Sunday, September 2, 2018

मोहे गिरधर गोपाल : जन्माष्टमी विशेष

अदभुत देवेन्द्र सिकरवार का लेख अदभुत! ***************************************** #मो_मन_गिरिधर_छवि_पे_अटक्यो भारत अपने अधोपतन के कालखंड से गुजर रहा था। अकबर द्वारा मुगलिया सल्तनत के पाये भारत की जमीन में गाड़े जा चुके थे। दासता के साथ साथ हिंदुओं में मुस्लिम कुसंग से विलासिता व व्यभिचार भी पनप रहा था। इस विदेशी सत्ता का प्रतिरोध राजनैतिक रूप से मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश के नेतृत्व में और सांस्कृतिक रूप से रामानंद, वल्लभाचार्य, कबीर, रैदास,तुलसी, मीरा, सूर आदि द्वारा किया जा रहा था परंतु फिर भी दासता का भाव गहराता जा रहा था और साथ ही बढ़ता जा रहा था हिंदू जाति का चारित्रिक पतन जो मुगल सत्ता के हरेक शहरी केंद्र में तवायफों व वेश्याओं के कोठों की बढ़ती संख्या में स्पष्ट दिख रहा था और मुगलिया सत्ता के मुख्य केंद्र आगरा में तो यह चरम पर था। और उसी आगरा में एक शाम हर रोज की तरह तंग और बदनाम गलियों में शाम से ही 'रंगीन रातों ' का आगाज हो चुका था। कोठों से श्रृंगार रस की स्वर लहरियाँ उठ रहीं थीं । ऐसी ही गली से दैववश साधारण वस्त्रों में एक असाधारण पुरुष गुजर रहा था। साधारण नागरिकों के वस्त्रों में भी उसके चेहरे की आभा उसके तपस्वी व्यक्तित्व होने की घोषणा कर रही थी। वह कुछ गुनगुनाते हुये जा रहा था। "उफ ये आखिरी पंक्ति पूरी ही नहीं हो पा रही है इतने दिनों से" वह झुंझलाकर स्वगत बड़बड़ाया । और तभी रूप और संगीत के उस बाजार के एक कोठे से एक मधुर स्वर उठा। मधुर स्वरलहरियाँ उसके कानों में पड़ीं और वह उस आवाज को सुनकर जैसे चौंक उठा। लंबे लंबे डग भरते उसके पैर सहसा ठिठक गये । ऐसी अद्भुत आवाज ? रूप और वासना के इस बाजार में ?? उसके कदम स्वरों की दिशा में यंत्रचलित अवस्था में खिंचने लगे । स्वर जितने अधिक स्पष्ट होते गये वह उतना ही अपने भीतर डूबता चला गया। अंततः उसके पग उन स्वरों के उद्गमस्थल पर पहुँच कर रुक गए। एक गणिका का कोठा। और फिर उपस्थित हो गया एक अद्भुत दृश्य .. बदनाम कोठे के नीचे एक खड़ा एक पुरुष, कर्णगह्वरों से होकर आत्मा की गहराइयों तक उतरती स्वरलहरियों में डूबा, भाव विभोर और अर्धनिमीलित नेत्रों से अपने अश्रुओं को उस आवाज पर न्योछावर सा करता हुआ। गीत अंततः अवरोह की ओर आता हुआ पूर्ण हुआ और उसके साथ ही उस अद्भुत पुरुष की भावसमाधि भी टूट गयी। कुछ क्षणों तक वह सोच विचार करता खड़ा रहा और फिर कुछ निश्चय कर कोठे की सीढ़ियां चढ़ने लगा। कोठे के कारिंदों से व्यवहार के बाद कुछ क्षण उपरांत उसे गणिका के सम्मुख पहुंचा दिया गया। पुरुष ने गणिका पर दृष्टिपात किया। चंपक वर्ण, तीखी नासिका, उत्फुल्ल अधर, , क्षीण कटि और जगमगाते वस्त्राभूषणों में लिपटा संतुलित गदराया हुआ शरीर। गणिका का सौंदर्य उसके स्वरसंपदा के ही समान मनोहारी था परंतु सर्वाधिक विचित्र थी उसकी आंखें। बड़ी बड़ी आंखें जिनमें एक अबूझ गहराई थ जो उसके गणिका सुलभ चंचलता से मेल नहीं खातीं थीं। आगुंतक पुरुष भी गणिका के चेहरे पर अपलक कुछ ढूंढता, खोया सा स्तंभ के सहारे खड़ा रहा जबकि गणिका कनखियों से अपने संभावित नये ग्राहक को 'तौलती' हुई अपने प्रारम्भिक ग्राहकों को बीड़े देकर उन्हें विदा कर रही थी । जब अंतिम व्यक्ति भी चला गया तब वह आगुंतक पुरुष की ओर उन्मुख हुई और अपने पेशे के अनुरूप नजाकत भरी अदाओं के साथ आदाब पेश किया। "ये नाचीज आपकी क्या खिदमत कर सकती है हुजूर? " "तुम्हारा नाम क्या है?" बिना दृष्टि हटाये हुए पुरुष ने पूछा। "रामजनी बाई" "तुम्हारी आवाज की तरह तुम्हारा सौंदर्य भी अद्भुत है बाई।" गणिका इस तरह की प्रशंसा के लिये अभ्यस्त थी परंतु उसे अपलक देखे जा रहे इस अजीब पुरुष के इन स्वरों में एक अंतर वह स्पष्ट अनुभव कर रही थी। इस पुरुष की आंखों में अन्य पुरुषों के विपरीत कामुक चमक और स्वरों में कामलोलुपता युक्त दैन्यता का पूर्ण अभाव था। गणिका प्रभावित हो उठी। "शुक्रिया, आइये तशरीफ़ रखिये" उसने अपने ग्राहक को एक मसनद पर आमंत्रित किया। आगुंतक अपने स्थान पर अविचल रहे। " नहीं, मैं तो यहां नहीं बैठ सकूँगा पर क्या तुम मेरे साथ चलकर मेरे ठाकुर के लिए गा सकोगी?" आगुंतक ने गंभीर स्वर में पूछा । गणिका को बहुत ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि उस समय जमींदार या राजे रजवाड़ों के पास ऐसे कारिंदों की फौज हुआ करती थी, जो अपने मालिक के 'शौक की पूर्ति ' के लिये नित नयी वारांगनाओं को ढूंढते रहते थे और ये भी शायद ऐसा ही कोई कारिंदा होगा हालांकि आगुंतक की अतिगंभीर छवि और चेहरे का सात्विक तेज ऐसे किसी विचार का निषेध करते थे । "जैसा हुजूर चाहें। पर ये नाचीज हवेलियों पर मुजरा करने के लिये 100 अशर्फियाँ लेती है।" तिरछी कुटिल चितवन के साथ गणिका ने अपना शुल्क बताया। पुरुष शुल्क सुनकर भी अप्रभावित रहा और बिना कुछ कहे अपने अंगरखे को टटोला और अशर्फियों से भरी थैली गणिका की ओर उछाल दी । कुछ देर बाद मथुरा की ओर दो घोडागाड़ियाँ जा रहीं थीं । एक गाड़ी में तबलची , सारँगीवान और सितारवादक अपने साजों के साथ ठुंसे हुये थे और दूसरी गाड़ी में गणिका अपने उस असाधारण ग्राहक के साथ बैठी थी । "आपके ठाकुर का ठिकाना क्या है ?" वेश्या ने पूछा । "ब्रज" संक्षिप्त उत्तर आया । क्षणिक चुप्पी के बाद पुनः गणिका ने कटाक्षपूर्वक पूछा, "और आपका नाम?" "कृष्णदास" "आपके ठाकुर क्या सुनना पसंद करेंगे ?" "कुछ भी जो ह्रदय से गाया जाये", पुरुष रहस्यपूर्ण ढंग से मुस्कुराया। "फिर भी?", उलझी हुई गणिका ने पुनः आग्रह किया । "अच्छा ठीक है, तुम मेरे ठाकुर को यह सुनाना" उन्होंने अपने मधुर गंभीर स्वर में गुनगुनाना शुरू कर दिया। "अरे ये तो भजन है।" गणिका बोल उठी। "हाँ, तुम्हें इसे गाने में कठिनाई तो नहीं होगी?" स्वरों को रोककर वह फिर मुस्कुराया । भजन ब्रज भाषा में था और बहुत सुंदर था । "किसने लिखा है ?" "मैंने" उन्होंने जवाब दिया। "ओह तो ये कविवर इस भजन को मेरे माध्यम से अपने मालिक को सुनाकर उनकी कृपा प्राप्त करना चाहते हैं ।" गणिका ने सोचा । ब्रज क्षेत्र में अकबर की मनसबदारी प्रथा के कारण उस समय कुकुरमुत्तों की तरह नित नये 'राजा साहबों' का उदय हो रहा था जिनमें अधिकांशतः विलासी और कामुक चरित्र के थे और इसीलिये संपूर्ण ब्रज क्षेत्र में महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा जनसामान्य में बहाई भक्तिरस की धारा के साथ साथ समांतर रूप से जागीरदारों के विलास की धारा भी बह रही थी और संगीत दोनों समांतर धाराओं को जोड़ने वाली कड़ी था। उस युग में धनाढ्य वर्ग में यद्यपि फारसी-उर्दू का प्रचलन और शायरों की गजलों का प्रभुत्व था और गजलों की प्रतिष्ठा राजदरबारों और गणिकाओं के कोठों पर प्रसिद्धि पर निर्भर करती थी हालांकि सूरदास और तुलसीदास की रचनाएं अपवाद थीं जो जनमानस के होंठों व ह्रदय में बसी हुईं थीं और कई गणिकायें व्यक्तिगत सुख के लिये या कभी कभी अपने ग्राहकों की मांग पर भक्तिगीतों को भी गाती थीं। यह गणिका भी उसी गणिकावर्ग से थी। पुरुष पुनः अपना भजन गुनगुनाने लगा और गणिका तन्मयता से सुनकर शब्दों, ताल, राग, आरोह अवरोह आदि को स्मृतिबद्ध करती रही । अंततः 5 घंटे बाद लगभग अर्धरात्रि से कुछ पूर्व उन्होंने मथुरा में प्रवेश किया और कुछ पलों बाद पुरुष के निर्देशानुसार एक मंदिर के सामने गाड़ियां रोक दी गयीं। पुरुष नीचे उतरा और सभीको नीचे उतरने का निर्देश दिया। वह स्वयं मंदिर के सिंहद्वार की ओर बढ़ा और जेब से कुंजी निकालकर उसकी सहायता से कपाट खोल दिये । "अंदर आओ" उसने इशारा किया । "मंदिर में?" गणिका आश्चर्यचकित व संकुचित हो उठी । "अंदर आ जाओ, संकुचित होने की आवश्यकता नहीं है " पुरुष ने साधिकार आदेश दिया । उलझन में भरी गणिका और उसकी मंडली अंदर आ गयी। "मैं चादरें और मसनद बिछवाता हूँ, तुम अपने साज जमा लो" "यहां? यह एक मंदिर है । लोग क्या कहेंगे हुजूर ??" गणिका अब भयग्रस्त हो उठी । "कोई कुछ नहीं कह सकेगा। मेरे ठाकुर ने मुझे सारे अधिकार दे रखे हैं।" उन्होंने सबको आश्वस्त करते हुए कहा । "सच बताइये आप कौन हैं?" "इस मन्दिर का मुख्य प्रबंधनकर्ता और मुख्याधिकारी कृष्णदास" उन्होंने उत्तर दिया । गणिका आश्वस्त तो हुई परंतु उसकी उलझन मिटी नहीं। कैसा है ये व्यक्ति जो इस पवित्र स्थान का प्रयोग अपनी महत्वाकांक्षा पूरी करनी के लिए कर रहा है और कैसा है इनका 'ठाकुर' जो इस पवित्र स्थान में मुजरा सुनने का आकांक्षी है? इसी उधेड़बुन में डूबी वह अपना श्रंगार व्यवस्थित करने एक ओर चली गयी जबकि कृष्णदास व साजिंदे दीपों को प्रज्ज्वलित कर बिछावन बिछाने लगे। अंततः साजिंदों ने अपने साज जमा लिये और गणिका भी अपने पूर्ण श्रंगार और मोहक रूप में प्रस्तुत थी। "आपके ठाकुर नहीं पधारे अभी तक?" उसने अपनी मोहक मुस्कुराहट के साथ पूछा । "वे तो यहीं हैं " "कहाँ?" इस प्रश्न के उत्तर में कृष्णदास उठे, गर्भगृह की ओर बढ़े और पट खोल दिये। वहां कान्हाजी अपने पूर्णश्रृंगार में विराजमान थे । "यही हैं मेरे ठाकुर" हतप्रभ स्त्री की निगाहें कृष्ण के श्रीविग्रह से टकराईं। वह चित्रवत जड़ हो गई, कृष्ण छवि में खो गई, बिक गई। जन्म जन्मांतरों के पुण्य प्रकट हो उठे। समय उन पलों में जैसे ठहर गया । "गाओ देवी, कान्हा तुम्हें सुनने का इंतजार कर रहे हैं " कृष्णदास की गंभीर वाणी गूंजी । गणिका के लिये जैसे समस्त संसार अदृश्य हो गया और वह बावली हो उठी। उसकी आँखों में में केवल कृष्ण की छवि थी और कर्ण गह्वरों में सिर्फ एक ध्वनि .. "कान्हा तुम्हें सुनने का इंतजार कर रहे हैं " उसकी आंखें भर आईं और आत्मा की गहराइयों से मधुर तान फूट निकली। साजिंदों ने स्वर छेड़ दिये। कृष्णदास के सिखाये भजन के स्वर गूंज उठे। "मो मन गिरिधर छबि पै अटक्यो।" स्त्री उन शब्दों में जैसेबडूब गई। वह बार बार उन्हीं पंक्तियों को दुहरा रही थी। "मो मन गिरिधर छबि पै अटक्यो।" संगीत की ध्वनि, भावविभोर स्वर .. लोगों की निद्रा टूट गयी और वे आश्चर्यचकित मंदिर में आने लगे। दृश्य अवांक्षित परन्तु अपूर्व था। जनवृन्द का सात्विक रोष गणिका के भावसमुद्र में उतराते शब्दों के साथ बह गया। गणिका ने भजन की अगली पंक्तियाँ उठाईं। "ललित त्रिभंग चाल पै चलि कै" "ललित त्रिभंग चाल पै चलि कै चिबुक चारु गडि ठठक्यो" मो मन गिरिधर छबि पै अटक्यो। मो मन गिरिधर छबि पै अटक्यो।। समस्त जन उन क्षणों में, उन भावभरे शब्दों में जैसे कृष्ण का साक्षात दर्शन कर रहे थे। गणिका आगे बढ़ी-- "सजल स्याम घन बरन लीन ह्वै, "सजल स्याम घन बरन लीन ह्वै फिर चित अनत न भटक्यो।" लोगों की आंसुओं की धारायें बह उठी। समस्त जनवृन्द गा उठा, एक बार, दो बार, बार बार ... "....फिर चित अनत न भटक्यो .... ..….फिर चित अनत न भटक्यो... .....फिर चित अनत न भटक्यो गणिका अपने ही भावसंसार में थी। भावों की चरमावस्था में उसकी आंखें कृष्ण की आंखों से जा मिलीं। गणिका ने और गाना चाहा पर उसके होंठ कुछ थरथराकर शांत हो गये और आंखें कृष्ण की आंखों में अटक गयीं। कृष्ण की आंखों में उसे आमंत्रण दिखाई दे रहा था, उसकी आत्मा विकल हो उठी और अपने स्थान पर बैठे ही बैठे उसने अपनी भुजा कातर मुद्रा में कृष्ण की ओर फैला दी। उसने कान्हाजी के चेहरे पर मुस्कुराहट देखी और वह पूर्ण हो उठी। डबडबाई आंखों से अंततः अश्रुओं की दो धाराएं बह निकलीं और अगले ही क्षण वह भूमि पर निश्चेष्ट होकर गिर गई । भीड़ शांत स्तब्ध हो गई । इस गहन स्तब्धता को कृष्णदास की पगध्वनि ने भंग किया। उन्होंने रामजनी की निश्चल देह को भुजाओं में उठाया और कान्हा के श्रीविग्रह की ओर बढ़ चले । मृत देह कृष्ण चरणों में अर्पित हुई । जीवनपुष्प कृष्णार्पित हुआ । जीवन, निर्माल्य बनकर कृतार्थ हुआ । .....और डबडबाई आंखों से कृष्णदास ने अपने अधूरे भजन की पंक्तियाँ पूर्ण कीं -- '#कृष्णदास_किए_प्रान_निछावर, #यह_तन_जग_सिर_पटक्यो।।

जन्म अष्टमी विशेष

भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की मध्यरात्रि को रोहिणी नक्षत्र व अष्टमी तिथि के संयोग से जयन्ती नामक सर्वाधिक शुभ योग में लगभग 3112 ई०पू० हुआ माना जाता है। संदर्भित मूल ग्रन्थों में वर्णित नक्षत्रों की गणना के आधार पर भगवान श्रीराम का अवतरण इनसे लगभग 2002 वर्ष पूर्व यानी 5114 ई०पू० हुआ माना जाता है। यह मानते हैं कि श्रीराम की 51वीं पीढ़ी के शल्य ने महाभारत के युद्ध में कौरवों की तरफ़ से हिस्सा लिया था..जबकि ख़ुद श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी ने अपनों के ही इस युद्ध में हिस्सा लेने से साफ़ इनकार कर दिया था..!! मानते हैं कि वसुदेव जी व देवकी माता के पुत्र वासुदेव श्रीकृष्ण को जन्म के समय ही उनके मामा कंस की वज़ह से नन्दगाँव के सरपँच नन्दगोप जी व यशोदा माता के पास पहुँचा दिया गया, जिन्होंने श्रीकृष्ण उर्फ़ गोपाल जी का पालन-पोषण किया..!! हमें श्रीकृष्ण के बाल्यकाल में उनकी (बाँके बिहारी जी) लीलाओं की खूब चर्चा सुनने को मिलती है। श्रीकृष्ण से उम्र में लगभग 5-6 वर्ष बड़ी राधा जी के बारे में हम सबने सुना है, पर आश्चर्यजनक रूप से राधा जी की चर्चा न हम महाभारत में सुनते हैं, न भागवत पुराण में..!! महाभारत में बस एक बार जिन राधा जी का जिक्र होता है, वह अँगराज कर्ण की पालक माता थीं। दरअसल राधा जी की चर्चा काफ़ी बाद के ग्रन्थों पद्मपुराण व ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलती है, जिनके आधार पर मध्यकाल या भक्तिकाल के संतों यथा निम्बार्क देव, चैतन्य प्रभु, वल्लभ देव इत्यादि ने श्रीराधा-कृष्ण के युग्म रूप का भरपूर महिमामंडन किया। इन भक्तिकाल के संतों ने राधा जी व कृष्ण जी के आध्यात्मिक प्रेम का तो वर्णन भक्ति संगीत के माध्यम से किया, पर श्रीकृष्ण के योद्धा रूप को भूल गए..!! माना जाता है कि श्रीकृष्ण अन्तिम बार जब राधा जी से मिले, तो श्रीकृष्ण की उम्र महज़ 11 वर्ष थी। उसके बाद श्रीकृष्ण यानी बाँके बिहारी जी की बाल-लीला समाप्त हुई व जिस उद्देश्य से उनका अवतरण द्वापर में हुआ था, वह उसकी पावन प्राप्ति में लग गए..!! ऐसा मानते हैं कि राधा जी की शादी कंस की सेना में कार्यरत रायण से हुई थी। ब्रह्मवैवर्त पुराण की जानकारी भी थोड़ी उलझन भरी है। ऐसा प्रतीत होता है कि बाद में क्षेपक जोड़, उसे और उलझा दिया गया। यह भी मानते हैं कि राधा जी ख़ुद ही श्रीकृष्ण का दूसरा रूप (श्रीलक्ष्मी) थीं। भले ही राधा जी के पिता वृषभानु जी (गोप या वैश्य) थे तथा माता कीर्ति जी थी वैसे, परन्तु उन्हें ईश्वर का अंश होने के नाते 'अयोनिजा' ही माना जाता है यानी जो किसी गर्भ से नहीं, वरन साक्षात अवतरित हुई थीं..!! इनसे सम्बन्धित भी एक कथा है, जिसकी चर्चा फिर कभी.. आधुनिक काल में सनातन के दुष्ट विरोधियों ने जानबूझकर श्रीकृष्ण की छवि को ख़राब करने के लिए ज़बरन उनके व राधा जी के बाल्यकाल के आध्यात्मिक प्रेम को उनके चरित्रहनन के लिए इस्तेमाल किया। इसी प्रकार जिस नरकासुर को मार कर श्रीकृष्ण ने लगभग 16000 कन्यायों को उससे छुड़वाया, उनसे भी उनका नाम गलत तरीक़े से जोड़ कर मज़ाक उड़ाने की कोशिश की जाती है। मध्यकाल में जब भारतभूमि लगातार आक्रान्ताओं व आंतरिक राजनीतिक-सामरिक उछलकूद से त्रस्त थी, तब श्रीकृष्ण की दार्शनिक, स्थिरप्रज्ञ, दूरद्रष्टा व योद्धा छवि को निखारने की बजाए..क्योंकर उनके बाल्यकालीन प्रेमी छवि को उभारा गया, यह वाकई सोचने को बाध्य करता है..!!!!! जहाँ सुदर्शन चक्र की जरूरत थी, वहाँ बाँसुरी बजाया जाने लगा..जबकि वक्त की माँग मध्यकाल में कुछ और थी। जब वीर रस की जरूरत थी, तो वहाँ शृंगार (श्रृंगार) रस पर बल दिया गया..!! ख़ैर..महाभारत के जितने भी प्रमुख पात्र हैं, यहाँ तक कि ख़ुद दुर्योधन भी..श्रीकृष्ण के महान चरित्र की प्रशंसा करते हैं। यहाँ तक कि उनसे चिढ़ा हुआ शिशुपाल भी उनके चरित्र पर कदापि उँगली नहीं उठाता.. श्रीकृष्ण की पटरानी विदर्भ के राजा रुक्मी की बहन रुक्मिणी थीं। जबकि श्रीकृष्ण के पितामह शूरसेन जी (वसुदेव जी के पिता) थे तथा बड़े भाई हलधर बलराम जी व बहन सुभद्रा जी थीं। उनके चचेरे भाइयों के नाम उद्धव व अंगिरस थे। श्रीकृष्ण जी की आयु लगभग 119 वर्ष आँकी गयी है.. यह विविध नामों से जाने गए..जैसे राजस्थान में श्रीनाथ जी या ठाकुर जी, महाराष्ट्र में विट्ठल जी, ओडिशा में जगन्नाथ जी, बंगाल में गोपाल जी, गुजरात में द्वारकाधीश, दक्षिण भारत में वेंकटेश जी या गोविन्दा जी, उत्तर भारत, पूर्वोत्तर भारत व नेपाल में श्रीकृष्ण जी आदि..!! भगवान श्रीकृष्ण के धनुष का नाम 'सारँग', शँख का नाम 'पाञ्चजन्य' व भगवान परशुराम जी द्वारा दिये गए चक्र का नाम 'सुदर्शन' था..!! और हाँ, श्रीराम हों या श्रीकृष्ण या फिर परशुराम जी, ये सारे लोग सनातन परम्परा के अंतर्गत ईश्वर के अवतार माने जाते हैं, न कि ईश्वर के धरती पर भेजे गए कोई दूत..इस बारीक अंतर को ध्यान में रखियेगा..!! साथ ही ईश्वर के अवतार को किसी भी जाति विशेष से जोड़कर अपनी क्षुद्रबुद्धि का परिचय कदापि न देंगे..ऐसा करके आप सनातन परम्परा का तो अपमान करते ही हैं, ख़ुद उन परमपिता परमेश्वर का भी अपमान करते हैं। याद रखें, वर्ण व्यवस्था कर्म-आधारित थी, न कि जन्म-आधारित..!! सुदर्शन चक्रधारी भगवान श्रीकृष्ण की जय हो..🙏

Saturday, August 25, 2018

रक्षाबंधन विशेष : बहन से वादा

सुबह बहन जल्दी उठती है और घर के सारे कामों को खत्म कर अपने भैया को जगाती है बहन - भैया उठो ना,जल्दी से उठो ना, आज आज रक्षाबन्धन है । आप जल्दी से तैयार हो जाओ, मै सबसे पहले आपको राखी बांधुगी । भाई - ठीक है । भाई तैयार हो जाता है और बहन पूजा की थाली, मिठाई और राखी लेकर आती है बहन - भैया अपना दाहिना हाथ आगे बढाओ । भाई अपना हाथ आगे करके राखी बंधवा लेता है और जेब से निकालकर उसको एक खूबसूरत घड़ी देता है । ( जो उसने बहन के लिए एक दिन पहले ही खरीदी थी ) लेकिन बहन मना कर देती है फिर भाई अपने पर्स से कुछ पैसे निकाल कर देता है लेकिन बहन फिर वापस कर देती है तब भाई पुछता है कि बताओ तुम्हे क्या चाहिए ? बहन - जो मागुंगी वो दोगे ? भाई - हां दुंगा । बहन - पहले मुझसे वादा करो ? भाई - हां मैं पक्का वादा करता हूँ कि जो तू मांगेंगी वो मैं दुंगा । अब बोल तुझे क्या चाहिए ? बहन - भैया आज रक्षाबन्धन के दिन आप मुझसे ये वादा करो कि आप आज से मां की बहन की गालियां नहीं दोगे । इतना कहकर उसकी आंखों में आसूं आ जाते हैं । (बहन रोते हुए ) भैया हम लोगों ने आप लोगों का क्या बिगाड़ रखा है जो हमेशा मां की बहन की गालियां देते हो हमें सरेआम बदनाम करते हो । बोलो भैया बोलो भाई - ( सिर नीचे किये हुए चुप है) बहन - आज रक्षाबंधन पर आप मुझसे वादा करते हो कि नहीं ? भाई - ( आत्मग्लानि से रोते हुए ) हां बहन मैं आज तुमसे ये वादा करता हूं कि मैं जीवन में कभी मां की बहन की गाली नहीं दुंगा और ना ही किसी को देने दुंगा । फिर अपने आप को सम्हाल कर बहन को भी चुप कराता है । और कहता है कि...... मिठाई देखकर मुंह में पानी आ रहा है चल अब जल्दी से मिठाई खिला बहन थोड़ा हंसने लगती है उसकी आंखों में अभी भी आंसू थे लेकिन ये आंसू खुशी के थे, भाई पर आत्मविश्वास के थे ।

Thursday, August 23, 2018

काठगोदाम नाम क्यो

"काठगोदाम" _________________________________________________________________ यह काठगोदाम का रेलवे स्टेशन है। किंतु मैं तो कभी काठगोदाम गया नहीं। जैसे कि मैं कभी लैंसडोन ही कहां गया। किंतु लैंसडोन को जैसे सोचता रहता हूं, उसके कठगुलाबों को मन में संजोये रहता हूं, वैसे ही काठगोदाम को भी सोचता रहा हूं। इसलिए सोच के अहाते में काठगोदाम की एक जगह बन गई है। कुमाऊं के कोनों-अंतरों तक इसके बाद सड़क जाती है। रेल लाइन काठगोदाम आकर चुक जाती है। वो रेल, जो सन् 1884 में सबसे पहले यहां पहुँची थी, कूक का कहरवा गाते! धूप से भरा यह दृश्य! पहाड़ों की कोमल पीली धूप। जिसे श्रीनरेश मेहता "पीताम्बरा" कहते, आकाश में देववस्त्रों सी अकलंक बताते। और फिर "धूप-कृष्णा" कहकर एक वरेण्य संज्ञा से अभिहित कर देते। इसका नाम भले "काठगोदाम" हो, मैं तो इसे "धूप-शहर" कहकर ही बुलाऊंगा। धरा पर धूप का धाम! किंतु यह धूप-शहर तो है नहीं, काठगोदाम है, इसलिए फ़िलवक़्त तो यही पूछा जाए कि यह काठगोदाम ही क्यों है। काठ का गोदाम यानी "टिम्बर डिपो"। यहां पर सच में ही बड़ा-सा टिम्बर डिपो एक ज़माने में हुआ करता था। टिम्बर किंग ऑफ़ इंडिया कहलाने वाले दान सिंह के चौहान पट्‌टे में पड़ने वाला इलाक़ा। फ़िरंगियों के दफ़्तरों में आज भी इसका नाम "चौहान पट्‌टा" ही मिलता है, किंतु वक़्त के साथ यह काठगोदाम हो गया, जो निहायत ही ख़ूबसूरत नाम है। यों तो पहाड़ों के समस्त इलाक़े ही काठगोदाम हैं, किंतु वृक्षों के जीवित काष्ठ वाले। टिम्बर डिपो वाला जो काठगोदाम होता है, वहाँ वृक्षों के शव होते हैं, जिन्हें क़तार में उसी तरह सजाया जाता है, जैसे मनुष्यों के शव हस्पतालों के अहातों में क़तार से सजाए जाते हैं। काफ़्का होता तो काठ के वैसे ही किसी गोदाम को देखकर कहता- "पेड़ के इन लट्ठों को एक-एक कर लुढ़का दूं तो?" फिर आगे कहता- "जो दरख़्त धरती में जड़ें जमाए मालूम होते हैं, कहीं वह भी वहम तो नहीं? एक धक्के से कहीं वे भी तो लुढ़कने नहीं लगेंगे?" लेकिन मुझे यह नाम रुच गया है- "काठगोदाम"। कवि अज्ञेय ने कहा था- "ताज़ा चिरी लकड़ी की गंध जिसमें हो, वैसी भाषा मुझको चाहिए।" वैसी भाषा का तो मालूम नहीं, किंतु इस शब्द से मुझे वैसी ही गंध आती है- "काठगोदाम"। काठ की गंध से भरी नामसंज्ञा। इधर के शहरों-क़स्बों के नाम ऐसे ही हैं। किसी के नाम में ताल जुड़ा है- नैनीताल, भीमताल, नौकुछियाताल। किसी के नाम में खेत जुड़ा है- रानीखेत। किसी के नाम में डेरा जुड़ा है- देहरादून। किसी के नाम में वन जुड़ा है- हल्द्वानी। हल्द्वानी यानी हल्दू का वन! इधर लालकुंआ-हल्द्वानी मार्ग पर हल्दू का एक बड़ा-सा दरख़्त हुआ करता था, जिसके नाम पर ही उस इलाक़े को मोटाहल्दू कहा जाने लगा था। रामपुर-काठगोदाम सड़क के काम में जब उसे काट दिया गया तो वहां के लोगों को लगा, जैसे उनके परिवार के किसी सदस्य की हत्या कर दी गई हो। तब धूप के उस देश में शोक का अंधेरा व्याप गया! मैंने हल्दू का पेड़ कभी देखा नहीं है, केवल हल्द्वानी का नाम सुना है। मैंने काठगोदाम भी देखा नहीं है, केवल काठ की गंध का अनुभव किया है। मैंने पहाड़ की धूप तक नहीं देखी! लेकिन जितने लोग पहाड़ों से लौटकर पठारों पर आए, उनमें से किसी ने भी किसी पहाड़ी क़स्बे को कभी "धूप-शहर" कहकर नहीं पुकारा। मैंने पुकारा! जब तक लैंसडोन, नैनीताल और हल्द्वानी में यों ही नहीं चला जाता, जैसे बारिश होती है, जैसे रात घिरती है, तब तक मैं संतोष की इस कनी को ही अपने कमीज़ की जेब में सम्हाले रक्खूंगा कि धूप से धुले काठगोदाम टेसन को निमिष भर निहारा! सुशोभित की कलम से

Wednesday, August 22, 2018

अटल मोदी व महाभारत

महाभारत काल के दौरान आप देखिए कि कौरवों को सिर्फ युधिष्टिर सबसे अच्छे लगते थे...! जानते हैं क्यों...??? क्योंकि वो धर्मराज थे, हर कार्य को धर्म की कसौटी से ही देखा करते थे, सीधे थे, सरल थे, और कई बार धर्म का हवाला देकर और धार्मिक मान्यताओं के कारण अन्य पांडवों पर दबाव डालने में भी सफल रहते थे...! कई ऐसे मौके और उदाहरण है, चाहे वनवास के लिए तैयार हो जाना हो, चाहे अज्ञातवास जैसी कठिन शर्त को सहर्ष तैयार हो जाना हो, चाहे पूरे राज्य को छोड़ 5 गांव मांगने का प्रस्ताव हो, चाहे द्रौपदी को जुए में दांव लगाने को तैयार हो जाना हो........युधिष्टिर हमेशा ही सर्व सुलभ होते थे, और अन्य पांडवों की अपेक्षा उन्हें मनाना आसान हुआ करता था, और धर्म के नाम पे तो उन्हें बड़ी आसानी से मिलाया जा सकता था...! अब आइये ये जानते हैं कि कौन से पांडव से कौरव या दुर्योधन सबसे ज्यादा चिढ़ते थे...??? तो इसका उत्तर है अर्जुन और भीम...! भीम से तो दुर्योधन का पुराना वैमनस्य था ही, दोनों ही गदा धारी थे और लगभग समान बलशाली भी थे, भीम थोड़े से आक्रामक भी थे, युधिष्टिर के लिहाज की वजह से वो मन मसोस कर रह जाते थे, अन्यथा तो वो अकेले ही सभी कौरवों को मारने में समर्थ थे.....और महाभारत के रण में ये काम उन्होंने किया भी था...! अर्जुन हमेशा से ही कौरवों की आंखों में इसलिए खटकते रहे थे, क्योंकि वो गुरु द्रोणाचार्य के प्रिय भी थे और उन जैसा धनुर्धारी कोई था ही नही.........ऊपर से अर्जुन का सबसे बड़ा शत्रु कर्ण था, जो दुर्योधन का सबसे बड़ा मित्र था, लेकिन अर्जुन भी धर्मराज युधिष्टिर द्वारा बनाई गई मर्यादाओं में बंधे थे...! लेकिन फर्क तब पड़ा जब पांडवों को श्रीकृष्ण का साथ मिला, कृष्ण ने ही अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया, धर्म और अधर्म का फर्क समझाया, उन्होंने ही ये समझाया कि धर्म की विजय के लिए जो तरीका अपनाना पड़े, अपनाना चाहिए...! इसी वजह से अर्जुन को कई विजय प्राप्त हुई, इसी वजह से अर्जुन भीष्म पितामह पर विजय प्राप्त कर पाए, फिर जयद्रथ का संहार हो, या कर्ण का वध हो, ये सब कुछ तभी संभव था जबतक श्री कृष्ण अपनी लीला ना दिखाते और अर्जुन को धर्म-अधर्म के मायाजाल से ना निकालते...! कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि कौरव युधिष्ठिर को इसलिए मानते थे, क्योंकि वो एक आसान से शिकार थे उनके लिए, उन्हें मनाना आसान था........वहीं ये लोग अर्जुन और भीम से इसलिए चिढ़ा करते थे, क्योंकि ये उन्ही के तौर तरीकों को इस्तेमाल करने में विश्वास किया करते थे...! धर्म से धर्म और अधर्म से अधर्म को काटने की कला इन दोनों में ही थी, जिसमे श्री कृष्ण का भी योगदान था...! अब जैसा कि आप लोगों ने भी देखा होगा कि जब से अटल जी देहावसान हुआ है तभी से अलग अलग चैनलो पर बहस, सोशल मीडिया पर अनगिनत पोस्ट, नाना प्रकार के तर्क कुतर्क किये जा रहे हैं...! यदि विरोधियों के इन सब प्रपंच का सारांश निकालें तो यह बात निकलती है कि वाजपेयी जी एक अजातशत्रु थे...! सभी पक्ष और विपक्ष के लोग उनका सम्मान करते थे...! वे एक सर्वमान्य नेता थे जो सेक्युलर और लिबरल ढांचे में फिट होते थे...! और इन्ही बातों के सहारे मोदीजी की सरकार और उनके अन्य नेताओं पर टीका टिप्पणी भी की गयी...! सब मिलाकर कोई कोर कसर और मौका नही छोड़ा गया मोदीजी और उनकी सरकार को नीचा दिखाने का, जबकि चाहे मोदी जी हों, चाहे शाह हों, आडवाणी जी हों, राजनाथ सिंह जी हों या स्वयं वाजपेयी जी हों......इन सभी की विचारधारा एक ही रही है, हां समय और काल का फर्क इनके कार्यो पर जरूर दिख जाता है......और ये ठीक ही है...! लेकिन इनकी चिढ़ का कारण क्या है मेरे समझ मे यही नहीं आ रहा है......वाजपेयी जी कर्म योगी थे, लेकिन वो राजनीत को एक धर्म मान कर चलते थे, इसमे उनकी कोई गलती नही थी, वो शायद गलत विपक्ष के बीच मे अवतरित हुए थे, उनके हर धर्म का जवाब विपक्ष ने अधर्म से दिया था...! जोड़ तोड़ की सरकार को चिमटे तक से ना छूने वाले वाजपेयी जी को सत्ता का लालची बता कर, सारे अनैतिक रास्ते अपना कर कभी 13 दिन में कभी 13 महीने में, एक एक वोट से सरकार गिरा भारत को अनिश्चितता के दौर में धकेलने का दुष्कर्म इस अनैतिक विपक्ष ने ही किया था...! सब कुछ सही हो कर भी, जनमत संदेश पा कर भी सत्ता से अपदस्थ किये जाने के बाद के वाजपेयी जी के बयानों को सुनिए.....उन्हें सत्ता का लालच तो नही था, लेकिन इस राजनीति द्युत के खेल में उन्हें हर बार विपक्ष के शकुनि छलते थे, और वे कातर दृष्टि से देखने के अलावा कुछ नही कर पाते थे...! संसद में मजाक उड़ाया जाता था, कहा जाता था कि ये तो गायों के तबेले की पार्टी है........इन्हें जानता ही कौन है......हरियाणा से ऊपर और गुजरात से नीचे इन्हें पहचानता ही कौन है...? 2004 में हार के जो कारण रहे हो, लेकिन उससे आज की राजनीति के धर्मराज को ऐसा झटका लगा था कि कुछ सालों में वे सार्वजनिक जीवन से सन्यास ही ले बैठे, बोलना तक बिसार दिया...! लेकिन ये विपक्षी शायद ये भूल गए थे कि कहीं भीम और अर्जुन तो पल रहे थे, बड़े हो रहे थे...! 10 साल के शासन के पश्चात 2014 में बाजी फिर से पलटती है, एक ऐसा नेता चुन कर आता है जिसे पिछले 12 सालो से हर दिन हर क्षण एक नई कसौटी पे परखा गया हो। जिसे जहां मौका लगा हो विपक्ष ने बेइज्जत करने का कोई मौका ना छोड़ा हो...! और पहले ही दिन से विपक्षी खेमे में कोलाहल मच जाता है, उस इंसान से इतना डर कि हर दूसरे दिन कोई नया शिगूफा पैदा किया जाता है, ताकि उसकी बढ़ती मान्यता को कम किया जा सके...! अरे ये तो चाय बेचने वाला है, अरे इसको गुजरात से बाहर जानता ही कौन है, अरे ये तो नीच है, मौत का सौदागर है, हिटलर है, फ़ासिस्ट है और ना जाने क्या क्या...! लेकिन वो बदले में क्या करता है.........वो आपकी ही तरकीबो को इस्तेमाल करता है......वो भी साम दाम दण्ड भेद सब कुछ इस्तेमाल करता है और एक के बाद एक राज्यो से आपके नामो निशान हटाता जाता है.......आपको समझ ही नही आ रहा कि हो क्या रहा है...??? आप चिल्ला रहे हैं, चीख रहे है, तड़प रहे हैं, तिलमिला रहे है.......आप चाह रहे हैं कि कैसे इसका चक्रव्यूह तोड़ें......कैसे इससे बचें......कैसे अपने बचे हुए आधार को बचाए रखें...??? जब आपको मौके नही मिलते तो आप बनाने लगते हैं...........असहिंष्णुता का स्वांग रचते हैं.......फिर दलित हिंसा पर छाती पीटते हैं.....कभी अल्पसंख्यकों की याद आती है......कभी सेना की आड़ लेते हैं.........कभी व्यापारियों को चारा बनाते हैं, लेकिन कुछ नही होता...! फिर आपको ये राजनीति बुरी लगने लगती है.......आपको वाजपेयी जी अच्छे लगने लगते हैं.....क्योंकि वे सौम्य थे.....सरल थे.....ईमानदार थे......आसानी से विश्वास कर लेते थे......आसानी से आपके चंगुल में फंस जाते थे...! लेकिन ये नया योद्धा तो आपको आपकी ही भाषा मे जवाब देने में पारंगत है.....तो वो भला क्यों अच्छा लगेगा...! खैर.....छोड़िये ये तो आदत है आपकी.......पहले मुखर्जी बुरे लगे, उन्हें गिरफ्तार किया और मरवा दिया, फिर आपको वाजपेयी और आडवाणी बुरे लगे.....धीरे धीरे वाजपेयी आपको अच्छे लगने लगे क्योंकि कोसने के लिए आडवाणी थे.....बाकि आपका व्यवहार दोनों के ही किये समान था.....आज मोदी हैं तो आपको वाजपेयी-आडवाणी की विरासत पे प्यार आता है...! ये सब को मालूम है कि आज नहीं तो कल आपको मोदी भी भगवान सरीखे लगने लगेंगे जब वो अपनी राजनीतिक विरासत को अपने उत्तराधिकारी के कांधो पे रखेंगे......क्योंकि वो योद्धा तो आपको सांस भी नही लेने देगा......... क्या करें आप ही से तो सीखे हैं ये राजनीति के दांव पेंच......अब तो अमल में लाने शुरू किए है......आगे आगे देखिए होता है क्या...?

Sunday, August 19, 2018

कैसे मनाए रक्षाबंधन का पर्व

रक्षा बंधन के पर्व की वैदिक विधि -वैदिक रक्षा सूत्र बनाने की विधि : इसके लिए ५ वस्तुओं की आवश्यकता होती है - (१) दूर्वा (घास) (२) अक्षत (चावल) (३) केसर (४) चन्दन (५) सरसों के दाने । इन ५ वस्तुओं को रेशम के कपड़े में लेकर उसे बांध दें या सिलाई कर दें, फिर उसे कलावा में पिरो दें, इस प्रकार वैदिक राखी तैयार हो जाएगी । इन पांच वस्तुओं का महत्त्व - (१) दूर्वा - जिस प्रकार दूर्वा का एक अंकुर बो देने पर तेज़ी से फैलता है और हज़ारों की संख्या में उग जाता है, उसी प्रकार मेरे भाई का वंश और उसमे सदगुणों का विकास तेज़ी से हो । सदाचार, मन की पवित्रता तीव्रता से बदता जाए । दूर्वा गणेश जी को प्रिय है अर्थात हम जिसे राखी बाँध रहे हैं, उनके जीवन में विघ्नों का नाश हो जाए । (२) अक्षत - हमारी गुरुदेव के प्रति श्रद्धा कभी क्षत-विक्षत ना हो सदा अक्षत रहे । (३) केसर - केसर की प्रकृति तेज़ होती है अर्थात हम जिसे राखी बाँध रहे हैं, वह तेजस्वी हो । उनके जीवन में आध्यात्मिकता का तेज, भक्ति का तेज कभी कम ना हो । (४) चन्दन - चन्दन की प्रकृति तेज होती है और यह सुगंध देता है । उसी प्रकार उनके जीवन में शीतलता बनी रहे, कभी मानसिक तनाव ना हो । साथ ही उनके जीवन में परोपकार, सदाचार और संयम की सुगंध फैलती रहे । (५) सरसों के दाने - सरसों की प्रकृति तीक्ष्ण होती है अर्थात इससे यह संकेत मिलता है कि समाज के दुर्गुणों को, कंटकों को समाप्त करने में हम तीक्ष्ण बनें । इस प्रकार इन पांच वस्तुओं से बनी हुई एक राखी को सर्वप्रथम भगवान -चित्र पर अर्पित करें । फिर बहनें अपने भाई को, माता अपने बच्चों को, दादी अपने पोते को शुभ संकल्प करके बांधे । इस प्रकार इन पांच वस्तुओं से बनी हुई वैदिक राखी को शास्त्रोक्त नियमानुसार बांधते हैं हम पुत्र-पौत्र एवं बंधुजनों सहित वर्ष भर सूखी रहते हैं । राखी बाँधते समय बहन यह मंत्र बोले – येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल: | तेन त्वां अभिबन्धामि रक्षे मा चल मा चल || शिष्य गुरु को रक्षासूत्र बाँधते समय – ‘अभिबन्धामि ‘ के स्थान पर ‘रक्षबन्धामि’ कहे | और चाकलेट ना खिलाकर भारतीय मिठाई या गुड से मुहं मीठा कराएँ। अपना देश अपनी सभ्यता अपनी संस्कृति अपनी भाषा अपना गौरव वन्दे मातरम्

Saturday, August 18, 2018

महाभारत में भोजन प्रबंधन : श्रीकृष्ण

महाभारत को हम सही मायने में विश्व का प्रथम विश्वयुद्ध कह सकते हैं क्यूंकि शायद ही कोई ऐसा राज्य था जिसने इस युद्ध में भाग नहीं लिया।
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आर्यावर्त के समस्त राजा या तो कौरव अथवा पांडव के पक्ष में खड़े दिख रहे थे। बलराम और रुक्मी ये दो ही व्यक्ति ऐसे थे जिन्होंने इस युद्ध में भाग नहीं लिया।
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कम से कम हम सभी तो यही जानते हैं। किन्तु एक और राज्य ऐसा था जो युद्ध क्षेत्र में होते हुए भी युद्ध से विरत था। वो था दक्षिण के "उडुपी" का राज्य।
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जब उडुपी के राजा अपनी सेना सहित कुरुक्षेत्र पहुँचे तो कौरव और पांडव दोनों उन्हें अपनी ओर मिलाने का प्रयत्न करने लगे।
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उडुपी के राजा अत्यंत दूरदर्शी थे। उन्होंने कृष्ण से पूछा - "हे माधव ! दोनों ओर से जिसे भी देखो युद्ध के लिए लालायित दिखता है किन्तु क्या किसी ने सोचा है कि दोनों ओर से उपस्थित इतनी विशाल सेना के भोजन का प्रबंध कैसे होगा ?
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इस पर कृष्ण ने कहा - महाराज ! आपने बिलकुल उचित सोचा है। आपके इस बात को छेड़ने पर मुझे प्रतीत होता है कि आपके पास इसकी कोई योजना है। अगर ऐसा है तो कृपया बताएं।
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इसपर उडुपी नरेश ने कहा - "हे वासुदेव ! ये सत्य है। भाइयों के बीच हो रहे इस युद्ध को मैं उचित नहीं मानता इसी कारण इस युद्ध में भाग लेने की इच्छा मुझे नहीं है।
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किन्तु ये युद्ध अब टाला नहीं जा सकता इसी कारण मेरी ये इच्छा है कि मैं अपनी पूरी सेना के साथ यहाँ उपस्थित समस्त सेना के भोजन का प्रबंध करूँ।
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इस पर कृष्ण ने हर्षित होते हुए कहा - "महाराज ! आपका विचार अति उत्तम है। इस युद्ध में लगभग ५०००००० (५० लाख) योद्धा भाग लेंगे और अगर आप जैसे कुशल राजा उनके भोजन के प्रबंधन को देखेगा तो हम उस ओर से निश्चिंत ही रहेंगे।
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वैसे भी मुझे पता है कि सागर जितनी इस विशाल सेना के भोजन प्रबंधन करना आपके और भीमसेन के अतिरिक्त और किसी के लिए भी संभव नहीं है।
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भीमसेन इस युद्ध से विरत हो नहीं सकते अतः मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप अपनी सेना सहित दोनों ओर की सेना के भोजन का भार संभालिये।" इस प्रकार उडुपी के महाराज ने सेना के भोजन का प्रभार संभाला।
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पहले दिन उन्होंने उपस्थित सभी योद्धाओं के लिए भोजन का प्रबंध किया। उनकी कुशलता ऐसी थी कि दिन के अंत तक एक दाना अन्न का भी बर्बाद नहीं होता था।
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जैसे-जैसे दिन बीतते गए योद्धाओं की संख्या भी कम होती गयी। दोनों ओर के योद्धा ये देख कर आश्चर्यचकित रह जाते थे कि हर दिन के अंत तक उडुपी नरेश केवल उतने ही लोगों का भोजन बनवाते थे जितने वास्तव में उपस्थित रहते थे।
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किसी को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर उन्हें ये कैसे पता चल जाता है कि आज कितने योद्धा मृत्यु को प्राप्त होंगे ताकि उस आधार पर वे भोजन की व्यवस्था करवा सकें।
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इतने विशाल सेना के भोजन का प्रबंध करना अपने आप में ही एक आश्चर्य था और उसपर भी इस प्रकार कि अन्न का एक दाना भी बर्बाद ना हो, ये तो किसी चमत्कार से कम नहीं था।
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अंततः युद्ध समाप्त हुआ और पांडवों की जीत हुई। अपने राज्याभिषेक के दिन आख़िरकार युधिष्ठिर से रहा नहीं गया और उन्होंने उडुपी नरेश से पूछ ही लिया
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हे महाराज ! समस्त देशों के राजा हमारी प्रशंसा कर रहे हैं कि किस प्रकार हमने कम सेना होते हुए भी उस सेना को परास्त कर दिया जिसका नेतृत्व पितामह भीष्म, गुरु द्रोण और हमारे ज्येष्ठ भ्राता कर्ण जैसे महारथी कर रहे थे।
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किन्तु मुझे लगता है कि हम सब से अधिक प्रशंसा के पात्र आप है जिन्होंने ना केवल इतनी विशाल सेना के लिए भोजन का प्रबंध किया अपितु ऐसा प्रबंधन किया कि एक दाना भी अन्न का व्यर्थ ना हो पाया। मैं आपसे इस कुशलता का रहस्य जानना चाहता हूँ।
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इसपर उडुपी नरेश ने हँसते हुए कहा - "सम्राट ! आपने जो इस युद्ध में विजय पायी है उसका श्रेय किसे देंगे ?
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इसपर युधिष्ठिर ने कहा "श्रीकृष्ण के अतिरिक्त इसका श्रेय और किसे जा सकता है ? अगर वे ना होते तो कौरव सेना को परास्त करना असंभव था।
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तब उडुपी नरेश ने कहा "हे महाराज ! आप जिसे मेरा चमत्कार कह रहे हैं वो भी श्रीकृष्ण का ही प्रताप है।" ऐसा सुन कर वहाँ उपस्थित सभी लोग आश्चर्यचकित हो गए।
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तब उडुपी नरेश ने इस रहस्य पर से पर्दा उठाया और कहा - "हे महाराज! श्रीकृष्ण प्रतिदिन रात्रि में मूँगफली खाते थे।
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मैं प्रतिदिन उनके शिविर में गिन कर मूँगफली रखता था और उनके खाने के पश्चात गिन कर देखता था कि उन्होंने कितनी मूंगफली खायी है।
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वे जितनी मूँगफली खाते थे उससे ठीक १००० गुणा सैनिक अगले दिन युद्ध में मारे जाते थे। अर्थात अगर वे ५० मूँगफली खाते थे तो मैं समझ जाता था कि अगले दिन ५०००० योद्धा युद्ध में मारे जाएँगे।
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उसी अनुपात में मैं अगले दिन भोजन कम बनाता था। यही कारण था कि कभी भी भोजन व्यर्थ नहीं हुआ।" श्रीकृष्ण के इस चमत्कार को सुनकर सभी उनके आगे नतमस्तक हो गए।
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ये कथा महाभारत की सबसे दुर्लभ कथाओं में से एक है। कर्नाटक के उडुपी जिले में स्थित कृष्ण मठ में ये कथा हमेशा सुनाई जाती है।
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ऐसा माना जाता है कि इस मठ की स्थापना उडुपी के सम्राट द्वारा ही करवाई गयी थी जिसे बाद में माधवाचार्य ने आगे बढ़ाया।

मोहे गिरधर गोपाल : जन्माष्टमी विशेष

अदभुत देवेन्द्र सिकरवार का लेख अदभुत! ***************************************** #मो_मन_गिरिधर_छवि_पे_अटक्यो भारत अपने अधोपतन के कालखंड स...