती है।
आंखों में लगाने वाली औषधियाँ-
त्रिफला के जल से आंखें धोना:
आयुर्वेद में हरड़ , बहेड़ा और आंवला– इन तीनों को त्रिफला कहते हैं । यह त्रिदोषनाशक है अर्थात् वात, पित्त, कफ इन तीनों दोषों के कुपित होने से जो रोग उत्पन्न होते हैं उन सबको दूर करने वाला है । मस्तिष्क सम्बन्धी तथा उदर रोगों को दूर भगाता है तथा इन्हें शक्ति प्रदान करता है । सभी ज्ञानेन्द्रियों के लिये लाभदायक तथा शक्तिप्रद है । विशेषतया चक्षुरोग के लिये तो रामबाण है । कभी-कभी स्वस्थ मनुष्यों को भी त्रिफला के जल से अपने नेत्र धोते रहना चाहिये । नेत्रों के लिए अत्यन्त लाभदायक है । कभी-कभी त्रिफला की सब्जी खाना भी हितकर है ।
धोने की विधि
त्रिफला को जौ से समान (यवकुट) कूट लो और रात्रि के समय किसी मिट्टी, शीशे या चीनी के पात्र में शुद्ध जल में भिगो दो । दो चम्मच त्रिफला को 250 ml शुद्ध जल में भिगोऐं। प्रातःकाल पानी को ऊपर से नितारकर छान लो । उस जल से नेत्रों को खूब छींटे लगाकर धोयें। सारे जल का उपयोग एक बार के धोने में ही करो।
दूसरा तरीका है आंख धोने के कप का प्रयोग करें। इससे निरन्तर धोने से आंखों की उष्णता, रोहे, खुजली, लाली, जाला, मोतियाबिन्द आदि सभी रोगों का नाश होता है । आंखों की पीड़ा (दुखना) दूर होती है, आंखों की ज्योति बढ़ती है । शेष नीचे बचे हुए गीले त्रिफला को सिर पर रगड़ने से लाभ होता है ।
त्रिफला की टिकिया
(१) त्रिफला को जल के साथ पीसकर टिकिया बनायें और आंखों पर रखकर पट्टी बांध दें । इससे तीनों दोषों से दुखती हुई आंखें ठीक हो जाती हैं ।
(२) हरड़ की गिरी (बीज) को जल के साथ निरन्तर आठ दिन तक खरल करो । इसको नेत्रों में डालते रहने से मोतियाबिन्द रुक जाता है । यह रोग के आरम्भ में अच्छा लाभ करता है ।
मोतियाबिंद की शुरुआती अवस्था में भीमसेनी कपूर स्त्री के दूध में घिसकर नित्य लगाने पर यह ठीक हो जाता है।
हल्के बड़े मोती का चूरा 3 ग्राम और काला सुरमा 12 ग्राम लेकर खूब घोंटें। जब अच्छी तरह घुट जाए तो एक साफ शीशी में रख लें और रोज सोते वक्त अंजन की तरह आंखों में लगाएं। इससे मोतियाबिंद अवश्य ही दूर हो जाता है।
छोटी पीपल, लाहौरी नमक, समुद्री फेन और काली मिर्च सभी 10-10 gm लें। इसे 200 gm काले सुरमा के साथ 500 ml गुलाब अर्क या सौंफ अर्क में इस प्रकार घोटें कि सारा अर्क उसमें सोख लें। अब इसे रोजाना आंखों में लगाएं।
10 gm गिलोय का रस, 1 gm शहद, 1gm सेंधा नमक सभी को बारीक पीसकर रख लें। इसे रोजाना आंखों में अंजन की तरह प्रयोग करने से मोतियाबिंद दूर होता है।
मोतियाबिंद में उक्त में से कोई भी एक औषधि आंख में लगाने से सभी प्रकार का मोतियाबिंद धीरे-धीरे दूर हो जाता है।
सभी औषधियां परीक्षित हैं।
नेत्र रोगों में कुदरती पदार्थों से ईलाज करना फ़ायदेमंद रहता है। मोतियाबिंद बढती उम्र के साथ अपना तालमेल बिठा लेता है। अधिमंथ बहुत ही खतरनाक रोग है जो बहुधा आंख को नष्ट कर देता है। आंखों की कई बीमारियों में नीचे लिखे सरल उपाय करने हितकारी सिद्ध होंगे-
१) सौंफ़ नेत्रों के लिये हितकर है। मोतियाबिंद रोकने के लिये इसका पावडर बनालें। एक बडा चम्मच भर सुबह शाम पानी के साथ लेते रहें। नजर की कमजोरी वाले भी यह उपाय करें।
२) विटामिन ए नेत्रों के लिये अत्यंत फ़ायदेमंद होता है। इसे भोजन के माध्यम से ग्रहण करना उत्तम रहता है। गाजर में भरपूर बीटा केरोटिन पाया जाता है जो विटामिन ए का अच्छा स्रोत है। गाजर कच्ची खाएं और जिनके दांत न हों वे इसका रस पीयें। २०० ml रस दिन में दो बार लेना हितकर माना गया है। इससे आंखों की रोशनी भी बढेगी। मोतियाबिंद वालों को गाजर का उपयोग अनुकूल परिणाम देता है।
३) आंखों की जलन,रक्तिमा और सूजन हो जाना नेत्र की अधिक प्रचलित व्याधि है। धनिया इसमें उपयोगी पाया गया है।सूखे धनिये के बीज १० gm लेकर ३०० ml पानी में उबालें। उतारकर ठंडा करें। फ़िर छानकर इससे आंखें धोएं। जलन,लाली,नेत्र शौथ में तुरंत असर मेहसूस होता है।
४) आंवला नेत्र की कई बीमारियों में लाभकारी माना गया है। ताजे आंवले का रस १० ml ईतने ही शहद में मिलाकर रोज सुबह लेते रहने से आंखों की ज्योति में वृद्धि होती है। मोतियाबिंद रोकने के तत्व भी इस उपचार में मौजूद हैं।
५) भारतीय परिवारों में खाटी भाजी की सब्जी का चलन है। खाटी भाजी के पत्ते के रस की कुछ बूंदें आंख में सुबह शाम डालते रहने से कई नेत्र समस्याएं हल हो जाती हैं। मोतियाबिंद रोकने का भी यह एक बेहतरीन उपाय है।
६) अनुसंधान में साबित हुआ है कि कद्दू के फ़ूल का रस दिन में दो बार आंखों में लगाने से मोतियाबिंद में लाभ होता है। कम से कम दस मिनिट आंख में लगा रहने दें।
७) घरेलू चिकित्सा के जानकार विद्वानों का कहना है कि शहद आंखों में दो बार लगाने से मोतियाबिंद नियंत्रित होता है।
८) लहसुन की २-३ कुली रोज चबाकर खाना आंखों के लिये हितकर है। यह हमारे नेत्रों के लेंस को स्वच्छ करती है।
९) पालक का नियमित उपयोग करना मोतियाबिंद में लाभकारी पाया गया है। इसमें एंटीआक्सीडेंट तत्व होते हैं। पालक में पाया जाने वाला बीटा केरोटीन नेत्रों के लिये परम हितकारी सिद्ध होता है। ब्रिटिश मेडीकल रिसर्च में पालक का मोतियाबिंद नाशक गुण प्रमाणित हो चुका है।
१०) एक और सरल उपाय बताते हैं- अपनी दोनों हथेलियां आंखों पर ऐसे रखें कि ज्यादा दबाव मेहसूस न हो। हां, हल्का सा दवाब लगावे। दिन में चार-पांच बार और हर बार आधा मिनिट के लिये करें। मोतियाबिंद से लडाई का अच्छा तरीका है।
११) किशमिश ,अंजीर और खारक पानी में रात को भिगो दें और सुबह खाएं । मोतियाबिंद की अच्छी घरेलू दवा है।
१२) भोजन के साथ सलाद ज्यादा मात्रा में शामिल करें । सलाद पर थोडा सा जेतून का तेल भी डालें। इसमें प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत करने के गुण हैं जो नेत्रों के लिये भी हितकर है।
खाने वाली औषधियाँ
आंखों में लगने वाली औषधि के साथ-साथ जड़ी-बूटियों का सेवन भी बेहद फायदेमन्द साबित होता है। एक योग इस प्रकार है, जो सभी तरह के मोतियाबिंद में फायदेमन्द है।
500 gm सूखे आँवले गुठली रहित, 500 gm भृंगराज का संपूर्ण पौधा, 100 gm बाल हरड़ , 200 gm सूखे गोरखमुंडी पुष्प और 200 gm श्वेत पुनर्नवा की जड़ लेकर सभी औषधियों को खूब बारीक पीस लें। इस चूर्ण को अच्छे प्रकार के काले पत्थर के खरल में 250 मिलीलीटर अमरलता के रस और 100 ml मेहंदी के पत्रों के रस में अच्छी तरह मिला लें। इसके बाद इसमें शुद्ध भल्लातक का कपड़छान चूर्ण 25 gm मिलाकर कड़ाही में लगातार तब तक खरल करें, जब तक वह सूख न जाए। इसके बाद इसे छानकर कांच के बर्तन में सुरक्षित रख लें। इसे रोगी की शक्ति व अवस्था के अनुसार 2 से 4 gm की मात्रा में ताजा गोमूत्र से खाली पेट सुबह-शाम सेवन करें।
फायदेमन्द व्यायाम व योगासन-
औषधियाँ प्रयोग करने के साथ-साथ रोज सुबह नियमित रूप से सूर्योदय से दो घंटे पहले नित्य क्रियाओं से निपटकर शीर्षासन और आंख का व्यायाम अवश्य करें।
आंख के व्यायाम के लिए पालथी मारकर पद्मासन में बैठें। सबसे पहले आंखों की पुतलियों को एक साथ दाएँ-बाएँ घुमा-घुमाकर देखें फिर ऊपर-नीचे देखें। इस प्रकार यह अभ्यास कम से कम 10-15 बार अवश्य करें। इसके बाद सिर को स्थिर रखते हुए दोनों आंखों की पुतलियों को एक गोलाई में पहले सीधे फिर उल्टे (पहले घड़ी की गति की दिशा में फिर विपरीत दिशा में) चारों ओर घुमाएँ। इस प्रकार कम से कम 10-15 बार करें। इसके बाद शीर्षासन करें।
कुछ खास हिदायतें
मोतियाबिंद के रोगी को गेहूँ की ताजी रोटी खानी चाहिए। गाय का दूध बगैर चीनी का ही पीएँ। गाय के दूध से निकाला हुआ घी भी सेवन करें। आंवले के मौसम में आंवले के ताजा फलों का भी सेवन अवश्य करें। फलों में अंजीर व गूलर अवश्यक खाएं।
सुबह-शाम आंखों में ताजे पानी के छींटे अवश्य मारें। मोतियाबिंद के रोगी को कम या बहुत तेज रोशनी में नहीं पढ़ना चाहिए और रोशनी में इस प्रकार न बैठें कि रोशनी सीधी आंखों पर पड़े। पढ़ते-लिखते समय रोशनी बार्ईं ओर से आने दें।
वनस्पति घी, बाजार में मिलने वाले घटिया-मिलावटी तेल, मांस, मछली, अंडा आदि सेवन न करें। मिर्च-मसाला व खटाई का प्रयोग न करें। कब्ज न रहने दें। अधिक ठंडे व अधिक गर्म मौसम में बाहर न निकलें।
धन्यबाद
Saturday, December 23, 2017
सर्दी में काया कल्प
विशेष रूप से जो मोटे लोग है, जिनको सर्दी जुकाम अक्सर हो जाता है,वह जरूर करें।
लेडी पीपर ( पिप्पली ) चूर्ण लीजिये। पंसारी के यहां साबुत मिलती है, ले आये, धोये, सुखायें, पीसें,शीशी में रखिये।
3 gm (आधा चम्मच) लेडी पीपल को 1 कप दूध ,1 कप पानी मिलाकर उबाले। जब केवल 1 कप बचे तो उतारे। मिश्री मिलाये,पिये, रात को भोजन के 2 घण्टे बाद्, गुनगुना पिये।
दूसरी रात पिप्पली की मात्रा दुगुनी 6 gm करिये,दूध पानी भी थोड़ा बढ़ाना है।इस तरह पिप्पली, दूध पानी की मात्रा बढ़ाते जाए। 11 दिन या अधिक करिये। यदि पेशाब में जलन होने लगे तो चंदनादि वटि वैद्यनाथ ,आंवला चूर्ण व शहद लें, गुलकंद ले, और उसी मात्रा के पिप्पली चूर्ण को वहीं रोकें और अगली रात से आधा च्चमच रोज कम करते जायें। जब तक कि वापस आधा च्चमच यानि कि 3 gm तंक ना पहुंच जायें।
🌻यह प्रयोग शरीर से अनावाश्यक कफ , चर्बी को गला देता है,रक्त में गर्मी उत्पन्न करता है, लेकिन दूध मलाई का सेवन पर्याप्त करे नही तो शरीर मे शुष्कता, सूखापन आ जाएगा।
🦀बीपी,हार्ट के मरीज ये प्रयोग न करे।🦀
🌻साधारण लोग
इसको साधारण रूप में केवल 3 gm पिप्पली चूर्ण रोज, पूरे ठंड के मौसंम में ले सकते है, मात्रा न बढायें।
🌷होम्योपैथिक प्रयोग🌷
सुबह ब्रश करने के आधा घण्टे बाद एक कप दूध में 2 बून्द होम्योपैथिक दवा ""CROCUS SATIVA"" Q
क्रोकस स्टीविया Q यानि
मदर टिंचर (जो उच्च गुणवत्ता के कश्मीरी केसर से बनती है।)'डाल कर पियें।🦀मात्रा न बढ़ाएं और केवल सर्दी में ही पियें।बच्चों को केवल एक बूंद ही दें।🦀
🌻कोई भी प्रयोग करें,सर्दी में आवश्यक रूप से साधारण च्यवनप्राश 2 चम्मच सुबह उसी दूध या साधारण दूध से लें, बच्चों को कम से कम एक चम्मच दें।
🌷सर्दी की होम्योपैथिक दवा
सौरीनम (Psorinum) 1M की 4 गोली का एक डोज किसी भी दिन सुबह ब्रश करने के 1 घण्टे बाद जीभ के नीचे रखें और एक घण्टे तक कुछ न खायें पिएं।
🦀अगला डोज 30 दिन बाद और सर्दी के ही दिनों में। एक साल में 3 ही डोज लेने हैं, कम समय में न तो डोज रिपीट करें,न ही न ही 4 बार लें।बच्चों को न दें।🦀
सर्दी तो लगेगी पर शरीर पर होने वाले दुष्प्रभाव में कमी आएगी।
पहले साल 25%
दूसरे साल 60%
तीसरे साल100% लाभ होगा।
आगे सर्दियों में केवल 2 बार 30 दिन के गेप से लेते रह सकते हैं।
🦀दवा लेने के दिन कोई भी दवा,चाय,कॉफी,सिगरेट, तम्बाकू,न लें।
🌷सम्राटों का शीत कालीन प्रयोग🌷
5 gm शुद्धतम सोने की गिन्नी को घर में बनने वाली दाल के बर्तन में शुरू में ही डाल दें,दाल बन जाने पर निकल लें।केवल सर्दी सर्दी ही करें।कुकर स्टील का ही प्रयोग करे,एल्युमिनियम का हानिकारक है।
🌷लक्ष्मी विलास रस🌷
🍀नारदीय,स्वर्ण युक्त नहीं🍀
दीवाली के दिन से 15 दिन तक 2-2 गोली लक्ष्मी विलास रस पतजंलि ""दिव्य पेय"" के काढ़े के साथ 10 बजे सुबह व शाम 6 बजे लें।
बाद में 1-1 गोली होली तक लेते रहने से भी शरीर में रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है।
🌷घर से सर्दी में निकलते समय कान में रुई डाल कर निकलें या कान ढके होने चाहिएं और जरा सा अजवायन मुंह में तम्बाकू की तरह से रख कर निकलेंगे तो सर्दी का असर नहीं होगा।
🌷बच्चों को सर्दी लगने पर छाती व पैर के तलवों पर गुनगुने सरसों के तेल की मालिश से लाभ होता है।
🌷सभी को सर्दियों में घाणी से निकले तिल्ली या सरसों के तेल से शरीर की मालिश कर कम से कम 1 घण्टे धूप में बैठना ही चाहिए।।
लेडी पीपर ( पिप्पली ) चूर्ण लीजिये। पंसारी के यहां साबुत मिलती है, ले आये, धोये, सुखायें, पीसें,शीशी में रखिये।
3 gm (आधा चम्मच) लेडी पीपल को 1 कप दूध ,1 कप पानी मिलाकर उबाले। जब केवल 1 कप बचे तो उतारे। मिश्री मिलाये,पिये, रात को भोजन के 2 घण्टे बाद्, गुनगुना पिये।
दूसरी रात पिप्पली की मात्रा दुगुनी 6 gm करिये,दूध पानी भी थोड़ा बढ़ाना है।इस तरह पिप्पली, दूध पानी की मात्रा बढ़ाते जाए। 11 दिन या अधिक करिये। यदि पेशाब में जलन होने लगे तो चंदनादि वटि वैद्यनाथ ,आंवला चूर्ण व शहद लें, गुलकंद ले, और उसी मात्रा के पिप्पली चूर्ण को वहीं रोकें और अगली रात से आधा च्चमच रोज कम करते जायें। जब तक कि वापस आधा च्चमच यानि कि 3 gm तंक ना पहुंच जायें।
🌻यह प्रयोग शरीर से अनावाश्यक कफ , चर्बी को गला देता है,रक्त में गर्मी उत्पन्न करता है, लेकिन दूध मलाई का सेवन पर्याप्त करे नही तो शरीर मे शुष्कता, सूखापन आ जाएगा।
🦀बीपी,हार्ट के मरीज ये प्रयोग न करे।🦀
🌻साधारण लोग
इसको साधारण रूप में केवल 3 gm पिप्पली चूर्ण रोज, पूरे ठंड के मौसंम में ले सकते है, मात्रा न बढायें।
🌷होम्योपैथिक प्रयोग🌷
सुबह ब्रश करने के आधा घण्टे बाद एक कप दूध में 2 बून्द होम्योपैथिक दवा ""CROCUS SATIVA"" Q
क्रोकस स्टीविया Q यानि
मदर टिंचर (जो उच्च गुणवत्ता के कश्मीरी केसर से बनती है।)'डाल कर पियें।🦀मात्रा न बढ़ाएं और केवल सर्दी में ही पियें।बच्चों को केवल एक बूंद ही दें।🦀
🌻कोई भी प्रयोग करें,सर्दी में आवश्यक रूप से साधारण च्यवनप्राश 2 चम्मच सुबह उसी दूध या साधारण दूध से लें, बच्चों को कम से कम एक चम्मच दें।
🌷सर्दी की होम्योपैथिक दवा
सौरीनम (Psorinum) 1M की 4 गोली का एक डोज किसी भी दिन सुबह ब्रश करने के 1 घण्टे बाद जीभ के नीचे रखें और एक घण्टे तक कुछ न खायें पिएं।
🦀अगला डोज 30 दिन बाद और सर्दी के ही दिनों में। एक साल में 3 ही डोज लेने हैं, कम समय में न तो डोज रिपीट करें,न ही न ही 4 बार लें।बच्चों को न दें।🦀
सर्दी तो लगेगी पर शरीर पर होने वाले दुष्प्रभाव में कमी आएगी।
पहले साल 25%
दूसरे साल 60%
तीसरे साल100% लाभ होगा।
आगे सर्दियों में केवल 2 बार 30 दिन के गेप से लेते रह सकते हैं।
🦀दवा लेने के दिन कोई भी दवा,चाय,कॉफी,सिगरेट, तम्बाकू,न लें।
🌷सम्राटों का शीत कालीन प्रयोग🌷
5 gm शुद्धतम सोने की गिन्नी को घर में बनने वाली दाल के बर्तन में शुरू में ही डाल दें,दाल बन जाने पर निकल लें।केवल सर्दी सर्दी ही करें।कुकर स्टील का ही प्रयोग करे,एल्युमिनियम का हानिकारक है।
🌷लक्ष्मी विलास रस🌷
🍀नारदीय,स्वर्ण युक्त नहीं🍀
दीवाली के दिन से 15 दिन तक 2-2 गोली लक्ष्मी विलास रस पतजंलि ""दिव्य पेय"" के काढ़े के साथ 10 बजे सुबह व शाम 6 बजे लें।
बाद में 1-1 गोली होली तक लेते रहने से भी शरीर में रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है।
🌷घर से सर्दी में निकलते समय कान में रुई डाल कर निकलें या कान ढके होने चाहिएं और जरा सा अजवायन मुंह में तम्बाकू की तरह से रख कर निकलेंगे तो सर्दी का असर नहीं होगा।
🌷बच्चों को सर्दी लगने पर छाती व पैर के तलवों पर गुनगुने सरसों के तेल की मालिश से लाभ होता है।
🌷सभी को सर्दियों में घाणी से निकले तिल्ली या सरसों के तेल से शरीर की मालिश कर कम से कम 1 घण्टे धूप में बैठना ही चाहिए।।
फ़टी एड़ियो का उपचार
गुनगुने पानी में दो चम्मच नमक डालकर उस पानी में 10-15 मिनट दोनों पैरों को डालकर बैठें तत्पश्चात तलवों को किसी तौलिए से रगड़कर पोंछ लेना चाहिए। ऐसा करने से तलुवों का मैल निकल जायेगा। इसके बाद एड़ियों और तलवों पर सरसों का तेल मलकर सूती जुराबें पहन लेनी चाहिए। इस प्रकार से उपचार करने से फटी हुई एड़ियां कुछ ही दिनों में ठीक हो जाती हैं। एडियों की साफ-सफाई का ध्यान रखें
स्नान करते समय एड़ियों को अच्छी तरह से साफ करना चाहिए और इसके बाद एड़ियों पर सरसों का तेल लगाना चाहिए। नाभि में सरसों का तेल लगायें स्नान करने के बाद या फिर सोते समय नाभि में सरसों का तेल लगना चाहिए। इसके बाद 20-25 बार नाभि को मलना चाहिए।
रात्रि सोने से पहले ग्लिसरीन, गुलाबजल और जैतून के तेल को समभाग एकसाथ मिला लें। फिर इस तेल से तलुवों तथा एड़ियों की मालिश करें। ऐसा प्रतिदिन करने से यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
फलों का पेस्ट है असरकारी कच्चे आम को पीसकर फटी हुई एड़ियों पर मालिश करने से बहुत जल्द ही फटी हुई एड़ियां ठीक हो जाती हैं।
फटी हुई एड़ियों को ठीक करने के लिए कच्चे पपीते को पीस लें। इसके बाद इसमें जरा-सा सरसों का तेल तथा हल्दी मिलाएं और इस पेस्ट को एड़ियों पर लगाकर कपड़ा बांध लें। इस प्रकार से उपचार करने से कुछ ही दिनों में फटी हुई एड़ियां ठीक हो जाती हैं।
हरी मुलायम घास और नीम के 10 से 12 पत्ते पीसकर पूरी पगतली में अच्छी तरह से लगाकर आधे घंटे बाद धो लें। इससे एड़िया जल्दी ही ठीक हो जाती है।
बरगद का दूध फटी हुई एड़ियों पर लगाने से बहुत अधिक लाभ मिलता है।
फटी हुई एड़ियों पर पिसी हुई मेहंदी लगाने से एड़ियां जल्दी ठीक हो जाती हैं।
सरसों के तेल में मधु मख्खी के छत्ते का मोम मिलाकर फटी हुई एड़ियों पर लगाने से एड़िया जल्दी ठीक हो जाती है।
फटी हुई एड़ियों पर प्रतिदिन घी लगाने से एड़ियां जल्दी ठीक हो जाती हैं।
पानी में शलगम के टुकड़ों को डालकर उबाल लें। इसके बाद इस पानी से फटी हुई एड़ियों को धोने से फटी हुई एड़ियां ठीक हो जाती हैं।
फटी हुई एड़ियों को साबुन, राख, मिट्टी तथा कीचड़ आदि से बचाकर रखना चाहिए।
सप्ताह में एक बार नींबू का रस मिले हुए पानी से अपने पैरों को धोना चाहिए।
पाचनशक्ति के ज्यादा कमजोर हो जाने के कारण भी एड़ियां फटने लगती हैं इसलिए यदि पाचनशक्ति कमजोर हो गई हो तो सबसे पहले उसको ठीक करने का उपाय करना चाहिए। इसके बाद एड़ी फटने का इलाज कराना चाहिए। पाचन शक्ति को ठीक करने के लिए पौष्टिक तत्व युक्त तथा पाचनशक्ति को बढ़ाने वाले पदार्थ और विटामिन `सी´ युक्त पदार्थों का सेवन अधिक मात्रा में करना चाहिए।
एड़ियों को फटने से रोकने के लिए प्रतिदिन हरी सब्जियों का सेवन करना चाहिए तथा सुबह के समय में नंगे पैर घास पर चलना चाहिए।
स्नान करते समय एड़ियों को अच्छी तरह से साफ करना चाहिए और इसके बाद एड़ियों पर सरसों का तेल लगाना चाहिए। नाभि में सरसों का तेल लगायें स्नान करने के बाद या फिर सोते समय नाभि में सरसों का तेल लगना चाहिए। इसके बाद 20-25 बार नाभि को मलना चाहिए।
रात्रि सोने से पहले ग्लिसरीन, गुलाबजल और जैतून के तेल को समभाग एकसाथ मिला लें। फिर इस तेल से तलुवों तथा एड़ियों की मालिश करें। ऐसा प्रतिदिन करने से यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
फलों का पेस्ट है असरकारी कच्चे आम को पीसकर फटी हुई एड़ियों पर मालिश करने से बहुत जल्द ही फटी हुई एड़ियां ठीक हो जाती हैं।
फटी हुई एड़ियों को ठीक करने के लिए कच्चे पपीते को पीस लें। इसके बाद इसमें जरा-सा सरसों का तेल तथा हल्दी मिलाएं और इस पेस्ट को एड़ियों पर लगाकर कपड़ा बांध लें। इस प्रकार से उपचार करने से कुछ ही दिनों में फटी हुई एड़ियां ठीक हो जाती हैं।
हरी मुलायम घास और नीम के 10 से 12 पत्ते पीसकर पूरी पगतली में अच्छी तरह से लगाकर आधे घंटे बाद धो लें। इससे एड़िया जल्दी ही ठीक हो जाती है।
बरगद का दूध फटी हुई एड़ियों पर लगाने से बहुत अधिक लाभ मिलता है।
फटी हुई एड़ियों पर पिसी हुई मेहंदी लगाने से एड़ियां जल्दी ठीक हो जाती हैं।
सरसों के तेल में मधु मख्खी के छत्ते का मोम मिलाकर फटी हुई एड़ियों पर लगाने से एड़िया जल्दी ठीक हो जाती है।
फटी हुई एड़ियों पर प्रतिदिन घी लगाने से एड़ियां जल्दी ठीक हो जाती हैं।
पानी में शलगम के टुकड़ों को डालकर उबाल लें। इसके बाद इस पानी से फटी हुई एड़ियों को धोने से फटी हुई एड़ियां ठीक हो जाती हैं।
फटी हुई एड़ियों को साबुन, राख, मिट्टी तथा कीचड़ आदि से बचाकर रखना चाहिए।
सप्ताह में एक बार नींबू का रस मिले हुए पानी से अपने पैरों को धोना चाहिए।
पाचनशक्ति के ज्यादा कमजोर हो जाने के कारण भी एड़ियां फटने लगती हैं इसलिए यदि पाचनशक्ति कमजोर हो गई हो तो सबसे पहले उसको ठीक करने का उपाय करना चाहिए। इसके बाद एड़ी फटने का इलाज कराना चाहिए। पाचन शक्ति को ठीक करने के लिए पौष्टिक तत्व युक्त तथा पाचनशक्ति को बढ़ाने वाले पदार्थ और विटामिन `सी´ युक्त पदार्थों का सेवन अधिक मात्रा में करना चाहिए।
एड़ियों को फटने से रोकने के लिए प्रतिदिन हरी सब्जियों का सेवन करना चाहिए तथा सुबह के समय में नंगे पैर घास पर चलना चाहिए।
लाभकारी चने के गुण
चना एक परम उपयोगी पदार्थ है। कहा भी जाता है―'जो खाये चना, सदा रहे बना'―अर्थात् चना इतना गुणकारी है कि इसके प्रयोग से सभी रोग दूर रहते हैं और शरीर तन्दुरुस्त बना रहता है। चना गर्म व रुक्ष प्रकृति का होता है। इसके प्रयोग से नजला, डायबिटीज और वीर्य सम्बन्धी रोगों में लाभ होता है। जिगर, तिल्ली तथा गुर्दे के रोगों में चने का शोरबा (तरी या जलांश) बेहद गुणकारी है। यों तो चना गुणकारी है और इसका नियमित प्रयोग करना चाहिये लेकिन ज्यादा मात्रा में खाने से यह भूख को कम कर देता है। अतः एक बार में 100-150 ग्राम से ज्यादा नहीं खाना चाहिये। चना हमेशा खूब चबा–चबाकर खाना चाहिये। यहाँ चने के कुछ प्रयोग बताये जा रहे हैं―
डायबिटीज (मधुमेह)– 25 ग्राम काले चने रात में भिगोकर प्रातः निराहार सेवन करने से मधुमेह व्याधि दूर होती है। यदि जौ और चना–दोनों को मिलाकर और उसका आटा पिसवाकर उसकी रोटी भी रोज खाई जाये तो जल्दी लाभ होगा।
नपुंसकता– भिगोये हुए चने के जल में (चना निकाल लेने के बाद में जो जल रह जाये उसमें) शहद मिलाकर पीने से किन्हीं भी कारणों से उत्पन्न नपुंसकता समाप्त हो जाती है और स्तम्भन–शक्ति बढ़ती है ।
कफ-प्रकृति― रात्रिकाल में सोते समय भुने हुए चने चबाकर ऊपर से गुनगुना दूध पीने से श्वास–नली के अनेक रोग–बलगम, कफ आदि दूर हो जाते हैं। यह प्रयोग करने के बाद पानी न पीयें।
खूनी बवासीर―गर्म-गर्म भुने चनों का सेवन नियमित रुप से कुछ दिनों तक करते रहने से प्रारम्भिक स्थिति का खूनी बवासीर ठीक हो जाता है।
गर्भपात― गर्भपात की संभावना हो तो नारी को काले चने का काढ़ा बनाकर पिलाना चाहिये, गर्भ स्थिर बना रहेगा।
प्रदर―भुने हुए चनों में देशी खाँड
मिलाकर रख लें । 2–3 चम्मच की मात्रा में खाकर ऊपर से देशी घी मिश्रित गाय का गर्म दूध पीने से कुछ दिनों के बाद ही श्वेत प्रदर (सफेद पानी आना) बंद हो जाता है।
वीर्यवर्धक योग–
मिट्टी, चीनी–मिट्टी या काँच के बर्तन में आवश्यकतानुसार चने रात में भिगो दें और प्रातः खूब चबा–चबाकर खायें। इस प्रकार कई दिनों तक खाते रहने से वीर्य की वृद्धि होती है और वीर्य सम्बन्धी अनेक विकार समाप्त हो जाते हैं।
डायबिटीज (मधुमेह)– 25 ग्राम काले चने रात में भिगोकर प्रातः निराहार सेवन करने से मधुमेह व्याधि दूर होती है। यदि जौ और चना–दोनों को मिलाकर और उसका आटा पिसवाकर उसकी रोटी भी रोज खाई जाये तो जल्दी लाभ होगा।
नपुंसकता– भिगोये हुए चने के जल में (चना निकाल लेने के बाद में जो जल रह जाये उसमें) शहद मिलाकर पीने से किन्हीं भी कारणों से उत्पन्न नपुंसकता समाप्त हो जाती है और स्तम्भन–शक्ति बढ़ती है ।
कफ-प्रकृति― रात्रिकाल में सोते समय भुने हुए चने चबाकर ऊपर से गुनगुना दूध पीने से श्वास–नली के अनेक रोग–बलगम, कफ आदि दूर हो जाते हैं। यह प्रयोग करने के बाद पानी न पीयें।
खूनी बवासीर―गर्म-गर्म भुने चनों का सेवन नियमित रुप से कुछ दिनों तक करते रहने से प्रारम्भिक स्थिति का खूनी बवासीर ठीक हो जाता है।
गर्भपात― गर्भपात की संभावना हो तो नारी को काले चने का काढ़ा बनाकर पिलाना चाहिये, गर्भ स्थिर बना रहेगा।
प्रदर―भुने हुए चनों में देशी खाँड
मिलाकर रख लें । 2–3 चम्मच की मात्रा में खाकर ऊपर से देशी घी मिश्रित गाय का गर्म दूध पीने से कुछ दिनों के बाद ही श्वेत प्रदर (सफेद पानी आना) बंद हो जाता है।
वीर्यवर्धक योग–
मिट्टी, चीनी–मिट्टी या काँच के बर्तन में आवश्यकतानुसार चने रात में भिगो दें और प्रातः खूब चबा–चबाकर खायें। इस प्रकार कई दिनों तक खाते रहने से वीर्य की वृद्धि होती है और वीर्य सम्बन्धी अनेक विकार समाप्त हो जाते हैं।
Monday, December 18, 2017
गोमूत्र सेवन में सावधानियाँ
- 1. देशी गाय का गौमूत्र ही सेवन करें ।
2. जंगल में चरने वाली गाय का मूत्र सर्वोत्तम है।
3. गाय गर्भवती या रोगी न हो।
4. बिना ब्यायी गाय का गौमूत्र अधिक लाभदायी है।
5. एक वर्ष से कम की बछिया का मूत्र सर्वोत्तम है ।
6.मालिश के लिए दो से सात दिन पुराना गोमूत्र अच्छा रहता है ।
7.पीने हेतु गोमूत्र को आठ बार कपड़े से छानकर प्रयोग करना चाहिए ।
8.बच्चों को 5 ग्राम और बड़ों को दस से बीस ग्राम की मात्रा में सेवन करना चाहिए ।
Friday, December 15, 2017
गला और छाती की समस्यायों का समाधान
गले में किनती भी ख़राब से ख़राब बीमारी हो, कोई भी इन्फेक्शन हो, इसकी सबसे अच्छी दवा है हल्दी ।
जैसे गले में दर्द है, खरास है , गले में खासी है, गले में कफ जमा है, गले में टोनसीलाईटिस हो गया ; ये सब बिमारिओं में आधा चम्मच कच्ची हल्दी का रस लेना और मुह खोल कर गले में डाल देना , और फिर थोड़ी देर चुप होके बैठ जाना तो ये हल्दी गले में निचे उतर जाएगी लार के साथ । बच्चों के टोन्सिल जब बहुत तकलीफ देते है न तो हम ऑपरेशन करवाके उनको कटवाते है ; वो करने की जरुरत नही है हल्दी से सब ठीक होता है ।
जैसे गले में दर्द है, खरास है , गले में खासी है, गले में कफ जमा है, गले में टोनसीलाईटिस हो गया ; ये सब बिमारिओं में आधा चम्मच कच्ची हल्दी का रस लेना और मुह खोल कर गले में डाल देना , और फिर थोड़ी देर चुप होके बैठ जाना तो ये हल्दी गले में निचे उतर जाएगी लार के साथ । बच्चों के टोन्सिल जब बहुत तकलीफ देते है न तो हम ऑपरेशन करवाके उनको कटवाते है ; वो करने की जरुरत नही है हल्दी से सब ठीक होता है ।
Thursday, December 14, 2017
बाल संस्कार
।। बाल संस्कार ।।
अपने बच्चों को निम्नलिखित श्लोकों को नित्य दैनन्दिनी में शामिल करने हेतु संस्कार दें एवं खुद भी पढें
प्रात: कर-दर्शनम्
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्॥
पृथ्वी क्षमा प्रार्थना
समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमंडिते।
विष्णु पत्नि नमस्तुभ्यं पाद स्पर्शं क्षमस्व मे॥
त्रिदेवों के साथ नवग्रह स्मरण
ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानु: शशी भूमिसुतो बुधश्च।
गुरुश्च शुक्र: शनिराहुकेतव: कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥
स्नान मन्त्र
गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।
नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेस्मिन् सन्निधिं कुरु॥
सूर्यनमस्कार
ॐ सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च।।
आदित्यस्य नमस्कारं ये कुर्वन्ति दिने दिने।
दीर्घमायुर्बलं वीर्यं व्याधि शोक विनाशनम्
सूर्य पादोदकं तीर्थ जठरे धारयाम्यहम्॥
ॐ मित्राय नम:
ॐ रवये नम:
ॐ सूर्याय नम:
ॐ भानवे नम:
ॐ खगाय नम:
ॐ पूष्णे नम:
ॐ हिरण्यगर्भाय नम:
ॐ मरीचये नम:
ॐ आदित्याय नम:
ॐ सवित्रे नम:
ॐ अर्काय नम:
ॐ भास्कराय नम:
ॐ श्री सवितृ सूर्यनारायणाय नम:
आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीदमम भास्कर।
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते॥
संध्या दीप दर्शन
शुभं करोतु कल्याणम् आरोग्यम् धनसंपदा।
शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपकाय नमोऽस्तु ते॥
दीपो ज्योतिः परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः।
दीपो हरतु मे पापं संध्यादीप नमोऽस्तु ते॥
गणपति स्तोत्र
गणपति: विघ्नराजो लम्बतुन्ड़ो गजानन:।
द्वै मातुरश्च हेरम्ब एकदंतो गणाधिप:॥
विनायक: चारुकर्ण: पशुपालो भवात्मज:।
द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय य: पठेत्॥
विश्वं तस्य भवेद् वश्यं न च विघ्नं भवेत् क्वचित्।
विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय।
लम्बोदराय विकटाय गजाननाय॥
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय।
गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥
शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजं।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
आदिशक्ति वंदना
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
शिव स्तुति
कर्पूर गौरं करुणावतारं,
संसार सारं भुजगेन्द्रहारं।
सदा वसंतं हृदयारविन्दे,
भवं भवानी सहितं नमामि॥
विष्णु स्तुति
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
श्री कृष्ण स्तुति
कस्तूरी तिलकं ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभं।
नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले, वेणु करे कंकणम्॥
सर्वांगे हरिचन्दनं सुललितं, कंठे च मुक्तावलि।
गोपस्त्री परिवेष्टितो विजयते, गोपाल चूडामणी॥
मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम्॥
श्रीराम वंदना
लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥
एक श्लोकी रामायण
आदौ रामतपोवनादि गमनं हत्वा मृगं कांचनम्।
वैदेही हरणं जटायु मरणं सुग्रीवसम्भाषणम्॥
बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं लंकापुरीदाहनम्।
पश्चाद्रावण कुम्भकर्णहननं एतद्घि श्री रामायणम्॥
सरस्वती वंदना
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वींणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपदमासना॥
या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा माम पातु सरस्वती भगवती
निःशेषजाड्याऽपहा॥
हनुमद् वंदना
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहम्।
दनुजवनकृषानुम् ज्ञानिनांग्रगणयम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशम्।
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥
मनोजवं मारुततुल्यवेगम जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणम् प्रपद्ये॥
स्वस्ति-वाचन
ॐ स्वस्ति न इंद्रो वृद्धश्रवाः
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्ट्टनेमिः
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
शांति पाठ
ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष (गुँ) शान्ति:,
पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।
वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,
सर्व (गुँ) शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥
॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:।।
अपने बच्चों को निम्नलिखित श्लोकों को नित्य दैनन्दिनी में शामिल करने हेतु संस्कार दें एवं खुद भी पढें
प्रात: कर-दर्शनम्
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्॥
पृथ्वी क्षमा प्रार्थना
समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमंडिते।
विष्णु पत्नि नमस्तुभ्यं पाद स्पर्शं क्षमस्व मे॥
त्रिदेवों के साथ नवग्रह स्मरण
ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानु: शशी भूमिसुतो बुधश्च।
गुरुश्च शुक्र: शनिराहुकेतव: कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥
स्नान मन्त्र
गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।
नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेस्मिन् सन्निधिं कुरु॥
सूर्यनमस्कार
ॐ सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च।।
आदित्यस्य नमस्कारं ये कुर्वन्ति दिने दिने।
दीर्घमायुर्बलं वीर्यं व्याधि शोक विनाशनम्
सूर्य पादोदकं तीर्थ जठरे धारयाम्यहम्॥
ॐ मित्राय नम:
ॐ रवये नम:
ॐ सूर्याय नम:
ॐ भानवे नम:
ॐ खगाय नम:
ॐ पूष्णे नम:
ॐ हिरण्यगर्भाय नम:
ॐ मरीचये नम:
ॐ आदित्याय नम:
ॐ सवित्रे नम:
ॐ अर्काय नम:
ॐ भास्कराय नम:
ॐ श्री सवितृ सूर्यनारायणाय नम:
आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीदमम भास्कर।
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते॥
संध्या दीप दर्शन
शुभं करोतु कल्याणम् आरोग्यम् धनसंपदा।
शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपकाय नमोऽस्तु ते॥
दीपो ज्योतिः परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः।
दीपो हरतु मे पापं संध्यादीप नमोऽस्तु ते॥
गणपति स्तोत्र
गणपति: विघ्नराजो लम्बतुन्ड़ो गजानन:।
द्वै मातुरश्च हेरम्ब एकदंतो गणाधिप:॥
विनायक: चारुकर्ण: पशुपालो भवात्मज:।
द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय य: पठेत्॥
विश्वं तस्य भवेद् वश्यं न च विघ्नं भवेत् क्वचित्।
विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय।
लम्बोदराय विकटाय गजाननाय॥
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय।
गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥
शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजं।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
आदिशक्ति वंदना
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
शिव स्तुति
कर्पूर गौरं करुणावतारं,
संसार सारं भुजगेन्द्रहारं।
सदा वसंतं हृदयारविन्दे,
भवं भवानी सहितं नमामि॥
विष्णु स्तुति
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
श्री कृष्ण स्तुति
कस्तूरी तिलकं ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभं।
नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले, वेणु करे कंकणम्॥
सर्वांगे हरिचन्दनं सुललितं, कंठे च मुक्तावलि।
गोपस्त्री परिवेष्टितो विजयते, गोपाल चूडामणी॥
मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम्॥
श्रीराम वंदना
लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥
एक श्लोकी रामायण
आदौ रामतपोवनादि गमनं हत्वा मृगं कांचनम्।
वैदेही हरणं जटायु मरणं सुग्रीवसम्भाषणम्॥
बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं लंकापुरीदाहनम्।
पश्चाद्रावण कुम्भकर्णहननं एतद्घि श्री रामायणम्॥
सरस्वती वंदना
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वींणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपदमासना॥
या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा माम पातु सरस्वती भगवती
निःशेषजाड्याऽपहा॥
हनुमद् वंदना
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहम्।
दनुजवनकृषानुम् ज्ञानिनांग्रगणयम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशम्।
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥
मनोजवं मारुततुल्यवेगम जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणम् प्रपद्ये॥
स्वस्ति-वाचन
ॐ स्वस्ति न इंद्रो वृद्धश्रवाः
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्ट्टनेमिः
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
शांति पाठ
ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष (गुँ) शान्ति:,
पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।
वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,
सर्व (गुँ) शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥
॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:।।
इन्हें अपना कर देंखें घरेलू नुक्से लाभदायक
1. यदि आपको रात में नींद नहीं आती, तो अपनी पलकें एक मिनट तक जोर-जोर से झपकाएँ कुछ ही देर में नींद आ जाएगी।
2. सुबह उठकर यदि आपको रात की बात याद नहीं रहती, तो उस बात को रात में सोने से पहले एक बार दोहराएँ. वह बात सुबह आपको जरूर याद रहेगी।
3. गर्म पानी से नहाने के बाद, थोड़ा सा ठंडा पानी शरीर पर डालने से शरीर कई तरह की बीमारियों से दूर रहता है।
4. एक रिसर्च के मुताबिक, हमारा दाहिना कान बातों और शब्दों को बेहतर सुन सकता है जबकि बाएं कान से संगीत बेहतर सुना जा सकता है।
6. यदि आपको चक्कर आ रहे हैं, तो बिस्तर पर लेट कर एक पैर जमीन पर रखिए. चक्कर आने बंद हो जाएंगे।
7. यदि माइग्रेन का दर्द नहीं जा रहा, तो अपने हाथों को बर्फ़ के ठंडे पानी में डालिए, दर्द काफ़ी हद तक खत्म हो जाएगा।
8. यदि मच्छर के काटने के बाद उस जगह पर ख़ुजली हो रही है, तो उस जगह पर डियो लगा लीजिए, ख़ुजली तुरंत बंद हो जाएगी।
9. यदि आपको बे-वक्त नींद आ रही है, जैसे बस में या क्लास में आदि. तो अपनी सांस को तब तक रखिए जब तक आप रोक सकते हैं. फिर सांस छोड़ दे. इस से नींद एकदम से गायब हो जाएगी।
10. अगर हंसी नहीं रुक रही, तो ख़ुद को ज़ोर से चूंटी काट लीजिए. हंसना बंद हो जाएगा।
11. टेंशन और सिरदर्द से छुटकारा पाने के लिए जमीन पर लेट कर पैरों को ऊपर करके दीवार पर लगा ले. इससे काफी फायदा होगा।
12. अंगूर का जूस आपका मानसिक तनाव दूर कर सकता है।
13. बच्चों की नज़र तेज करने के लिए उनके बेड की दिशा बदलते रहें, इससे उसका एंगल बदल जाएगा, और नजर में सुधार होगा. इसे आप भी कर सकते हैं।
14. दिन भर की थकान के बाद यदि आपको आराम चाहिए, तो एक ठंडे पानी की बोतल को अपने पैरों के नीचे रख कर आगे-पीछे करें. जल्द ही आपके पैरों की थकान दूर होगी।
15. आजकल कमीशन के लालच में कुछ डॉक्टर बेवजह एक्स-रे करवाने लग गए हैं. क्या आप जानते हैं कि एक्स-रे करवाने के दौरान निकली घातक रेडियोएक्टिव किरणें कैंसर पैदा करती हैं. एक मामूली एक्स-रे करवाने में शरीर को हुई हानि की भरपाई करने में कम से कम एक वर्ष का समय लगता हैं।अतः निवेदन है कि ऐसे डॉक्टर्स से बचें और योग्य अनुभवी एवम ईमानदार चिकित्सक से ही चिकित्सा परामर्श लें।
लकवा और उससे बचने का उपाय
लकवा है भयानक बिमारी, क्योकि इस बिमारी में शरीर के अंग टेढ़े हो जाते है जानिये इसका इलाज
लकवा का नाम सुनते ही लोगो के मन में भय बन जाता है, क्योकि इस बीमारी में शरीर के अंग टेढ़े हो जाते है। लकवा का मतलब मांसपेशियों के गति का समाप्त हो जाना तथा शरीर के अन्य भागों से समन्वय समाप्त हो जाना है। जिन भागों में लकवा मारता है जैसे हाथों, चेहरे व पैर आदि उन विशेष भागों की मांसपेशियों की गति समाप्त हो जाती है। मांसपेशियों की गति के साथ-साथ इसमें संवेदना का आभाव हो जाता है, जिससे उस व्यक्ति हो उस स्थान पर दर्द, ठंडक, गर्मी आदि का अहसास नहीं होता है। लम्बे समय तक लकवाग्रस्त रोगी में प्रभावित भाग का रक्त प्रवाह एवं अन्य मेटाबोलिक क्रियाएं लगभग बंद हो जाती हैं। जिससे उस अंग की मांसपेशियां सूखने लगती हैं जिससे बहुत गम्भीर स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इस लेख में हम जानेंगे लकवा का उपचार घरेलु उपाय और आयुर्वेदिक नुस्खे अपना कर कैसे करे।
लकवा होने के लक्षण : लक़वा किसी भी उम्र में किसी भी व्यक्ति या महिला को हो सकता है पर अधिकतर ये जादा उम्र के लोगों में देखा जाता है। इस बिमारी से उबरने में काफी समय लग सकता है और कई बार ये लाइलाज रोग बन जाता है। सिर दर्द होना, चक्कर आना या फिर बेहोश होना, शरीर में अकड़न आना, शरीर का कोई अंग बार बार सुन पड़ जाना और हाथ पैर को उठाने में परेशानी आना, बात करते वक़्त अटकना, तुतलाना या बोलने में कोई परेशानी होना, धुँधला दिखाई देना या कोई चीज़ दो बार दिखाना।
लकवा होने के कारण : लकवा होने का सबसे बड़ा कारण है हाई ब्लड प्रेशर। इसके इलावा खून में थक्का जमना, स्ट्रोक होना, बेड कोलेस्ट्रोल का बढ़ना. लकवे का अटैक आने पर अगर मरीज को तुरंत उपचार मिल जाए और खून का जमा हुआ थक्का ठीक हो जाए तो मरीज की स्थिति में जल्दी सुधार हो सकता है और शीघ्र ही रोगी बिल्कुल ठीक भी हो सकता है और अगर खून का प्रवाह फिर से शुरू ना हो सके तो इससे स्थाई लकवा की स्थिति बन सकती है।
लकवा का उपचार घरेलु उपाय और देसी तरीके से कैसे करे : 2 चम्मच शहद में 5 कलियाँ लहसुन की पीस कर उसका सेवन करने पर एक से डेढ़ महीने में लकवे में आराम मिलने लगेगा। इसके साथ साथ लहसुन की 5 कालियां दूध में उबाल ले और इसका सेवन करे। इस उपाय से ब्लड प्रेशर भी कंट्रोल में रहेगा और लकवा प्रभावित अंग में भी जान आने लगेगी। पैरालिसिस के उपचार में मालिश से भी फायदा मिलता है, पर किसी भी प्रकार की मालिश को शुरू करने से पहले एक बार डॉक्टर या फिर किसी आयुर्वेदिक वैद की सलाह जरूर ले। कलौंजी के तेल को गुनगुना कर के हलके हाथों से मालिश करे, इसके साथ दिन में 2 से 3 बार एक चम्मच तेल का सेवन भी करे. इस देसी नुस्खे से 30 दिनों में फरक दिखने लगेगा।
50 से 60 ग्राम काली मिर्च को 250 ग्राम तेल में मिला कर कुछ देर तक गैस पर पकाए। अब इस तेल को गुनगुना करके लकवे प्रभावीत अंग पर पतला लेप लगाये। लकवे का इलाज में लहसुन का सेवन बहुत ही असरदार है। लहसुन से उपचार करने के लिए पहले दिन पानी के साथ लहसुन की 1 कली निगल ले, उसके बाद रोजाना एक-एक कली बढ़ाये और पानी के साथ ले, कहने का मतलब है की पहले दिन 1 कली, दूसरे दिन 2, तीसरे दिन 3 और ऐसे करते करते 21वें दिन लहसुन की पूरी 21 कलियां पानी के साथ निगलनी है। 21 दिनों के बाद अब हर रोज एक एक कली कम कर के निगले। इस प्रयोग से अधरंग जैसी समस्या में जल्द फायदा मिलता है। रोजाना सौंठ और उड़द को उबाल ले और ठंडा होने पर इसका पानी छान कर पिए। हर रोज इस उपाय को करने से लकवे में काफी सुधार होता है।
बारीक पीसी हुई अदरक 5 ग्राम और काली उड़द दाल 10 ग्राम की मात्रा में ले और 50 ग्राम सरसों के तेल में 5 से 7 मिनट तक गरम करे और इसमें 2 ग्राम पिसे हुए कपूर का चूरा डाल दे। हर रोज इस तेल के इस्तेमाल से गठिया और लकवे की बीमारी में गजब का फायदा मिलता है। इस तेल से जोडों की मालिश करने पर दर्द ठीक होता है। खजूर का गुदा लक़वे से प्रभावित अंग पर मलने से भी आराम मिलता है। दूध में छुहारा भिगो कर खाने से भी लकवे में फायदा मिलता है, ध्यान रहे एक बार में 4 से जादा छुहारे नहीं खाये। रात को तांबे के बर्तन में एक लीटर पानी भर कर रख दे और पानी में चाँदी का एक सिक्का भी डाल दे।
सुबह खाली पेट इस पाई को पिए और आधे घंटे तक कुछ ना खाए पिए। ये प्रयोग लकवा से रिकवर होने में बहुत फायदा करता है। लकवे के रोगी को करेला जादा खाना चाहिए, लकवे में करेले के सेवन से भी फायदा मिलता है। लकवे से ग्रस्त व्यक्ति को किसी भी नशीली चीज़ के सेवन से परहेज करना चाहिए और खाने में घी, तेल माँस, मछली का प्रयोग नही करना चाहिए। हर रोज सुबह शाम देसी गाय के शुद्ध घी की 2 बूँदो को नाक में डालने से लकवे में भी बहुत आराम मिलता है और इसके इलावा इस उपाय से बालो का झड़ना बंद होता है, कोमा में गए हुए व्यक्ति की चेतना लौटने लगती है और दिमाग भी तेज होता है. इस देसी नुस्खे का निरंतर प्रयोग माइग्रेन की बीमारी में रामबाण इलाज का काम करता है। लकवे का अटैकआने पर तुरंत तिल का तेल 50 से 100 ग्राम हल्का गर्म करके रोगी को पिला दे और इसके साथ थोड़ा लहसुन चबा चबा कर खाने को दे। अटैक पड़ते ही सिर और लकवा प्रभावित अंग पर सेंक करे। काली उड़द को खाने के तेल में डाल कर गर्म कर ले और इसे लकवे से ग्रस्त अंग पर मालिश करे, इससे काफी लाभ मिलता है।
लकवा का नाम सुनते ही लोगो के मन में भय बन जाता है, क्योकि इस बीमारी में शरीर के अंग टेढ़े हो जाते है। लकवा का मतलब मांसपेशियों के गति का समाप्त हो जाना तथा शरीर के अन्य भागों से समन्वय समाप्त हो जाना है। जिन भागों में लकवा मारता है जैसे हाथों, चेहरे व पैर आदि उन विशेष भागों की मांसपेशियों की गति समाप्त हो जाती है। मांसपेशियों की गति के साथ-साथ इसमें संवेदना का आभाव हो जाता है, जिससे उस व्यक्ति हो उस स्थान पर दर्द, ठंडक, गर्मी आदि का अहसास नहीं होता है। लम्बे समय तक लकवाग्रस्त रोगी में प्रभावित भाग का रक्त प्रवाह एवं अन्य मेटाबोलिक क्रियाएं लगभग बंद हो जाती हैं। जिससे उस अंग की मांसपेशियां सूखने लगती हैं जिससे बहुत गम्भीर स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इस लेख में हम जानेंगे लकवा का उपचार घरेलु उपाय और आयुर्वेदिक नुस्खे अपना कर कैसे करे।
लकवा होने के लक्षण : लक़वा किसी भी उम्र में किसी भी व्यक्ति या महिला को हो सकता है पर अधिकतर ये जादा उम्र के लोगों में देखा जाता है। इस बिमारी से उबरने में काफी समय लग सकता है और कई बार ये लाइलाज रोग बन जाता है। सिर दर्द होना, चक्कर आना या फिर बेहोश होना, शरीर में अकड़न आना, शरीर का कोई अंग बार बार सुन पड़ जाना और हाथ पैर को उठाने में परेशानी आना, बात करते वक़्त अटकना, तुतलाना या बोलने में कोई परेशानी होना, धुँधला दिखाई देना या कोई चीज़ दो बार दिखाना।
लकवा होने के कारण : लकवा होने का सबसे बड़ा कारण है हाई ब्लड प्रेशर। इसके इलावा खून में थक्का जमना, स्ट्रोक होना, बेड कोलेस्ट्रोल का बढ़ना. लकवे का अटैक आने पर अगर मरीज को तुरंत उपचार मिल जाए और खून का जमा हुआ थक्का ठीक हो जाए तो मरीज की स्थिति में जल्दी सुधार हो सकता है और शीघ्र ही रोगी बिल्कुल ठीक भी हो सकता है और अगर खून का प्रवाह फिर से शुरू ना हो सके तो इससे स्थाई लकवा की स्थिति बन सकती है।
लकवा का उपचार घरेलु उपाय और देसी तरीके से कैसे करे : 2 चम्मच शहद में 5 कलियाँ लहसुन की पीस कर उसका सेवन करने पर एक से डेढ़ महीने में लकवे में आराम मिलने लगेगा। इसके साथ साथ लहसुन की 5 कालियां दूध में उबाल ले और इसका सेवन करे। इस उपाय से ब्लड प्रेशर भी कंट्रोल में रहेगा और लकवा प्रभावित अंग में भी जान आने लगेगी। पैरालिसिस के उपचार में मालिश से भी फायदा मिलता है, पर किसी भी प्रकार की मालिश को शुरू करने से पहले एक बार डॉक्टर या फिर किसी आयुर्वेदिक वैद की सलाह जरूर ले। कलौंजी के तेल को गुनगुना कर के हलके हाथों से मालिश करे, इसके साथ दिन में 2 से 3 बार एक चम्मच तेल का सेवन भी करे. इस देसी नुस्खे से 30 दिनों में फरक दिखने लगेगा।
50 से 60 ग्राम काली मिर्च को 250 ग्राम तेल में मिला कर कुछ देर तक गैस पर पकाए। अब इस तेल को गुनगुना करके लकवे प्रभावीत अंग पर पतला लेप लगाये। लकवे का इलाज में लहसुन का सेवन बहुत ही असरदार है। लहसुन से उपचार करने के लिए पहले दिन पानी के साथ लहसुन की 1 कली निगल ले, उसके बाद रोजाना एक-एक कली बढ़ाये और पानी के साथ ले, कहने का मतलब है की पहले दिन 1 कली, दूसरे दिन 2, तीसरे दिन 3 और ऐसे करते करते 21वें दिन लहसुन की पूरी 21 कलियां पानी के साथ निगलनी है। 21 दिनों के बाद अब हर रोज एक एक कली कम कर के निगले। इस प्रयोग से अधरंग जैसी समस्या में जल्द फायदा मिलता है। रोजाना सौंठ और उड़द को उबाल ले और ठंडा होने पर इसका पानी छान कर पिए। हर रोज इस उपाय को करने से लकवे में काफी सुधार होता है।
बारीक पीसी हुई अदरक 5 ग्राम और काली उड़द दाल 10 ग्राम की मात्रा में ले और 50 ग्राम सरसों के तेल में 5 से 7 मिनट तक गरम करे और इसमें 2 ग्राम पिसे हुए कपूर का चूरा डाल दे। हर रोज इस तेल के इस्तेमाल से गठिया और लकवे की बीमारी में गजब का फायदा मिलता है। इस तेल से जोडों की मालिश करने पर दर्द ठीक होता है। खजूर का गुदा लक़वे से प्रभावित अंग पर मलने से भी आराम मिलता है। दूध में छुहारा भिगो कर खाने से भी लकवे में फायदा मिलता है, ध्यान रहे एक बार में 4 से जादा छुहारे नहीं खाये। रात को तांबे के बर्तन में एक लीटर पानी भर कर रख दे और पानी में चाँदी का एक सिक्का भी डाल दे।
सुबह खाली पेट इस पाई को पिए और आधे घंटे तक कुछ ना खाए पिए। ये प्रयोग लकवा से रिकवर होने में बहुत फायदा करता है। लकवे के रोगी को करेला जादा खाना चाहिए, लकवे में करेले के सेवन से भी फायदा मिलता है। लकवे से ग्रस्त व्यक्ति को किसी भी नशीली चीज़ के सेवन से परहेज करना चाहिए और खाने में घी, तेल माँस, मछली का प्रयोग नही करना चाहिए। हर रोज सुबह शाम देसी गाय के शुद्ध घी की 2 बूँदो को नाक में डालने से लकवे में भी बहुत आराम मिलता है और इसके इलावा इस उपाय से बालो का झड़ना बंद होता है, कोमा में गए हुए व्यक्ति की चेतना लौटने लगती है और दिमाग भी तेज होता है. इस देसी नुस्खे का निरंतर प्रयोग माइग्रेन की बीमारी में रामबाण इलाज का काम करता है। लकवे का अटैकआने पर तुरंत तिल का तेल 50 से 100 ग्राम हल्का गर्म करके रोगी को पिला दे और इसके साथ थोड़ा लहसुन चबा चबा कर खाने को दे। अटैक पड़ते ही सिर और लकवा प्रभावित अंग पर सेंक करे। काली उड़द को खाने के तेल में डाल कर गर्म कर ले और इसे लकवे से ग्रस्त अंग पर मालिश करे, इससे काफी लाभ मिलता है।
हमारे भोजन का हमारे मन पर प्रभाव
भोजन का मन पर प्रभाव
हमारे शरीर की वृद्धि, स्थिति और कार्यशक्ति जिस प्रकार भोजन पर आधारित है, वैसे ही हमारा मन भी भोजन से प्रभावित होता है। छान्दोग्योपनिषद् के अनुसार खाया हुआ अन्न तीन भागों में विभक्त हो जाता है। अन्न का स्थूल भाग मल के रुप में शरीर से निष्कासित कर दिया। जाता है। मध्य भाग से मांसादि का निर्माण होता है। जैसे दूध को मथने से उसका सारभाग मक्खन दूध के ऊपर एकत्रित हो जाता है, उसी भाँति अन्न का पाचन होकर उसके सूक्ष्म भाग से मन का निर्माण होता है। (छान्दोग्य० उप० ६/५)
कहा भी है―'जैसा खावे अन्न, वैसा बने मन'। *आचार्य चरक* भी अन्न द्वारा मन का बलिष्ठ और शक्तिसम्पन्न होना स्वीकार करते हैं। (च० सू० २७/३)
मन का निर्माण प्रकृति के सत्त्वगुण से हुआ है (सांख्य० १/६१)।
यही मन जब रजोगुण और तमोगुण से आविष्ट हो जाता है तो अनेक मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं। यदि गम्भीरता से विचार करें तो विदित होगा कि अधिकतर रोग अस्वस्थ मानसिक पृष्ठभूमि में ही पनपते हैं। मन के स्वस्थ हो जाने पर व्यक्ति सामान्य औषध लेने से ही स्वस्थ हो जाता है।
मानसिक स्वास्थ्य के लिए सत्त्वगुण–प्रधान भोजन लेना चाहिए। उदाहरण के लिए बिजली का प्रकाश देने वाली एक ट्यूब से श्वेत काँच निकलता है। यदि उस पर लाल रंग का पारदर्शी कागज या काँच चढ़ा दिया जाए तो निकलने वाला श्वेत प्रकाश भी लाल रंग का हो जाएगा। इसी भाँति काला आवरण चढ़ा देने से धुँधला–सा प्रकाश ही फैलेगा। इसी प्रकार यदि हम राजसिक भोजन करते हैं तो हमारा मन भी रजोगुणी और तामसिक भोजन से तमोगुणी हो जाएगा। ऐसे ही पाप का अन्न तथा बिना परिश्रम के प्राप्त अन्न खाने से भी मन और बुद्धि मलिन हो जाते हैं। गीता में सात्त्विक, राजसिक और तामसिक भोजन का निम्न प्रकार वर्गीकरण किया है―
(१) सात्त्विक भोजन― आयु, बल, बुद्धि, आरोग्य को देने वारे, रुचिकारक, सुपच, रसवाले, स्नेहयुक्त, शरीर को स्थिरता प्रदान करने वाले तथा ह्रदय को प्रिय पदार्थ सात्त्विक होते हैं, यथा, अन्न, दाल, मीठे पदार्थ, घृत, दुग्ध, दूध से बने दही, तक्र आदि पदार्थ, आँवला, सेब, मोसम्बी इत्यादि फल, लौकी, तोरई, मूली, परवल, बथुवा, पालक आदि शाक–सब्जियाँ, स्नेहयुक्त पदार्थ जैसे घी, मक्खन, बादाम, तिल, नारियल की गिरी, सोयाबीन, मूँगफली आदि, जिनको देखने–मात्र से उन्हें खाने की रुचि हो, जो स्वच्छ हों तथा जिनका पाचन भली–भाँति हो जाए और जिन्हें सम्यक् विधि से पकाया गया हो, वे सब खाद्यपदार्थ सात्त्विक भोजन की श्रेणी में आते हैं।
(२) राजसिक भोजन―_कटु_―प्याज, लहसुन आदि, _अम्ल–खट्टे_―इमली, आम का अचार इत्यादि, _लवणयुक्त_―नमकीन पदार्थ, _अधिक उष्ण_―जैसे गर्म दूध, चाय आदि और जिन पदार्थों के खाने से शरीर में उष्णता उत्पन्न हो, _तीक्ष्ण_―मिर्च आदि, _रुक्ष_―भुने हुए अथवा घृतादि के बिना पके हुए जैसे चना, जलन करने वाला―राई, गर्म मसाला, हींग इत्यादि, तथा अन्य सभी पदार्थ जिनके खाने से शरीर एवं मन में रजोगुण की वृद्धि और रोगों की उत्पत्ति हो, वे सब खाद्य पदार्थ राजसिक प्रकृति के लोगों को प्रिय होते हैं।
(३) तामसिक भोजन― अधपका, नीरस, दुर्गन्धयुक्त, बासी, जूठा तथा अपवित्र भोजन (माँस, अण्ड़ा आदि) और बुद्धि का लोप करने वाले मद्य, अफीम, भाँग, चरस, हिरोइन, तम्बाक, पान मसाला इत्यादि पदार्थ तामसिक होते हैं।
उपर्युक्त राजसिक एवं तामसिक पदार्थों का परित्याग करके सात्त्विक भोजन का ग्रहण करना मानसिक स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है।
Tuesday, December 12, 2017
🌷जूठा भोजन न खाएँ न खिलाये🌷
ओ३म् शिव
अपना जूठा भोजन किसी को नहीं देना चाहिए और न किसी का जूठा भोजन स्वयं खाना चाहिए। कुछ माताओं में यह दुर्गुण होता है कि अपना जूठा अपने बच्चों को खिलाती हैं और बच्चों का जूठा स्वयं खाती हैं। यह बहुत खतरनाक, रोगकारक आदत या दुर्गुण है। महर्षि मनु ने लिखा है―
नोच्छिष्टं कस्यचि्दद्यान्नाद्याच्चैव तथान्तरा।
न चैवात्यशनं कुर्यान्न चोच्छिष्टःक्वचिद् व्रजेत्।।
―(मनु० २/५६)
भावार्थ― अपना जूठा भोजन किसी को न दें। दोपहर और सायं के भोजन के मध्य में कुछ न खाएँ। इन दो बार में भी अधिक भोजन न करें और कुल्ला आदि किए बिना कहीं न जाएँ।_
पाश्चात्य विदुषी मिस हेलन ने यन्त्रों के द्वारा स्पष्ट प्रमाणित किया है कि हाथ के हाथ से स्पर्श होने पर भी रोग के बीज एक से दूसरे में चले जाते हैं। फिर भोजन के द्वारा जाने में तो सन्देह ही क्या?
अपना जूठा भोजन किसी को नहीं देना चाहिए और न किसी का जूठा भोजन स्वयं खाना चाहिए। कुछ माताओं में यह दुर्गुण होता है कि अपना जूठा अपने बच्चों को खिलाती हैं और बच्चों का जूठा स्वयं खाती हैं। यह बहुत खतरनाक, रोगकारक आदत या दुर्गुण है। महर्षि मनु ने लिखा है―
नोच्छिष्टं कस्यचि्दद्यान्नाद्याच्चैव तथान्तरा।
न चैवात्यशनं कुर्यान्न चोच्छिष्टःक्वचिद् व्रजेत्।।
―(मनु० २/५६)
भावार्थ― अपना जूठा भोजन किसी को न दें। दोपहर और सायं के भोजन के मध्य में कुछ न खाएँ। इन दो बार में भी अधिक भोजन न करें और कुल्ला आदि किए बिना कहीं न जाएँ।_
पाश्चात्य विदुषी मिस हेलन ने यन्त्रों के द्वारा स्पष्ट प्रमाणित किया है कि हाथ के हाथ से स्पर्श होने पर भी रोग के बीज एक से दूसरे में चले जाते हैं। फिर भोजन के द्वारा जाने में तो सन्देह ही क्या?
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