Sunday, September 2, 2018
मोहे गिरधर गोपाल : जन्माष्टमी विशेष
जन्म अष्टमी विशेष
Saturday, August 25, 2018
रक्षाबंधन विशेष : बहन से वादा
Thursday, August 23, 2018
काठगोदाम नाम क्यो
Wednesday, August 22, 2018
अटल मोदी व महाभारत
Sunday, August 19, 2018
कैसे मनाए रक्षाबंधन का पर्व
Saturday, August 18, 2018
महाभारत में भोजन प्रबंधन : श्रीकृष्ण
महाभारत को हम सही मायने में विश्व का प्रथम विश्वयुद्ध कह सकते हैं क्यूंकि शायद ही कोई ऐसा राज्य था जिसने इस युद्ध में भाग नहीं लिया।
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आर्यावर्त के समस्त राजा या तो कौरव अथवा पांडव के पक्ष में खड़े दिख रहे थे। बलराम और रुक्मी ये दो ही व्यक्ति ऐसे थे जिन्होंने इस युद्ध में भाग नहीं लिया।
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कम से कम हम सभी तो यही जानते हैं। किन्तु एक और राज्य ऐसा था जो युद्ध क्षेत्र में होते हुए भी युद्ध से विरत था। वो था दक्षिण के "उडुपी" का राज्य।
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जब उडुपी के राजा अपनी सेना सहित कुरुक्षेत्र पहुँचे तो कौरव और पांडव दोनों उन्हें अपनी ओर मिलाने का प्रयत्न करने लगे।
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उडुपी के राजा अत्यंत दूरदर्शी थे। उन्होंने कृष्ण से पूछा - "हे माधव ! दोनों ओर से जिसे भी देखो युद्ध के लिए लालायित दिखता है किन्तु क्या किसी ने सोचा है कि दोनों ओर से उपस्थित इतनी विशाल सेना के भोजन का प्रबंध कैसे होगा ?
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इस पर कृष्ण ने कहा - महाराज ! आपने बिलकुल उचित सोचा है। आपके इस बात को छेड़ने पर मुझे प्रतीत होता है कि आपके पास इसकी कोई योजना है। अगर ऐसा है तो कृपया बताएं।
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इसपर उडुपी नरेश ने कहा - "हे वासुदेव ! ये सत्य है। भाइयों के बीच हो रहे इस युद्ध को मैं उचित नहीं मानता इसी कारण इस युद्ध में भाग लेने की इच्छा मुझे नहीं है।
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किन्तु ये युद्ध अब टाला नहीं जा सकता इसी कारण मेरी ये इच्छा है कि मैं अपनी पूरी सेना के साथ यहाँ उपस्थित समस्त सेना के भोजन का प्रबंध करूँ।
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इस पर कृष्ण ने हर्षित होते हुए कहा - "महाराज ! आपका विचार अति उत्तम है। इस युद्ध में लगभग ५०००००० (५० लाख) योद्धा भाग लेंगे और अगर आप जैसे कुशल राजा उनके भोजन के प्रबंधन को देखेगा तो हम उस ओर से निश्चिंत ही रहेंगे।
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वैसे भी मुझे पता है कि सागर जितनी इस विशाल सेना के भोजन प्रबंधन करना आपके और भीमसेन के अतिरिक्त और किसी के लिए भी संभव नहीं है।
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भीमसेन इस युद्ध से विरत हो नहीं सकते अतः मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप अपनी सेना सहित दोनों ओर की सेना के भोजन का भार संभालिये।" इस प्रकार उडुपी के महाराज ने सेना के भोजन का प्रभार संभाला।
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पहले दिन उन्होंने उपस्थित सभी योद्धाओं के लिए भोजन का प्रबंध किया। उनकी कुशलता ऐसी थी कि दिन के अंत तक एक दाना अन्न का भी बर्बाद नहीं होता था।
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जैसे-जैसे दिन बीतते गए योद्धाओं की संख्या भी कम होती गयी। दोनों ओर के योद्धा ये देख कर आश्चर्यचकित रह जाते थे कि हर दिन के अंत तक उडुपी नरेश केवल उतने ही लोगों का भोजन बनवाते थे जितने वास्तव में उपस्थित रहते थे।
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किसी को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर उन्हें ये कैसे पता चल जाता है कि आज कितने योद्धा मृत्यु को प्राप्त होंगे ताकि उस आधार पर वे भोजन की व्यवस्था करवा सकें।
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इतने विशाल सेना के भोजन का प्रबंध करना अपने आप में ही एक आश्चर्य था और उसपर भी इस प्रकार कि अन्न का एक दाना भी बर्बाद ना हो, ये तो किसी चमत्कार से कम नहीं था।
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अंततः युद्ध समाप्त हुआ और पांडवों की जीत हुई। अपने राज्याभिषेक के दिन आख़िरकार युधिष्ठिर से रहा नहीं गया और उन्होंने उडुपी नरेश से पूछ ही लिया
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हे महाराज ! समस्त देशों के राजा हमारी प्रशंसा कर रहे हैं कि किस प्रकार हमने कम सेना होते हुए भी उस सेना को परास्त कर दिया जिसका नेतृत्व पितामह भीष्म, गुरु द्रोण और हमारे ज्येष्ठ भ्राता कर्ण जैसे महारथी कर रहे थे।
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किन्तु मुझे लगता है कि हम सब से अधिक प्रशंसा के पात्र आप है जिन्होंने ना केवल इतनी विशाल सेना के लिए भोजन का प्रबंध किया अपितु ऐसा प्रबंधन किया कि एक दाना भी अन्न का व्यर्थ ना हो पाया। मैं आपसे इस कुशलता का रहस्य जानना चाहता हूँ।
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इसपर उडुपी नरेश ने हँसते हुए कहा - "सम्राट ! आपने जो इस युद्ध में विजय पायी है उसका श्रेय किसे देंगे ?
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इसपर युधिष्ठिर ने कहा "श्रीकृष्ण के अतिरिक्त इसका श्रेय और किसे जा सकता है ? अगर वे ना होते तो कौरव सेना को परास्त करना असंभव था।
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तब उडुपी नरेश ने कहा "हे महाराज ! आप जिसे मेरा चमत्कार कह रहे हैं वो भी श्रीकृष्ण का ही प्रताप है।" ऐसा सुन कर वहाँ उपस्थित सभी लोग आश्चर्यचकित हो गए।
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तब उडुपी नरेश ने इस रहस्य पर से पर्दा उठाया और कहा - "हे महाराज! श्रीकृष्ण प्रतिदिन रात्रि में मूँगफली खाते थे।
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मैं प्रतिदिन उनके शिविर में गिन कर मूँगफली रखता था और उनके खाने के पश्चात गिन कर देखता था कि उन्होंने कितनी मूंगफली खायी है।
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वे जितनी मूँगफली खाते थे उससे ठीक १००० गुणा सैनिक अगले दिन युद्ध में मारे जाते थे। अर्थात अगर वे ५० मूँगफली खाते थे तो मैं समझ जाता था कि अगले दिन ५०००० योद्धा युद्ध में मारे जाएँगे।
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उसी अनुपात में मैं अगले दिन भोजन कम बनाता था। यही कारण था कि कभी भी भोजन व्यर्थ नहीं हुआ।" श्रीकृष्ण के इस चमत्कार को सुनकर सभी उनके आगे नतमस्तक हो गए।
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ये कथा महाभारत की सबसे दुर्लभ कथाओं में से एक है। कर्नाटक के उडुपी जिले में स्थित कृष्ण मठ में ये कथा हमेशा सुनाई जाती है।
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ऐसा माना जाता है कि इस मठ की स्थापना उडुपी के सम्राट द्वारा ही करवाई गयी थी जिसे बाद में माधवाचार्य ने आगे बढ़ाया।
अटल विहारी वाजपेयी : एक महान योद्धा
Wednesday, July 25, 2018
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Tuesday, July 17, 2018
चाहे सारी दुनिया समाप्त हो जाये पर हम समाप्त नहीं होंगें क्योंकि हम तो सनातनी हैं।
और हम समाप्त होने वाले नहीं हैं। ये एक बेहद ही झूठा, बेहूदा और अनर्गल प्रचार है, जिसे हमारी कायरता ने पैदा किया है। ईसाई और मुसलमान, इन दो संप्रदाय के पैदा होने से पहले पूरे विश्व में केवल हम ही हम थे। अब जरा सोचो कि -
आज हम है कहाँ ?
हमारी स्थिति क्या है ?
हमारा भूतकाल हमारे भविष्य को कितना भयावह बयां कर रहा है ?
सभी नेताओं और पार्टियों (कोई विशेष नहीं) ने हम हिन्दुओं से हमारे विनाश के आँकड़े छुपा कर हमें पूर्ण रूप से मूर्ख बना दिया है।
जब हिन्दुस्तान में प्रथम लुटेरे मोहम्मद बिन कासिम ने पहली बार हिन्दुओं को जीता तो उस समय पूरी दुनिया में 70 करोड़ हिन्दू और 15 लाख मुसलमान थे।
जब अंग्रेजों ने हिन्दुस्तान का राज अपने हाथ में लिया तब हिन्दू लगभग 1000 साल में केवल 20 करोड़ रह गये थे। इसका अर्थ यह नहीं है कि 1000 साल में 50 करोड़ हिन्दुओं का क़त्ल हुआ, इसका अर्थ है कि 1000 साल में कम से कम 500 करोड़ हिन्दुओं का क़त्ल विदेशी लुटेरों ने किया था।
हम अंग्रेजों की गुलामी को गुलामी बोलते है किन्तु सत्य तो यह है कि अंग्रेजों ने तो हमारी आज़ादी का मार्ग तैयार किया था।
अगर अंग्रेज इस देश में ना आते तो हमारा हिन्दू के रूप में नामो-निशान अब तक मिट चुका होता। इस हिन्दुओं की पवित्र भूमि पर मदरसे और उर्दू ने गुरुकुल और संस्कृत का स्थान ले लिया था।
ये बहुत बड़ा विषय है और हमारे व्हाट्स एप और फेसबुक के बेताज बादशाहों को इतनी बड़ी पोस्ट पढ़ने की आदत कम ही है। मैं आपको केवल इतना बताना चाहता हूँ कि झूठी डींगों के कारण आज हिन्दू विनाश की और बहुत तीव्रता से बढ़ रहा है।
"हिन्दुओं अब तो धरातल पर आ जाओ और सच का सामना करो"
आज अपनी ही भूमि पर हिन्दू संस्कृति अपने अंतिम दौर में है क्योंकि यहाँ बहुत जल्दी मुस्लिम जनसंख्या तथाकथित "अल्पसंख्यक" के स्थान पर "बहुसंख्यक" हो जाने वाली है और अगर एक बार भी ये हो गया तो स्वयं देवाधिदेव भगवान महादेव शिव और जगद्जननी माँ जगदम्बा भी हिन्दुओं को बचाने नहीं आने वाले क्योंकि कायरों का कोई नहीं होता, इसलिये मुर्ख हिन्दुओं भावनाओं में मत बहो।
तुम्हारे पास आज अपने धर्म की रक्षा का समय है, जो कल नहीं होगा। फिर तुम्हारे हर बेटे का क़त्ल होगा और तुम्हारी हर बेटी का बलात्कार होगा और वो मंडी में बैठेगी। अबकी बार तुम्हें सर पकड़ कर रोने का भी समय नहीं मिलेगा। इसलिये सारे मुद्दे छोड़कर इस देश के नेताओं को "जनसंख्या नियंत्रण कानून" बनाने के लिये विवश कर दो और जब तक ये कानून नहीं बन जाता अपनी सारी ताकत बच्चे पैदा करने में लगा दो क्योंकि अगर एक भी तुम उन जिहादियों से कम हो गये तो तो तुम्हें तुम्हारे विनाश से कोई नहीं बचा सकेगा।
"निर्णय तुम्हारा है!"
हर हर महादेव
इस संसार का शाश्वत सत्य केवल "मृत्यु" ही है
आधी उर्दू आधा इस्लाम
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सफलता की नई शुरुवात आज ही करे
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कलाकार जामुन के कुछ अलग गुण
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अदभुत देवेन्द्र सिकरवार का लेख अदभुत! ***************************************** #मो_मन_गिरिधर_छवि_पे_अटक्यो भारत अपने अधोपतन के कालखंड स...
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