Sunday, September 2, 2018

मोहे गिरधर गोपाल : जन्माष्टमी विशेष

अदभुत देवेन्द्र सिकरवार का लेख अदभुत! ***************************************** #मो_मन_गिरिधर_छवि_पे_अटक्यो भारत अपने अधोपतन के कालखंड से गुजर रहा था। अकबर द्वारा मुगलिया सल्तनत के पाये भारत की जमीन में गाड़े जा चुके थे। दासता के साथ साथ हिंदुओं में मुस्लिम कुसंग से विलासिता व व्यभिचार भी पनप रहा था। इस विदेशी सत्ता का प्रतिरोध राजनैतिक रूप से मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश के नेतृत्व में और सांस्कृतिक रूप से रामानंद, वल्लभाचार्य, कबीर, रैदास,तुलसी, मीरा, सूर आदि द्वारा किया जा रहा था परंतु फिर भी दासता का भाव गहराता जा रहा था और साथ ही बढ़ता जा रहा था हिंदू जाति का चारित्रिक पतन जो मुगल सत्ता के हरेक शहरी केंद्र में तवायफों व वेश्याओं के कोठों की बढ़ती संख्या में स्पष्ट दिख रहा था और मुगलिया सत्ता के मुख्य केंद्र आगरा में तो यह चरम पर था। और उसी आगरा में एक शाम हर रोज की तरह तंग और बदनाम गलियों में शाम से ही 'रंगीन रातों ' का आगाज हो चुका था। कोठों से श्रृंगार रस की स्वर लहरियाँ उठ रहीं थीं । ऐसी ही गली से दैववश साधारण वस्त्रों में एक असाधारण पुरुष गुजर रहा था। साधारण नागरिकों के वस्त्रों में भी उसके चेहरे की आभा उसके तपस्वी व्यक्तित्व होने की घोषणा कर रही थी। वह कुछ गुनगुनाते हुये जा रहा था। "उफ ये आखिरी पंक्ति पूरी ही नहीं हो पा रही है इतने दिनों से" वह झुंझलाकर स्वगत बड़बड़ाया । और तभी रूप और संगीत के उस बाजार के एक कोठे से एक मधुर स्वर उठा। मधुर स्वरलहरियाँ उसके कानों में पड़ीं और वह उस आवाज को सुनकर जैसे चौंक उठा। लंबे लंबे डग भरते उसके पैर सहसा ठिठक गये । ऐसी अद्भुत आवाज ? रूप और वासना के इस बाजार में ?? उसके कदम स्वरों की दिशा में यंत्रचलित अवस्था में खिंचने लगे । स्वर जितने अधिक स्पष्ट होते गये वह उतना ही अपने भीतर डूबता चला गया। अंततः उसके पग उन स्वरों के उद्गमस्थल पर पहुँच कर रुक गए। एक गणिका का कोठा। और फिर उपस्थित हो गया एक अद्भुत दृश्य .. बदनाम कोठे के नीचे एक खड़ा एक पुरुष, कर्णगह्वरों से होकर आत्मा की गहराइयों तक उतरती स्वरलहरियों में डूबा, भाव विभोर और अर्धनिमीलित नेत्रों से अपने अश्रुओं को उस आवाज पर न्योछावर सा करता हुआ। गीत अंततः अवरोह की ओर आता हुआ पूर्ण हुआ और उसके साथ ही उस अद्भुत पुरुष की भावसमाधि भी टूट गयी। कुछ क्षणों तक वह सोच विचार करता खड़ा रहा और फिर कुछ निश्चय कर कोठे की सीढ़ियां चढ़ने लगा। कोठे के कारिंदों से व्यवहार के बाद कुछ क्षण उपरांत उसे गणिका के सम्मुख पहुंचा दिया गया। पुरुष ने गणिका पर दृष्टिपात किया। चंपक वर्ण, तीखी नासिका, उत्फुल्ल अधर, , क्षीण कटि और जगमगाते वस्त्राभूषणों में लिपटा संतुलित गदराया हुआ शरीर। गणिका का सौंदर्य उसके स्वरसंपदा के ही समान मनोहारी था परंतु सर्वाधिक विचित्र थी उसकी आंखें। बड़ी बड़ी आंखें जिनमें एक अबूझ गहराई थ जो उसके गणिका सुलभ चंचलता से मेल नहीं खातीं थीं। आगुंतक पुरुष भी गणिका के चेहरे पर अपलक कुछ ढूंढता, खोया सा स्तंभ के सहारे खड़ा रहा जबकि गणिका कनखियों से अपने संभावित नये ग्राहक को 'तौलती' हुई अपने प्रारम्भिक ग्राहकों को बीड़े देकर उन्हें विदा कर रही थी । जब अंतिम व्यक्ति भी चला गया तब वह आगुंतक पुरुष की ओर उन्मुख हुई और अपने पेशे के अनुरूप नजाकत भरी अदाओं के साथ आदाब पेश किया। "ये नाचीज आपकी क्या खिदमत कर सकती है हुजूर? " "तुम्हारा नाम क्या है?" बिना दृष्टि हटाये हुए पुरुष ने पूछा। "रामजनी बाई" "तुम्हारी आवाज की तरह तुम्हारा सौंदर्य भी अद्भुत है बाई।" गणिका इस तरह की प्रशंसा के लिये अभ्यस्त थी परंतु उसे अपलक देखे जा रहे इस अजीब पुरुष के इन स्वरों में एक अंतर वह स्पष्ट अनुभव कर रही थी। इस पुरुष की आंखों में अन्य पुरुषों के विपरीत कामुक चमक और स्वरों में कामलोलुपता युक्त दैन्यता का पूर्ण अभाव था। गणिका प्रभावित हो उठी। "शुक्रिया, आइये तशरीफ़ रखिये" उसने अपने ग्राहक को एक मसनद पर आमंत्रित किया। आगुंतक अपने स्थान पर अविचल रहे। " नहीं, मैं तो यहां नहीं बैठ सकूँगा पर क्या तुम मेरे साथ चलकर मेरे ठाकुर के लिए गा सकोगी?" आगुंतक ने गंभीर स्वर में पूछा । गणिका को बहुत ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि उस समय जमींदार या राजे रजवाड़ों के पास ऐसे कारिंदों की फौज हुआ करती थी, जो अपने मालिक के 'शौक की पूर्ति ' के लिये नित नयी वारांगनाओं को ढूंढते रहते थे और ये भी शायद ऐसा ही कोई कारिंदा होगा हालांकि आगुंतक की अतिगंभीर छवि और चेहरे का सात्विक तेज ऐसे किसी विचार का निषेध करते थे । "जैसा हुजूर चाहें। पर ये नाचीज हवेलियों पर मुजरा करने के लिये 100 अशर्फियाँ लेती है।" तिरछी कुटिल चितवन के साथ गणिका ने अपना शुल्क बताया। पुरुष शुल्क सुनकर भी अप्रभावित रहा और बिना कुछ कहे अपने अंगरखे को टटोला और अशर्फियों से भरी थैली गणिका की ओर उछाल दी । कुछ देर बाद मथुरा की ओर दो घोडागाड़ियाँ जा रहीं थीं । एक गाड़ी में तबलची , सारँगीवान और सितारवादक अपने साजों के साथ ठुंसे हुये थे और दूसरी गाड़ी में गणिका अपने उस असाधारण ग्राहक के साथ बैठी थी । "आपके ठाकुर का ठिकाना क्या है ?" वेश्या ने पूछा । "ब्रज" संक्षिप्त उत्तर आया । क्षणिक चुप्पी के बाद पुनः गणिका ने कटाक्षपूर्वक पूछा, "और आपका नाम?" "कृष्णदास" "आपके ठाकुर क्या सुनना पसंद करेंगे ?" "कुछ भी जो ह्रदय से गाया जाये", पुरुष रहस्यपूर्ण ढंग से मुस्कुराया। "फिर भी?", उलझी हुई गणिका ने पुनः आग्रह किया । "अच्छा ठीक है, तुम मेरे ठाकुर को यह सुनाना" उन्होंने अपने मधुर गंभीर स्वर में गुनगुनाना शुरू कर दिया। "अरे ये तो भजन है।" गणिका बोल उठी। "हाँ, तुम्हें इसे गाने में कठिनाई तो नहीं होगी?" स्वरों को रोककर वह फिर मुस्कुराया । भजन ब्रज भाषा में था और बहुत सुंदर था । "किसने लिखा है ?" "मैंने" उन्होंने जवाब दिया। "ओह तो ये कविवर इस भजन को मेरे माध्यम से अपने मालिक को सुनाकर उनकी कृपा प्राप्त करना चाहते हैं ।" गणिका ने सोचा । ब्रज क्षेत्र में अकबर की मनसबदारी प्रथा के कारण उस समय कुकुरमुत्तों की तरह नित नये 'राजा साहबों' का उदय हो रहा था जिनमें अधिकांशतः विलासी और कामुक चरित्र के थे और इसीलिये संपूर्ण ब्रज क्षेत्र में महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा जनसामान्य में बहाई भक्तिरस की धारा के साथ साथ समांतर रूप से जागीरदारों के विलास की धारा भी बह रही थी और संगीत दोनों समांतर धाराओं को जोड़ने वाली कड़ी था। उस युग में धनाढ्य वर्ग में यद्यपि फारसी-उर्दू का प्रचलन और शायरों की गजलों का प्रभुत्व था और गजलों की प्रतिष्ठा राजदरबारों और गणिकाओं के कोठों पर प्रसिद्धि पर निर्भर करती थी हालांकि सूरदास और तुलसीदास की रचनाएं अपवाद थीं जो जनमानस के होंठों व ह्रदय में बसी हुईं थीं और कई गणिकायें व्यक्तिगत सुख के लिये या कभी कभी अपने ग्राहकों की मांग पर भक्तिगीतों को भी गाती थीं। यह गणिका भी उसी गणिकावर्ग से थी। पुरुष पुनः अपना भजन गुनगुनाने लगा और गणिका तन्मयता से सुनकर शब्दों, ताल, राग, आरोह अवरोह आदि को स्मृतिबद्ध करती रही । अंततः 5 घंटे बाद लगभग अर्धरात्रि से कुछ पूर्व उन्होंने मथुरा में प्रवेश किया और कुछ पलों बाद पुरुष के निर्देशानुसार एक मंदिर के सामने गाड़ियां रोक दी गयीं। पुरुष नीचे उतरा और सभीको नीचे उतरने का निर्देश दिया। वह स्वयं मंदिर के सिंहद्वार की ओर बढ़ा और जेब से कुंजी निकालकर उसकी सहायता से कपाट खोल दिये । "अंदर आओ" उसने इशारा किया । "मंदिर में?" गणिका आश्चर्यचकित व संकुचित हो उठी । "अंदर आ जाओ, संकुचित होने की आवश्यकता नहीं है " पुरुष ने साधिकार आदेश दिया । उलझन में भरी गणिका और उसकी मंडली अंदर आ गयी। "मैं चादरें और मसनद बिछवाता हूँ, तुम अपने साज जमा लो" "यहां? यह एक मंदिर है । लोग क्या कहेंगे हुजूर ??" गणिका अब भयग्रस्त हो उठी । "कोई कुछ नहीं कह सकेगा। मेरे ठाकुर ने मुझे सारे अधिकार दे रखे हैं।" उन्होंने सबको आश्वस्त करते हुए कहा । "सच बताइये आप कौन हैं?" "इस मन्दिर का मुख्य प्रबंधनकर्ता और मुख्याधिकारी कृष्णदास" उन्होंने उत्तर दिया । गणिका आश्वस्त तो हुई परंतु उसकी उलझन मिटी नहीं। कैसा है ये व्यक्ति जो इस पवित्र स्थान का प्रयोग अपनी महत्वाकांक्षा पूरी करनी के लिए कर रहा है और कैसा है इनका 'ठाकुर' जो इस पवित्र स्थान में मुजरा सुनने का आकांक्षी है? इसी उधेड़बुन में डूबी वह अपना श्रंगार व्यवस्थित करने एक ओर चली गयी जबकि कृष्णदास व साजिंदे दीपों को प्रज्ज्वलित कर बिछावन बिछाने लगे। अंततः साजिंदों ने अपने साज जमा लिये और गणिका भी अपने पूर्ण श्रंगार और मोहक रूप में प्रस्तुत थी। "आपके ठाकुर नहीं पधारे अभी तक?" उसने अपनी मोहक मुस्कुराहट के साथ पूछा । "वे तो यहीं हैं " "कहाँ?" इस प्रश्न के उत्तर में कृष्णदास उठे, गर्भगृह की ओर बढ़े और पट खोल दिये। वहां कान्हाजी अपने पूर्णश्रृंगार में विराजमान थे । "यही हैं मेरे ठाकुर" हतप्रभ स्त्री की निगाहें कृष्ण के श्रीविग्रह से टकराईं। वह चित्रवत जड़ हो गई, कृष्ण छवि में खो गई, बिक गई। जन्म जन्मांतरों के पुण्य प्रकट हो उठे। समय उन पलों में जैसे ठहर गया । "गाओ देवी, कान्हा तुम्हें सुनने का इंतजार कर रहे हैं " कृष्णदास की गंभीर वाणी गूंजी । गणिका के लिये जैसे समस्त संसार अदृश्य हो गया और वह बावली हो उठी। उसकी आँखों में में केवल कृष्ण की छवि थी और कर्ण गह्वरों में सिर्फ एक ध्वनि .. "कान्हा तुम्हें सुनने का इंतजार कर रहे हैं " उसकी आंखें भर आईं और आत्मा की गहराइयों से मधुर तान फूट निकली। साजिंदों ने स्वर छेड़ दिये। कृष्णदास के सिखाये भजन के स्वर गूंज उठे। "मो मन गिरिधर छबि पै अटक्यो।" स्त्री उन शब्दों में जैसेबडूब गई। वह बार बार उन्हीं पंक्तियों को दुहरा रही थी। "मो मन गिरिधर छबि पै अटक्यो।" संगीत की ध्वनि, भावविभोर स्वर .. लोगों की निद्रा टूट गयी और वे आश्चर्यचकित मंदिर में आने लगे। दृश्य अवांक्षित परन्तु अपूर्व था। जनवृन्द का सात्विक रोष गणिका के भावसमुद्र में उतराते शब्दों के साथ बह गया। गणिका ने भजन की अगली पंक्तियाँ उठाईं। "ललित त्रिभंग चाल पै चलि कै" "ललित त्रिभंग चाल पै चलि कै चिबुक चारु गडि ठठक्यो" मो मन गिरिधर छबि पै अटक्यो। मो मन गिरिधर छबि पै अटक्यो।। समस्त जन उन क्षणों में, उन भावभरे शब्दों में जैसे कृष्ण का साक्षात दर्शन कर रहे थे। गणिका आगे बढ़ी-- "सजल स्याम घन बरन लीन ह्वै, "सजल स्याम घन बरन लीन ह्वै फिर चित अनत न भटक्यो।" लोगों की आंसुओं की धारायें बह उठी। समस्त जनवृन्द गा उठा, एक बार, दो बार, बार बार ... "....फिर चित अनत न भटक्यो .... ..….फिर चित अनत न भटक्यो... .....फिर चित अनत न भटक्यो गणिका अपने ही भावसंसार में थी। भावों की चरमावस्था में उसकी आंखें कृष्ण की आंखों से जा मिलीं। गणिका ने और गाना चाहा पर उसके होंठ कुछ थरथराकर शांत हो गये और आंखें कृष्ण की आंखों में अटक गयीं। कृष्ण की आंखों में उसे आमंत्रण दिखाई दे रहा था, उसकी आत्मा विकल हो उठी और अपने स्थान पर बैठे ही बैठे उसने अपनी भुजा कातर मुद्रा में कृष्ण की ओर फैला दी। उसने कान्हाजी के चेहरे पर मुस्कुराहट देखी और वह पूर्ण हो उठी। डबडबाई आंखों से अंततः अश्रुओं की दो धाराएं बह निकलीं और अगले ही क्षण वह भूमि पर निश्चेष्ट होकर गिर गई । भीड़ शांत स्तब्ध हो गई । इस गहन स्तब्धता को कृष्णदास की पगध्वनि ने भंग किया। उन्होंने रामजनी की निश्चल देह को भुजाओं में उठाया और कान्हा के श्रीविग्रह की ओर बढ़ चले । मृत देह कृष्ण चरणों में अर्पित हुई । जीवनपुष्प कृष्णार्पित हुआ । जीवन, निर्माल्य बनकर कृतार्थ हुआ । .....और डबडबाई आंखों से कृष्णदास ने अपने अधूरे भजन की पंक्तियाँ पूर्ण कीं -- '#कृष्णदास_किए_प्रान_निछावर, #यह_तन_जग_सिर_पटक्यो।।

जन्म अष्टमी विशेष

भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की मध्यरात्रि को रोहिणी नक्षत्र व अष्टमी तिथि के संयोग से जयन्ती नामक सर्वाधिक शुभ योग में लगभग 3112 ई०पू० हुआ माना जाता है। संदर्भित मूल ग्रन्थों में वर्णित नक्षत्रों की गणना के आधार पर भगवान श्रीराम का अवतरण इनसे लगभग 2002 वर्ष पूर्व यानी 5114 ई०पू० हुआ माना जाता है। यह मानते हैं कि श्रीराम की 51वीं पीढ़ी के शल्य ने महाभारत के युद्ध में कौरवों की तरफ़ से हिस्सा लिया था..जबकि ख़ुद श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी ने अपनों के ही इस युद्ध में हिस्सा लेने से साफ़ इनकार कर दिया था..!! मानते हैं कि वसुदेव जी व देवकी माता के पुत्र वासुदेव श्रीकृष्ण को जन्म के समय ही उनके मामा कंस की वज़ह से नन्दगाँव के सरपँच नन्दगोप जी व यशोदा माता के पास पहुँचा दिया गया, जिन्होंने श्रीकृष्ण उर्फ़ गोपाल जी का पालन-पोषण किया..!! हमें श्रीकृष्ण के बाल्यकाल में उनकी (बाँके बिहारी जी) लीलाओं की खूब चर्चा सुनने को मिलती है। श्रीकृष्ण से उम्र में लगभग 5-6 वर्ष बड़ी राधा जी के बारे में हम सबने सुना है, पर आश्चर्यजनक रूप से राधा जी की चर्चा न हम महाभारत में सुनते हैं, न भागवत पुराण में..!! महाभारत में बस एक बार जिन राधा जी का जिक्र होता है, वह अँगराज कर्ण की पालक माता थीं। दरअसल राधा जी की चर्चा काफ़ी बाद के ग्रन्थों पद्मपुराण व ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलती है, जिनके आधार पर मध्यकाल या भक्तिकाल के संतों यथा निम्बार्क देव, चैतन्य प्रभु, वल्लभ देव इत्यादि ने श्रीराधा-कृष्ण के युग्म रूप का भरपूर महिमामंडन किया। इन भक्तिकाल के संतों ने राधा जी व कृष्ण जी के आध्यात्मिक प्रेम का तो वर्णन भक्ति संगीत के माध्यम से किया, पर श्रीकृष्ण के योद्धा रूप को भूल गए..!! माना जाता है कि श्रीकृष्ण अन्तिम बार जब राधा जी से मिले, तो श्रीकृष्ण की उम्र महज़ 11 वर्ष थी। उसके बाद श्रीकृष्ण यानी बाँके बिहारी जी की बाल-लीला समाप्त हुई व जिस उद्देश्य से उनका अवतरण द्वापर में हुआ था, वह उसकी पावन प्राप्ति में लग गए..!! ऐसा मानते हैं कि राधा जी की शादी कंस की सेना में कार्यरत रायण से हुई थी। ब्रह्मवैवर्त पुराण की जानकारी भी थोड़ी उलझन भरी है। ऐसा प्रतीत होता है कि बाद में क्षेपक जोड़, उसे और उलझा दिया गया। यह भी मानते हैं कि राधा जी ख़ुद ही श्रीकृष्ण का दूसरा रूप (श्रीलक्ष्मी) थीं। भले ही राधा जी के पिता वृषभानु जी (गोप या वैश्य) थे तथा माता कीर्ति जी थी वैसे, परन्तु उन्हें ईश्वर का अंश होने के नाते 'अयोनिजा' ही माना जाता है यानी जो किसी गर्भ से नहीं, वरन साक्षात अवतरित हुई थीं..!! इनसे सम्बन्धित भी एक कथा है, जिसकी चर्चा फिर कभी.. आधुनिक काल में सनातन के दुष्ट विरोधियों ने जानबूझकर श्रीकृष्ण की छवि को ख़राब करने के लिए ज़बरन उनके व राधा जी के बाल्यकाल के आध्यात्मिक प्रेम को उनके चरित्रहनन के लिए इस्तेमाल किया। इसी प्रकार जिस नरकासुर को मार कर श्रीकृष्ण ने लगभग 16000 कन्यायों को उससे छुड़वाया, उनसे भी उनका नाम गलत तरीक़े से जोड़ कर मज़ाक उड़ाने की कोशिश की जाती है। मध्यकाल में जब भारतभूमि लगातार आक्रान्ताओं व आंतरिक राजनीतिक-सामरिक उछलकूद से त्रस्त थी, तब श्रीकृष्ण की दार्शनिक, स्थिरप्रज्ञ, दूरद्रष्टा व योद्धा छवि को निखारने की बजाए..क्योंकर उनके बाल्यकालीन प्रेमी छवि को उभारा गया, यह वाकई सोचने को बाध्य करता है..!!!!! जहाँ सुदर्शन चक्र की जरूरत थी, वहाँ बाँसुरी बजाया जाने लगा..जबकि वक्त की माँग मध्यकाल में कुछ और थी। जब वीर रस की जरूरत थी, तो वहाँ शृंगार (श्रृंगार) रस पर बल दिया गया..!! ख़ैर..महाभारत के जितने भी प्रमुख पात्र हैं, यहाँ तक कि ख़ुद दुर्योधन भी..श्रीकृष्ण के महान चरित्र की प्रशंसा करते हैं। यहाँ तक कि उनसे चिढ़ा हुआ शिशुपाल भी उनके चरित्र पर कदापि उँगली नहीं उठाता.. श्रीकृष्ण की पटरानी विदर्भ के राजा रुक्मी की बहन रुक्मिणी थीं। जबकि श्रीकृष्ण के पितामह शूरसेन जी (वसुदेव जी के पिता) थे तथा बड़े भाई हलधर बलराम जी व बहन सुभद्रा जी थीं। उनके चचेरे भाइयों के नाम उद्धव व अंगिरस थे। श्रीकृष्ण जी की आयु लगभग 119 वर्ष आँकी गयी है.. यह विविध नामों से जाने गए..जैसे राजस्थान में श्रीनाथ जी या ठाकुर जी, महाराष्ट्र में विट्ठल जी, ओडिशा में जगन्नाथ जी, बंगाल में गोपाल जी, गुजरात में द्वारकाधीश, दक्षिण भारत में वेंकटेश जी या गोविन्दा जी, उत्तर भारत, पूर्वोत्तर भारत व नेपाल में श्रीकृष्ण जी आदि..!! भगवान श्रीकृष्ण के धनुष का नाम 'सारँग', शँख का नाम 'पाञ्चजन्य' व भगवान परशुराम जी द्वारा दिये गए चक्र का नाम 'सुदर्शन' था..!! और हाँ, श्रीराम हों या श्रीकृष्ण या फिर परशुराम जी, ये सारे लोग सनातन परम्परा के अंतर्गत ईश्वर के अवतार माने जाते हैं, न कि ईश्वर के धरती पर भेजे गए कोई दूत..इस बारीक अंतर को ध्यान में रखियेगा..!! साथ ही ईश्वर के अवतार को किसी भी जाति विशेष से जोड़कर अपनी क्षुद्रबुद्धि का परिचय कदापि न देंगे..ऐसा करके आप सनातन परम्परा का तो अपमान करते ही हैं, ख़ुद उन परमपिता परमेश्वर का भी अपमान करते हैं। याद रखें, वर्ण व्यवस्था कर्म-आधारित थी, न कि जन्म-आधारित..!! सुदर्शन चक्रधारी भगवान श्रीकृष्ण की जय हो..🙏

Saturday, August 25, 2018

रक्षाबंधन विशेष : बहन से वादा

सुबह बहन जल्दी उठती है और घर के सारे कामों को खत्म कर अपने भैया को जगाती है बहन - भैया उठो ना,जल्दी से उठो ना, आज आज रक्षाबन्धन है । आप जल्दी से तैयार हो जाओ, मै सबसे पहले आपको राखी बांधुगी । भाई - ठीक है । भाई तैयार हो जाता है और बहन पूजा की थाली, मिठाई और राखी लेकर आती है बहन - भैया अपना दाहिना हाथ आगे बढाओ । भाई अपना हाथ आगे करके राखी बंधवा लेता है और जेब से निकालकर उसको एक खूबसूरत घड़ी देता है । ( जो उसने बहन के लिए एक दिन पहले ही खरीदी थी ) लेकिन बहन मना कर देती है फिर भाई अपने पर्स से कुछ पैसे निकाल कर देता है लेकिन बहन फिर वापस कर देती है तब भाई पुछता है कि बताओ तुम्हे क्या चाहिए ? बहन - जो मागुंगी वो दोगे ? भाई - हां दुंगा । बहन - पहले मुझसे वादा करो ? भाई - हां मैं पक्का वादा करता हूँ कि जो तू मांगेंगी वो मैं दुंगा । अब बोल तुझे क्या चाहिए ? बहन - भैया आज रक्षाबन्धन के दिन आप मुझसे ये वादा करो कि आप आज से मां की बहन की गालियां नहीं दोगे । इतना कहकर उसकी आंखों में आसूं आ जाते हैं । (बहन रोते हुए ) भैया हम लोगों ने आप लोगों का क्या बिगाड़ रखा है जो हमेशा मां की बहन की गालियां देते हो हमें सरेआम बदनाम करते हो । बोलो भैया बोलो भाई - ( सिर नीचे किये हुए चुप है) बहन - आज रक्षाबंधन पर आप मुझसे वादा करते हो कि नहीं ? भाई - ( आत्मग्लानि से रोते हुए ) हां बहन मैं आज तुमसे ये वादा करता हूं कि मैं जीवन में कभी मां की बहन की गाली नहीं दुंगा और ना ही किसी को देने दुंगा । फिर अपने आप को सम्हाल कर बहन को भी चुप कराता है । और कहता है कि...... मिठाई देखकर मुंह में पानी आ रहा है चल अब जल्दी से मिठाई खिला बहन थोड़ा हंसने लगती है उसकी आंखों में अभी भी आंसू थे लेकिन ये आंसू खुशी के थे, भाई पर आत्मविश्वास के थे ।

Thursday, August 23, 2018

काठगोदाम नाम क्यो

"काठगोदाम" _________________________________________________________________ यह काठगोदाम का रेलवे स्टेशन है। किंतु मैं तो कभी काठगोदाम गया नहीं। जैसे कि मैं कभी लैंसडोन ही कहां गया। किंतु लैंसडोन को जैसे सोचता रहता हूं, उसके कठगुलाबों को मन में संजोये रहता हूं, वैसे ही काठगोदाम को भी सोचता रहा हूं। इसलिए सोच के अहाते में काठगोदाम की एक जगह बन गई है। कुमाऊं के कोनों-अंतरों तक इसके बाद सड़क जाती है। रेल लाइन काठगोदाम आकर चुक जाती है। वो रेल, जो सन् 1884 में सबसे पहले यहां पहुँची थी, कूक का कहरवा गाते! धूप से भरा यह दृश्य! पहाड़ों की कोमल पीली धूप। जिसे श्रीनरेश मेहता "पीताम्बरा" कहते, आकाश में देववस्त्रों सी अकलंक बताते। और फिर "धूप-कृष्णा" कहकर एक वरेण्य संज्ञा से अभिहित कर देते। इसका नाम भले "काठगोदाम" हो, मैं तो इसे "धूप-शहर" कहकर ही बुलाऊंगा। धरा पर धूप का धाम! किंतु यह धूप-शहर तो है नहीं, काठगोदाम है, इसलिए फ़िलवक़्त तो यही पूछा जाए कि यह काठगोदाम ही क्यों है। काठ का गोदाम यानी "टिम्बर डिपो"। यहां पर सच में ही बड़ा-सा टिम्बर डिपो एक ज़माने में हुआ करता था। टिम्बर किंग ऑफ़ इंडिया कहलाने वाले दान सिंह के चौहान पट्‌टे में पड़ने वाला इलाक़ा। फ़िरंगियों के दफ़्तरों में आज भी इसका नाम "चौहान पट्‌टा" ही मिलता है, किंतु वक़्त के साथ यह काठगोदाम हो गया, जो निहायत ही ख़ूबसूरत नाम है। यों तो पहाड़ों के समस्त इलाक़े ही काठगोदाम हैं, किंतु वृक्षों के जीवित काष्ठ वाले। टिम्बर डिपो वाला जो काठगोदाम होता है, वहाँ वृक्षों के शव होते हैं, जिन्हें क़तार में उसी तरह सजाया जाता है, जैसे मनुष्यों के शव हस्पतालों के अहातों में क़तार से सजाए जाते हैं। काफ़्का होता तो काठ के वैसे ही किसी गोदाम को देखकर कहता- "पेड़ के इन लट्ठों को एक-एक कर लुढ़का दूं तो?" फिर आगे कहता- "जो दरख़्त धरती में जड़ें जमाए मालूम होते हैं, कहीं वह भी वहम तो नहीं? एक धक्के से कहीं वे भी तो लुढ़कने नहीं लगेंगे?" लेकिन मुझे यह नाम रुच गया है- "काठगोदाम"। कवि अज्ञेय ने कहा था- "ताज़ा चिरी लकड़ी की गंध जिसमें हो, वैसी भाषा मुझको चाहिए।" वैसी भाषा का तो मालूम नहीं, किंतु इस शब्द से मुझे वैसी ही गंध आती है- "काठगोदाम"। काठ की गंध से भरी नामसंज्ञा। इधर के शहरों-क़स्बों के नाम ऐसे ही हैं। किसी के नाम में ताल जुड़ा है- नैनीताल, भीमताल, नौकुछियाताल। किसी के नाम में खेत जुड़ा है- रानीखेत। किसी के नाम में डेरा जुड़ा है- देहरादून। किसी के नाम में वन जुड़ा है- हल्द्वानी। हल्द्वानी यानी हल्दू का वन! इधर लालकुंआ-हल्द्वानी मार्ग पर हल्दू का एक बड़ा-सा दरख़्त हुआ करता था, जिसके नाम पर ही उस इलाक़े को मोटाहल्दू कहा जाने लगा था। रामपुर-काठगोदाम सड़क के काम में जब उसे काट दिया गया तो वहां के लोगों को लगा, जैसे उनके परिवार के किसी सदस्य की हत्या कर दी गई हो। तब धूप के उस देश में शोक का अंधेरा व्याप गया! मैंने हल्दू का पेड़ कभी देखा नहीं है, केवल हल्द्वानी का नाम सुना है। मैंने काठगोदाम भी देखा नहीं है, केवल काठ की गंध का अनुभव किया है। मैंने पहाड़ की धूप तक नहीं देखी! लेकिन जितने लोग पहाड़ों से लौटकर पठारों पर आए, उनमें से किसी ने भी किसी पहाड़ी क़स्बे को कभी "धूप-शहर" कहकर नहीं पुकारा। मैंने पुकारा! जब तक लैंसडोन, नैनीताल और हल्द्वानी में यों ही नहीं चला जाता, जैसे बारिश होती है, जैसे रात घिरती है, तब तक मैं संतोष की इस कनी को ही अपने कमीज़ की जेब में सम्हाले रक्खूंगा कि धूप से धुले काठगोदाम टेसन को निमिष भर निहारा! सुशोभित की कलम से

Wednesday, August 22, 2018

अटल मोदी व महाभारत

महाभारत काल के दौरान आप देखिए कि कौरवों को सिर्फ युधिष्टिर सबसे अच्छे लगते थे...! जानते हैं क्यों...??? क्योंकि वो धर्मराज थे, हर कार्य को धर्म की कसौटी से ही देखा करते थे, सीधे थे, सरल थे, और कई बार धर्म का हवाला देकर और धार्मिक मान्यताओं के कारण अन्य पांडवों पर दबाव डालने में भी सफल रहते थे...! कई ऐसे मौके और उदाहरण है, चाहे वनवास के लिए तैयार हो जाना हो, चाहे अज्ञातवास जैसी कठिन शर्त को सहर्ष तैयार हो जाना हो, चाहे पूरे राज्य को छोड़ 5 गांव मांगने का प्रस्ताव हो, चाहे द्रौपदी को जुए में दांव लगाने को तैयार हो जाना हो........युधिष्टिर हमेशा ही सर्व सुलभ होते थे, और अन्य पांडवों की अपेक्षा उन्हें मनाना आसान हुआ करता था, और धर्म के नाम पे तो उन्हें बड़ी आसानी से मिलाया जा सकता था...! अब आइये ये जानते हैं कि कौन से पांडव से कौरव या दुर्योधन सबसे ज्यादा चिढ़ते थे...??? तो इसका उत्तर है अर्जुन और भीम...! भीम से तो दुर्योधन का पुराना वैमनस्य था ही, दोनों ही गदा धारी थे और लगभग समान बलशाली भी थे, भीम थोड़े से आक्रामक भी थे, युधिष्टिर के लिहाज की वजह से वो मन मसोस कर रह जाते थे, अन्यथा तो वो अकेले ही सभी कौरवों को मारने में समर्थ थे.....और महाभारत के रण में ये काम उन्होंने किया भी था...! अर्जुन हमेशा से ही कौरवों की आंखों में इसलिए खटकते रहे थे, क्योंकि वो गुरु द्रोणाचार्य के प्रिय भी थे और उन जैसा धनुर्धारी कोई था ही नही.........ऊपर से अर्जुन का सबसे बड़ा शत्रु कर्ण था, जो दुर्योधन का सबसे बड़ा मित्र था, लेकिन अर्जुन भी धर्मराज युधिष्टिर द्वारा बनाई गई मर्यादाओं में बंधे थे...! लेकिन फर्क तब पड़ा जब पांडवों को श्रीकृष्ण का साथ मिला, कृष्ण ने ही अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया, धर्म और अधर्म का फर्क समझाया, उन्होंने ही ये समझाया कि धर्म की विजय के लिए जो तरीका अपनाना पड़े, अपनाना चाहिए...! इसी वजह से अर्जुन को कई विजय प्राप्त हुई, इसी वजह से अर्जुन भीष्म पितामह पर विजय प्राप्त कर पाए, फिर जयद्रथ का संहार हो, या कर्ण का वध हो, ये सब कुछ तभी संभव था जबतक श्री कृष्ण अपनी लीला ना दिखाते और अर्जुन को धर्म-अधर्म के मायाजाल से ना निकालते...! कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि कौरव युधिष्ठिर को इसलिए मानते थे, क्योंकि वो एक आसान से शिकार थे उनके लिए, उन्हें मनाना आसान था........वहीं ये लोग अर्जुन और भीम से इसलिए चिढ़ा करते थे, क्योंकि ये उन्ही के तौर तरीकों को इस्तेमाल करने में विश्वास किया करते थे...! धर्म से धर्म और अधर्म से अधर्म को काटने की कला इन दोनों में ही थी, जिसमे श्री कृष्ण का भी योगदान था...! अब जैसा कि आप लोगों ने भी देखा होगा कि जब से अटल जी देहावसान हुआ है तभी से अलग अलग चैनलो पर बहस, सोशल मीडिया पर अनगिनत पोस्ट, नाना प्रकार के तर्क कुतर्क किये जा रहे हैं...! यदि विरोधियों के इन सब प्रपंच का सारांश निकालें तो यह बात निकलती है कि वाजपेयी जी एक अजातशत्रु थे...! सभी पक्ष और विपक्ष के लोग उनका सम्मान करते थे...! वे एक सर्वमान्य नेता थे जो सेक्युलर और लिबरल ढांचे में फिट होते थे...! और इन्ही बातों के सहारे मोदीजी की सरकार और उनके अन्य नेताओं पर टीका टिप्पणी भी की गयी...! सब मिलाकर कोई कोर कसर और मौका नही छोड़ा गया मोदीजी और उनकी सरकार को नीचा दिखाने का, जबकि चाहे मोदी जी हों, चाहे शाह हों, आडवाणी जी हों, राजनाथ सिंह जी हों या स्वयं वाजपेयी जी हों......इन सभी की विचारधारा एक ही रही है, हां समय और काल का फर्क इनके कार्यो पर जरूर दिख जाता है......और ये ठीक ही है...! लेकिन इनकी चिढ़ का कारण क्या है मेरे समझ मे यही नहीं आ रहा है......वाजपेयी जी कर्म योगी थे, लेकिन वो राजनीत को एक धर्म मान कर चलते थे, इसमे उनकी कोई गलती नही थी, वो शायद गलत विपक्ष के बीच मे अवतरित हुए थे, उनके हर धर्म का जवाब विपक्ष ने अधर्म से दिया था...! जोड़ तोड़ की सरकार को चिमटे तक से ना छूने वाले वाजपेयी जी को सत्ता का लालची बता कर, सारे अनैतिक रास्ते अपना कर कभी 13 दिन में कभी 13 महीने में, एक एक वोट से सरकार गिरा भारत को अनिश्चितता के दौर में धकेलने का दुष्कर्म इस अनैतिक विपक्ष ने ही किया था...! सब कुछ सही हो कर भी, जनमत संदेश पा कर भी सत्ता से अपदस्थ किये जाने के बाद के वाजपेयी जी के बयानों को सुनिए.....उन्हें सत्ता का लालच तो नही था, लेकिन इस राजनीति द्युत के खेल में उन्हें हर बार विपक्ष के शकुनि छलते थे, और वे कातर दृष्टि से देखने के अलावा कुछ नही कर पाते थे...! संसद में मजाक उड़ाया जाता था, कहा जाता था कि ये तो गायों के तबेले की पार्टी है........इन्हें जानता ही कौन है......हरियाणा से ऊपर और गुजरात से नीचे इन्हें पहचानता ही कौन है...? 2004 में हार के जो कारण रहे हो, लेकिन उससे आज की राजनीति के धर्मराज को ऐसा झटका लगा था कि कुछ सालों में वे सार्वजनिक जीवन से सन्यास ही ले बैठे, बोलना तक बिसार दिया...! लेकिन ये विपक्षी शायद ये भूल गए थे कि कहीं भीम और अर्जुन तो पल रहे थे, बड़े हो रहे थे...! 10 साल के शासन के पश्चात 2014 में बाजी फिर से पलटती है, एक ऐसा नेता चुन कर आता है जिसे पिछले 12 सालो से हर दिन हर क्षण एक नई कसौटी पे परखा गया हो। जिसे जहां मौका लगा हो विपक्ष ने बेइज्जत करने का कोई मौका ना छोड़ा हो...! और पहले ही दिन से विपक्षी खेमे में कोलाहल मच जाता है, उस इंसान से इतना डर कि हर दूसरे दिन कोई नया शिगूफा पैदा किया जाता है, ताकि उसकी बढ़ती मान्यता को कम किया जा सके...! अरे ये तो चाय बेचने वाला है, अरे इसको गुजरात से बाहर जानता ही कौन है, अरे ये तो नीच है, मौत का सौदागर है, हिटलर है, फ़ासिस्ट है और ना जाने क्या क्या...! लेकिन वो बदले में क्या करता है.........वो आपकी ही तरकीबो को इस्तेमाल करता है......वो भी साम दाम दण्ड भेद सब कुछ इस्तेमाल करता है और एक के बाद एक राज्यो से आपके नामो निशान हटाता जाता है.......आपको समझ ही नही आ रहा कि हो क्या रहा है...??? आप चिल्ला रहे हैं, चीख रहे है, तड़प रहे हैं, तिलमिला रहे है.......आप चाह रहे हैं कि कैसे इसका चक्रव्यूह तोड़ें......कैसे इससे बचें......कैसे अपने बचे हुए आधार को बचाए रखें...??? जब आपको मौके नही मिलते तो आप बनाने लगते हैं...........असहिंष्णुता का स्वांग रचते हैं.......फिर दलित हिंसा पर छाती पीटते हैं.....कभी अल्पसंख्यकों की याद आती है......कभी सेना की आड़ लेते हैं.........कभी व्यापारियों को चारा बनाते हैं, लेकिन कुछ नही होता...! फिर आपको ये राजनीति बुरी लगने लगती है.......आपको वाजपेयी जी अच्छे लगने लगते हैं.....क्योंकि वे सौम्य थे.....सरल थे.....ईमानदार थे......आसानी से विश्वास कर लेते थे......आसानी से आपके चंगुल में फंस जाते थे...! लेकिन ये नया योद्धा तो आपको आपकी ही भाषा मे जवाब देने में पारंगत है.....तो वो भला क्यों अच्छा लगेगा...! खैर.....छोड़िये ये तो आदत है आपकी.......पहले मुखर्जी बुरे लगे, उन्हें गिरफ्तार किया और मरवा दिया, फिर आपको वाजपेयी और आडवाणी बुरे लगे.....धीरे धीरे वाजपेयी आपको अच्छे लगने लगे क्योंकि कोसने के लिए आडवाणी थे.....बाकि आपका व्यवहार दोनों के ही किये समान था.....आज मोदी हैं तो आपको वाजपेयी-आडवाणी की विरासत पे प्यार आता है...! ये सब को मालूम है कि आज नहीं तो कल आपको मोदी भी भगवान सरीखे लगने लगेंगे जब वो अपनी राजनीतिक विरासत को अपने उत्तराधिकारी के कांधो पे रखेंगे......क्योंकि वो योद्धा तो आपको सांस भी नही लेने देगा......... क्या करें आप ही से तो सीखे हैं ये राजनीति के दांव पेंच......अब तो अमल में लाने शुरू किए है......आगे आगे देखिए होता है क्या...?

Sunday, August 19, 2018

कैसे मनाए रक्षाबंधन का पर्व

रक्षा बंधन के पर्व की वैदिक विधि -वैदिक रक्षा सूत्र बनाने की विधि : इसके लिए ५ वस्तुओं की आवश्यकता होती है - (१) दूर्वा (घास) (२) अक्षत (चावल) (३) केसर (४) चन्दन (५) सरसों के दाने । इन ५ वस्तुओं को रेशम के कपड़े में लेकर उसे बांध दें या सिलाई कर दें, फिर उसे कलावा में पिरो दें, इस प्रकार वैदिक राखी तैयार हो जाएगी । इन पांच वस्तुओं का महत्त्व - (१) दूर्वा - जिस प्रकार दूर्वा का एक अंकुर बो देने पर तेज़ी से फैलता है और हज़ारों की संख्या में उग जाता है, उसी प्रकार मेरे भाई का वंश और उसमे सदगुणों का विकास तेज़ी से हो । सदाचार, मन की पवित्रता तीव्रता से बदता जाए । दूर्वा गणेश जी को प्रिय है अर्थात हम जिसे राखी बाँध रहे हैं, उनके जीवन में विघ्नों का नाश हो जाए । (२) अक्षत - हमारी गुरुदेव के प्रति श्रद्धा कभी क्षत-विक्षत ना हो सदा अक्षत रहे । (३) केसर - केसर की प्रकृति तेज़ होती है अर्थात हम जिसे राखी बाँध रहे हैं, वह तेजस्वी हो । उनके जीवन में आध्यात्मिकता का तेज, भक्ति का तेज कभी कम ना हो । (४) चन्दन - चन्दन की प्रकृति तेज होती है और यह सुगंध देता है । उसी प्रकार उनके जीवन में शीतलता बनी रहे, कभी मानसिक तनाव ना हो । साथ ही उनके जीवन में परोपकार, सदाचार और संयम की सुगंध फैलती रहे । (५) सरसों के दाने - सरसों की प्रकृति तीक्ष्ण होती है अर्थात इससे यह संकेत मिलता है कि समाज के दुर्गुणों को, कंटकों को समाप्त करने में हम तीक्ष्ण बनें । इस प्रकार इन पांच वस्तुओं से बनी हुई एक राखी को सर्वप्रथम भगवान -चित्र पर अर्पित करें । फिर बहनें अपने भाई को, माता अपने बच्चों को, दादी अपने पोते को शुभ संकल्प करके बांधे । इस प्रकार इन पांच वस्तुओं से बनी हुई वैदिक राखी को शास्त्रोक्त नियमानुसार बांधते हैं हम पुत्र-पौत्र एवं बंधुजनों सहित वर्ष भर सूखी रहते हैं । राखी बाँधते समय बहन यह मंत्र बोले – येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल: | तेन त्वां अभिबन्धामि रक्षे मा चल मा चल || शिष्य गुरु को रक्षासूत्र बाँधते समय – ‘अभिबन्धामि ‘ के स्थान पर ‘रक्षबन्धामि’ कहे | और चाकलेट ना खिलाकर भारतीय मिठाई या गुड से मुहं मीठा कराएँ। अपना देश अपनी सभ्यता अपनी संस्कृति अपनी भाषा अपना गौरव वन्दे मातरम्

Saturday, August 18, 2018

महाभारत में भोजन प्रबंधन : श्रीकृष्ण

महाभारत को हम सही मायने में विश्व का प्रथम विश्वयुद्ध कह सकते हैं क्यूंकि शायद ही कोई ऐसा राज्य था जिसने इस युद्ध में भाग नहीं लिया।
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आर्यावर्त के समस्त राजा या तो कौरव अथवा पांडव के पक्ष में खड़े दिख रहे थे। बलराम और रुक्मी ये दो ही व्यक्ति ऐसे थे जिन्होंने इस युद्ध में भाग नहीं लिया।
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कम से कम हम सभी तो यही जानते हैं। किन्तु एक और राज्य ऐसा था जो युद्ध क्षेत्र में होते हुए भी युद्ध से विरत था। वो था दक्षिण के "उडुपी" का राज्य।
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जब उडुपी के राजा अपनी सेना सहित कुरुक्षेत्र पहुँचे तो कौरव और पांडव दोनों उन्हें अपनी ओर मिलाने का प्रयत्न करने लगे।
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उडुपी के राजा अत्यंत दूरदर्शी थे। उन्होंने कृष्ण से पूछा - "हे माधव ! दोनों ओर से जिसे भी देखो युद्ध के लिए लालायित दिखता है किन्तु क्या किसी ने सोचा है कि दोनों ओर से उपस्थित इतनी विशाल सेना के भोजन का प्रबंध कैसे होगा ?
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इस पर कृष्ण ने कहा - महाराज ! आपने बिलकुल उचित सोचा है। आपके इस बात को छेड़ने पर मुझे प्रतीत होता है कि आपके पास इसकी कोई योजना है। अगर ऐसा है तो कृपया बताएं।
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इसपर उडुपी नरेश ने कहा - "हे वासुदेव ! ये सत्य है। भाइयों के बीच हो रहे इस युद्ध को मैं उचित नहीं मानता इसी कारण इस युद्ध में भाग लेने की इच्छा मुझे नहीं है।
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किन्तु ये युद्ध अब टाला नहीं जा सकता इसी कारण मेरी ये इच्छा है कि मैं अपनी पूरी सेना के साथ यहाँ उपस्थित समस्त सेना के भोजन का प्रबंध करूँ।
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इस पर कृष्ण ने हर्षित होते हुए कहा - "महाराज ! आपका विचार अति उत्तम है। इस युद्ध में लगभग ५०००००० (५० लाख) योद्धा भाग लेंगे और अगर आप जैसे कुशल राजा उनके भोजन के प्रबंधन को देखेगा तो हम उस ओर से निश्चिंत ही रहेंगे।
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वैसे भी मुझे पता है कि सागर जितनी इस विशाल सेना के भोजन प्रबंधन करना आपके और भीमसेन के अतिरिक्त और किसी के लिए भी संभव नहीं है।
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भीमसेन इस युद्ध से विरत हो नहीं सकते अतः मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप अपनी सेना सहित दोनों ओर की सेना के भोजन का भार संभालिये।" इस प्रकार उडुपी के महाराज ने सेना के भोजन का प्रभार संभाला।
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पहले दिन उन्होंने उपस्थित सभी योद्धाओं के लिए भोजन का प्रबंध किया। उनकी कुशलता ऐसी थी कि दिन के अंत तक एक दाना अन्न का भी बर्बाद नहीं होता था।
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जैसे-जैसे दिन बीतते गए योद्धाओं की संख्या भी कम होती गयी। दोनों ओर के योद्धा ये देख कर आश्चर्यचकित रह जाते थे कि हर दिन के अंत तक उडुपी नरेश केवल उतने ही लोगों का भोजन बनवाते थे जितने वास्तव में उपस्थित रहते थे।
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किसी को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर उन्हें ये कैसे पता चल जाता है कि आज कितने योद्धा मृत्यु को प्राप्त होंगे ताकि उस आधार पर वे भोजन की व्यवस्था करवा सकें।
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इतने विशाल सेना के भोजन का प्रबंध करना अपने आप में ही एक आश्चर्य था और उसपर भी इस प्रकार कि अन्न का एक दाना भी बर्बाद ना हो, ये तो किसी चमत्कार से कम नहीं था।
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अंततः युद्ध समाप्त हुआ और पांडवों की जीत हुई। अपने राज्याभिषेक के दिन आख़िरकार युधिष्ठिर से रहा नहीं गया और उन्होंने उडुपी नरेश से पूछ ही लिया
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हे महाराज ! समस्त देशों के राजा हमारी प्रशंसा कर रहे हैं कि किस प्रकार हमने कम सेना होते हुए भी उस सेना को परास्त कर दिया जिसका नेतृत्व पितामह भीष्म, गुरु द्रोण और हमारे ज्येष्ठ भ्राता कर्ण जैसे महारथी कर रहे थे।
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किन्तु मुझे लगता है कि हम सब से अधिक प्रशंसा के पात्र आप है जिन्होंने ना केवल इतनी विशाल सेना के लिए भोजन का प्रबंध किया अपितु ऐसा प्रबंधन किया कि एक दाना भी अन्न का व्यर्थ ना हो पाया। मैं आपसे इस कुशलता का रहस्य जानना चाहता हूँ।
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इसपर उडुपी नरेश ने हँसते हुए कहा - "सम्राट ! आपने जो इस युद्ध में विजय पायी है उसका श्रेय किसे देंगे ?
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इसपर युधिष्ठिर ने कहा "श्रीकृष्ण के अतिरिक्त इसका श्रेय और किसे जा सकता है ? अगर वे ना होते तो कौरव सेना को परास्त करना असंभव था।
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तब उडुपी नरेश ने कहा "हे महाराज ! आप जिसे मेरा चमत्कार कह रहे हैं वो भी श्रीकृष्ण का ही प्रताप है।" ऐसा सुन कर वहाँ उपस्थित सभी लोग आश्चर्यचकित हो गए।
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तब उडुपी नरेश ने इस रहस्य पर से पर्दा उठाया और कहा - "हे महाराज! श्रीकृष्ण प्रतिदिन रात्रि में मूँगफली खाते थे।
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मैं प्रतिदिन उनके शिविर में गिन कर मूँगफली रखता था और उनके खाने के पश्चात गिन कर देखता था कि उन्होंने कितनी मूंगफली खायी है।
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वे जितनी मूँगफली खाते थे उससे ठीक १००० गुणा सैनिक अगले दिन युद्ध में मारे जाते थे। अर्थात अगर वे ५० मूँगफली खाते थे तो मैं समझ जाता था कि अगले दिन ५०००० योद्धा युद्ध में मारे जाएँगे।
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उसी अनुपात में मैं अगले दिन भोजन कम बनाता था। यही कारण था कि कभी भी भोजन व्यर्थ नहीं हुआ।" श्रीकृष्ण के इस चमत्कार को सुनकर सभी उनके आगे नतमस्तक हो गए।
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ये कथा महाभारत की सबसे दुर्लभ कथाओं में से एक है। कर्नाटक के उडुपी जिले में स्थित कृष्ण मठ में ये कथा हमेशा सुनाई जाती है।
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ऐसा माना जाता है कि इस मठ की स्थापना उडुपी के सम्राट द्वारा ही करवाई गयी थी जिसे बाद में माधवाचार्य ने आगे बढ़ाया।

अटल विहारी वाजपेयी : एक महान योद्धा

वर्ष 1957 में जब अटल जी ने बलरामपुर से अपना पहला लोकसभा चुनाव जीता था, तब तक उन्होंने एक बार भी बलरामपुर की यात्रा नहीं की थी। इस चुनाव की भी बड़ी रोचक कहानी है। 1952 में जब पहले लोकसभा चुनाव हुए, तब पंडित जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल में शामिल दो कर्णधार अपनी स्वतंत्र पार्टियां बनाकर उनके विरुद्ध चुनाव लड़ रहे थे। डॉ. भीमराव आंबेडकर शेड्यूल्ड कास्ट फ़ेडरेशन की ओर से, जिसका नामकरण बाद में रिपब्लिकन पार्टी कर दिया गया। और पं. श्यामाप्रसाद मुखर्जी भारतीय जनसंघ से, जिसका गठन गांधी-वध के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लगाए गए प्रतिबंध के परिप्रेक्ष्य में एक राजनीतिक दल की आवश्यकता महसूस किए जाने पर किया गया था। कुल 489 सीटों पर लड़े गए चुनाव में नेहरू जी की कांग्रेस 364 सीटें जीत गईं। आंबेडकर की पार्टी को 2 और श्यामाप्रसाद जी की पार्टी को 3 ही सीटें मिलीं। अटल जी तब राजनीति में नहीं थे। वे लखनऊ से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका "राष्ट्रधर्म" में सम्पादक थे। वे एक पत्रकार के रूप में ही पं. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के सम्पर्क में आए थे और फिर उनके साथ निरंतर यात्राएं करने लगे। 1953 में कश्मीर में मुखर्जी की संदेहास्पद मृत्यु के बाद अटल जी के मन में पत्रकारिता के बजाय लोकप्रिय राजनीति का संकल्प सुदृढ़ हो गया। भारतीय जनसंघ का चुनाव चिह्न दीपक हुआ करता था। तब पार्टी के कार्यकर्तागण चुनाव प्रचार के तौर पर दीवारों पर चढ़कर दिया जलाते थे। अटल जी इन कार्यकर्ताओं में शामिल थे। किंतु अन्य कार्यकर्ताओं से अधिक वे एक ओजस्वी वक्ता भी थे। वर्ष 1957 में जब दूसरा लोकसभा चुनाव हुआ तो अटल जी को उनकी वक्तृता शैली के कारण ही चुनाव लड़ाने का निश्चय किया गया। तीन सांसदों वाली जनसंघ तब छोटी-सी पार्टी थी, जिसके क़द्दावर संस्थापक का देहांत हो चुका था। आचार्य देवप्रसाद घोष तब उसके अध्यक्ष थे। दीनदयाल उपाध्याय, बलराज मधोक, लालकृष्ण आडवाणी और अटल जी उसके कर्णधार थे। तय किया गया कि प्रखर वक्ता अटल जी को तीन सीटों से चुनाव लड़ाया जाएगा- मथुरा, लखनऊ और बलरामपुर। मथुरा से इसलिए कि पार्टी एक ऐसा उम्मीदवार खोज रही थी, जो ज़मानत ज़ब्त होने से बचा सके। जीत का तो सवाल ही नहीं था। लखनऊ से इसलिए कि अटल जी वहीं के निवासी थे और एक उपचुनाव में अच्छे वोट प्राप्त कर चुके थे। अलबत्ता जीत की उम्मीद यहां भी नगण्य थी। बलरामपुर से इसलिए कि वहां पर अवश्य पार्टी की स्थिति ठीक-ठाक मानी जा सकती थी। वहां पार्टी के कार्यकर्ता प्रतापनारायण तिवारी ने संगठन को मज़बूती प्रदान कर दी थी। एक और बात यह थी कि बलरामपुर में तब मुस्लिम ज़मींदारों का आधिपत्य था और उनके शोषण के शिकार छोटे किसानों की सहानुभूति पार्टी जीत सकती थी। अटल जी इससे पहले कभी बलरामपुर गए भी नहीं थे। "बिंदु-बिंदु विचार" में अटल जी ने लिखा है- "न मुझे बलरामपुर के भूगोल का कोई ज्ञान था, न इतिहास का। गोंडा से गोरखपुर के लिए छोटी लाइन जाती थी, बलरामपुर स्टेशन उसी पर स्थित था। आधी रात को रेलगाड़ी गोंडा से चलती थी और ब्रह्ममुहूर्त में बलरामपुर पहुंचती थी। मैं गोंडा से गाड़ी में चढ़ा और संकरी-सी बर्थ पर बिस्तर बिछाकर सो गया। आंख खुली तो गाड़ी एक स्टेशन पर खड़ी थी। खिड़की खोलकर देखा तो सैकड़ों कौए स्टेशन पर लगे पेड़ों पर कांव-कांव कर रहे थे। सारा आकाश गूंज रहा था। मैंने पूछा- यह कौन-सा स्टेशन है? उत्तर मिला- कौवापुर।" कौवापुर और इंटियाथोक के बीच ही नेपाल सीमा पर बलरामपुर था, जहां रेलगाड़ी के फ़र्श पर सोते हुए अटल जी चुनाव लड़ने पहुंचे थे। अटल जी ने लिखा है कि वहां पर मुस्लिम ज़मींदारों का ऐसा ख़ौफ़ था कि शंख-घड़ियाल बजाने पर भी रोक थी। जनसंघ की विचारधारा से वहां का उत्पीड़ित किसान वर्ग तुरंत जुड़ा। चुनाव हुए। मथुरा में ज़मानत नहीं बचाई जा सकी। लखनऊ में करारी हार मिली। किंतु बलरामपुर में विजयश्री ने अटल जी का प्रथम वरण किया। 1957 के चुनाव में भारतीय जनसंघ ने 4 सीटें जीती थीं। उनमें से एक बलरामपुर के सांसद अटल बिहारी वाजपेयी थे। शेष तीन सीटें हरदोई, धूलिया और रत्नागिरी से प्राप्त हुई थीं। जिस लोकसभा में पंडित जवाहरलाल नेहरू 371 सीटों के धुंआधार बहुमत से प्रधानमंत्री बने हों और उनके मंत्रिमंडल में मौलाना आज़ाद, गोविंदवल्लभ पंत, मोरारजी देसाई, जगजीवनराम जैसे मूर्धन्य हों, उसमें भारतीय जनसंघ के चारों सांसदों में जिस एक सांसद ने सबका, स्वयं प्रधानमंत्री का, ध्यान खींचा, उसका नाम अटल बिहारी वाजपेयी था। अपने पहले ही लोकसभा भाषण में अटल जी ने एक वाक्य कहा था- "बोलने के लिए वाणी चाहिए, किंतु चुप रहने के लिए वाणी और विवेक दोनों चाहिए।" इस एक बात ने पं. नेहरू का दिल जीत लिया था। पंडितजी अंग्रेज़ी में भाषण करते थे, किंतु उन्होंने अटल जी का नाम लेकर उनके द्वारा कही गई ये पंक्तियां हिंदी में दोहराईं और प्रभावी युवा नेता-वक्ता का अभिनंदन किया। वो 1957 था, उसके पूरे 42 साल बाद अटल जी को प्रधानमंत्री के उसी सिंहासन पर विराजमान होना था, जिस पर तब नेहरूजी आसीन थे। किंतु केवल 13 दिनों के लिए। चार दशक की तपस्या और तेरह दिन का राज, किंतु पराजय का वह क्षण अटल जी के प्रधानमंत्रित्व का अंत नहीं था, वास्तव में वह तो उसका यशस्वी शंखनाद था, पाञ्चजन्य के जयघोष से भरा। कवि, पत्रकार, स्वयंसेवक, कार्यकर्ता, जनप्रतिनिधि, सांसद, राजनेता, प्रधानमंत्री, गठबंधन सरकार के मुखिया - अटल-व्यक्तित्व को देखना हो तो इतने वैराट्य में ही देखना समीचीन होगा। और सत्ता का दम्भ सिर चढ़कर बोलने लगे, तो 3 सीटें जीतने वाली जनसंघ की गंगोत्री का स्मरण संसदीय राजनीति में विनम्रता बनाए रखने का निमित्त होगा, जिसके लिए युवा अटल जी ने दिये जलाए थे। इति शुभम्। 🙏 सुशोभित सक्तवत के फेसबुक से

Wednesday, July 25, 2018

पूर्वी अफ्रीकी देश युगांडा का तानाशाह ईदी अमीन

पूर्वी अफ्रीकी देश युगांडा का जब भी ज़िक्र होता है, तब वहां के तानाशाह ईदी अमीन का नाम ज़रूर लिया जाता है| ईदी अमीन को इंसानियत का दुश्मन, हैवान, राक्षस और न जाने क्या-क्या कहा जाता है. युगांडा पर आठ बरस की तानाशाही में ईदी अमीन ने लाखों लोगों को मरवा दिया था. उनके बारे में तमाम तरह की कहानियां प्रचलित हैं कि 'वो लोगों का ख़ून पीता था, आदमख़ोर था'| ईदी अमीन ने अपनी तानाशाही के दौरान भारतीय मूल के क़रीब 90 हज़ार लोगों को देश निकाला दे दिया था| ब्रिटिश पत्रकार यास्मीन अलीभाई-ब्राउन युगांडा में पैदा हुई थीं. वहीं पली-बढ़ीं. यास्मीन के पिता भारत से जाकर युगांडा में बसे थे. यास्मीन उन एशियाई मूल के लोगों में से हैं जो ईदी अमीन की तानाशाही सनक के शिकार हुए थे जब अचानक अमीन ने हज़ारों एशियाई मूल के लोगों को युगांडा छोड़कर जाने का फ़रमान सुना दिया था| इस ख़ास रिपोर्ट के लिए यास्मीन ने बीबीसी से बात की.इसमें उन्होंने ईदी अमीन के दौर के तजुर्बे साझा किए, युगांडा के अपने दोस्तों से बात की और उस दौर यानी ईदी अमीन के तानाशाही शासन को फिर से, नए सिरे से समझने की कोशिश की. अमीन के राज को न सिर्फ़ युगांडा के इतिहास का काला अध्याय कहा जाता है बल्कि इंसानियत की तारीख़ का भी बहुत बुरा दौर माना जाता है. यास्मीन बताती हैं, ''युगांडा में एशियाई मूल के लोगों की ज़िंदगी बेहद शानदार थी. वो युगांडा की कुल आबादी के महज़ एक फ़ीसदी थे मगर युगांडा की क़रीब 20 फ़ीसदी संपत्ति इन एशियाई मूल के लोगों के पास थी.'' अंग्रेज़ एशियाई मूल के लोगों को युगांडा ले गए इन एशियाई मूल के लोगों को अंग्रेज़, भारतीय उपमहाद्वीप से युगांडा ले गए थे. अंग्रेज़ों का मक़सद था, इन भारतीयों की मदद से पूर्वी अफ्रीका का प्रशासन चलाना. इसके अलावा भारतीय मूल के लोगों की मदद से युगांडा में रेलवे लाइन भी बिछाई गई. बाद में बहुत से भारतीय युगांडा में ही बस गए. कुछ ने प्रशासन में सिक्का जमाया, तो बहुत से लोगों ने कारोबार में नाम-दाम कमाया. इनमें से ज़्यादातर लोग मूल रूप से गुजरात के रहने वाले थे. जब ईदी अमीन ने 90 हज़ार के क़रीब एशियाई मूल के लोगों को देश निकाले का फ़रमान सुनाया तो इनमें से क़रीब 20 हज़ार के पास ब्रिटिश पासपोर्ट था. यानी वो ब्रिटेन के नागरिक थे. युगांडा से निकाले जाने के बावजूद उन्होंने ब्रिटेन में भी ख़ूब कामयाबी हासिल की. 70 के दशक में युगांडा की राजधानी कंपाला में ज़्यादातर कारोबार एशियाई मूल के लोगों के हाथ में था. वहां की सड़कों के नाम एशियाई मूल के लोगों के नाम पर थे. अब दौर बदल गया है. बहुत-सी सड़कों के जो नाम यास्मीन के बचपन के दिनों में थे, वो अब बदल गए हैं. आज बड़ी तादाद में अफ्रीकी भी कारोबार कर रहे हैं. यास्मीन अपने बचपन के दिनों को याद कर कहती हैं कि उन्हें अफ्रीकी लोग स्वाहिली में 'मटोटो पोटेया' यानी 'खोया हुआ बच्चा' कहते थे. यास्मीन कहती हैं कि वो अक्सर बाज़ार में खो जाया करती थीं. 'युगांडा के कसाई' ईदी अमीन ने जब 90 हज़ार एशियाई मूल के लोगों को देश से निकाला तो उनके लिए पूरी दुनिया में आवाज़ उठी. आज भी ईदी अमीन का ज़िक्र होता है, तो उस देश निकाले की बात होती है. मगर, ईदी अमीन के दौर में युगांडा के अफ्रीकी लोगों पर जो बीती, उसकी तरफ़ से दुनिया ने आंखें फेर रखी थीं. आज उस क़िस्से को भुला दिया गया है. लाशें सड़ती हुई मिलीं ईदी अमीन की हुक़ूमत ख़त्म होने के बाद युगांडा में कई जगह लोगों की लाशें सड़ती हुई मिली थीं. तमाम सामूहिक क़ब्रों का पता चला था. वो वाक़ई में एक राक्षस था जिसने अपने ही देश के लाखों लोगों का ख़ून किया था. एक दौर ऐसा भी था जब ईदी अमीन अपने देश के लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय था. जब उसने एशियाई मूल के लोगों को देश से बाहर निकाल फेंकने का एलान किया तो उसे भारी जनसमर्थन मिला था. 19वीं सदी के आख़िर में अंग्रेज़ों ने पूर्वी अफ्रीका के एक बड़े हिस्से पर अपना उपनिवेश क़ायम कर लिया था. वहां के निज़ाम को चलाने के लिए अंग्रेज़ों को ऐसे लोग चाहिए थे जो उनके रहन-सहन को जानें और अफ्रीकी लोगों से संवाद का ज़रिया भी बनें. साम्राज्यवादी सरकार ने भारतीय मूल के बहुत से लोगों को युगांडा लाकर बसाया. वहां बसे भारतीय मूल या एशियाई मूल के इन लोगों ने अंग्रेज़ों से तो नज़दीकी क़ायम कर ली, मगर अफ्रीकी नस्ल के मूल निवासियों से वो दूर ही रहे. युगांडा में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों की अपनी अलग बस्तियां थीं. उनके कारोबार अलग थे. स्कूल अलग थे. वो अफ्रीकी मूल के लोगों के साथ घुलते-मिलते नहीं थे. 9 अक्टूबर 1962 को जब युगांडा को ब्रिटेन से आज़ादी मिली तो एशियाई मूल के लोग बहुत आशंकित थे. उन्हें युगांडा का अंग्रेज़ों से आज़ाद होना शायद अच्छा नहीं लगा था. अफ्रीकियों की एशियाई मूल के लोगों से नाराज़गी आज़ादी के बाद मिल्टन ओबोटे युगांडा के पहले प्रधानमंत्री बने. वहां के सबसे बड़े क़बीले बगांडा के सरदार एडवर्ड मोटेसा देश के राष्ट्रपति बनाए गए. चार साल बाद ही ओबोटे ने मोटेसा को राष्ट्रपति पद से हटाकर पूरी सत्ता हथिया ली. सत्ता परिवर्तन के दौरान कुछ एशियाई मूल के लोग ओबोटे की सरकार में शामिल हुए. मगर युगांडा के अफ्रीकी मूल के लोगों और एशियाई समुदाय के बीच दूरी बनी रही. ज़्यादातर एशियाई मूल के लोगों की सोच अफ्रीकी लोगों के प्रति नस्लवादी थी. अफ्रीकी मूल के लोग भी एशियाई मूल के लोगों से नाख़ुश थे. युगांडा के पत्रकार ड्रेक सकेबा कहते हैं, "एशियाई समुदाय के लोग अफ्रीकी मूल के लोगों से दूरी बनाकर रखते थे. दोनों समुदायों के अपने अलग स्कूल थे. दोनों समुदायों के बीच ताल्लुक़ की डोर ही नहीं थी. यही वजह थी कि युगांडा के लोग अंग्रेज़ों को साम्राज्यवादी ताक़त मानते थे तो एशियाई समुदाय को शोषक वर्ग के तौर पर देखते थे जो देश के मूल निवासियों का 'शोषण' कर रहे थे. इसीलिए दोनों समुदायों के बीच बहुत कड़वाहट थी. इक्का-दुक्का लोग रहे होंगे, जो मिलकर काम कर रहे थे." युगांडा का हाल दक्षिण अफ्रीका जैसा था जहां यूरोपीय समुदाय हुक़ूमत कर रहा था तो भारतीय मूल वहां का मध्यम वर्ग था. मूल अफ्रीकी समुदाय के लोगों की हालत देश में सबसे निचले पायदान पर होने की वजह से बहुत बुरी थी. सिनेमाघरों में हिंदी फ़िल्में लंदन में रहने वाले मीडिया सलाहकार जोएल किबाज़ो युगांडा के बारे में गहरी समझ रखते हैं. जोएल का परिवार भी युगांडा छोड़कर ब्रिटेन में आ बसा था. जोएल कहते हैं कि एक दौर ऐसा था कि युगांडा की राजधानी कंपाला में भारतीय मूल के लोगों का ही दबदबा था. जोएल बताते हैं, "कंपाला में शाम के वक़्त भारतीय मूल के लोग सड़कों पर निकला करते थे. उस वक़्त अफ्रीकी समुदाय के लोगों के सड़कों पर निकलने की मानो मनाही थी, कोई क़ानून नहीं था. मगर सब को पता था कि कंपाला की सड़कों पर अफ्रीकी समुदाय के लोग नहीं घूम सकते. वो जगह केवल गोरों और 'ब्राउन साहेब' यानी एशियाई मूल के लोगों के लिए थी." जोएल उन दिनों को याद कर कहते हैं कि शहर के कमोबेश हर सिनेमाघर में भारतीय, हिंदी फ़िल्में दिखाई जाती थीं. दिन के वक़्त तो अफ्रीकी कामगार कंपाला में आ सकते थे. शाम के वक़्त सारा शहर भारतीय हो जाता था. ओबोटे के दौर में कुछ दिनों तक युगांडा में स्थिरता रही. आर्थिक हालात भी कुछ सुधरे. मगर असल बदलाव कहीं नहीं दिख रहा था. भारतीय मूल के लोगों के हाथों में देश की संपत्ति जोएल किबाज़ो कहते हैं, "देश की संपत्ति भारतीय मूल के लोगों के हाथों में थी. हमारे लिए आज़ादी के कोई मायने नहीं थे क्योंकि मिस्टर पटेल अपनी दुकान केवल किसी और मिस्टर पटेल को ही बेचते थे. किसी अफ्रीकी को नहीं. अफ्रीकी मूल के लोगों से भारतीय समुदाय के लोग बराबरी की शर्तों पर सौदे नहीं करते थे. आज़ादी के बावजूद अफ्रीकी लोगों को काम करने की पूरी आज़ादी नहीं थी. ये आज़ादी अधूरी थी और इसके लिए काफ़ी हद तक भारतीय मूल के लोग ज़िम्मेदार थे." युगांडा के राजनीतिक विश्लेषक और इतिहासकार मम्बुत्सिया एंडेबेसा जोएल किबाज़ो से इत्तिफ़ाक़ रखते हैं. वो कहते हैं कि अंग्रेज़ों के जाने के बाद भी युगांडा में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों के मिज़ाज में कतई बदलाव नहीं आया था. मम्बुत्सिया एंडेबेसा कहते हैं कि, "उस वक़्त युगांडा में अगर किसी के पास पूंजी थी तो वो भारतीय या यूरोपीय मूल के समुदाय के पास थी. आज़ादी के बाद जल्द ही भारतीय समुदाय के हित अफ्रीकी समुदाय के हितों से टकराने लगे. हालात से निपटने के लिए मिल्टन ओबोटे की सरकार ने आर्थिक विकेंद्रीकरण की नीति अपनाई. नतीजा ये हुआ कि जिस संपत्ति और कारोबार पर भारतीय मूल के लोगों का एकाधिकार था, उस पर अचानक अफ्रीकी कब्जा करने लगे. संघर्ष के हालात लगातार बने हुए थे." जब ईदी अमीन बने सेनाध्यक्ष युगांडा को आज़ाद हुए क़रीब एक दशक हो चले थे. ओबोटे देश के हालात बदलने में नाकाम रहे थे. वो तानाशाही हुक़ूमत चला रहे थे. देश में ओबोटे के कई दुश्मन बन गए थे, लेकिन वो अपने जनरल ईदी अमीन पर बहुत भरोसा करते थे और उनकी मदद से तानाशाही चला रहे थे. ईदी अमीन इस्लामिक क़बीले काक्वा से ताल्लुक़ रखते थे. अमीन ने कभी औपचारिक तालीम नहीं हासिल की थी. अंग्रेज़ों के दौर में वो सेना में भर्ती हो गए थे. सेना में अमीन ने तेज़ी से तरक्की की थी. 1966 में राष्ट्रपति मिल्टन ओबोटे ने ईदी अमीन को सेनाध्यक्ष नियुक्त किया. ओबोटे की सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हुई थी. देश में अराजकता का माहौल था. तमाम क़बीलों को शिकायत थी कि उनके साथ भेदभाव हो रहा है. उन पर ज़ुल्म ढाए जा रहे हैं. वो दौर शीतयुद्ध का भी था. अमरीका, ब्रिटेन और इसराइल को लगा कि ओबोटे की सरकार का झुकाव सोवियत संघ की तरफ़ बढ़ता जा रहा है. ईदी अमीन ने तख़्तापलट किया 1971 में जब मिल्टन ओबोटे राष्ट्रमंडल की बैठक में शामिल होने सिंगापुर गए हुए थे तो ईदी अमीन ने उनका तख़्तापलट कर दिया. अमीन ने ये तख़्तापलट बहुत फ़ुर्ती और शांतिपूर्ण तरीक़े से किया. पश्चिमी देशों ने भी अमीन के तख़्तापलट का समर्थन किया. देश की जनता ने भी ईदी अमीन के सत्ता में आने का स्वागत किया. जोएल किबाज़ो कहते हैं कि लोग ओबोटे की सरकार से उकता गए थे. जनता ने ख़ूब जश्न मनाया. पश्चिमी देशों ने भी ईदी अमीन के सत्ता में आने को हाथों-हाथ लिया. किबाज़ो बताते हैं, "ब्रिटेन ने तो ईदी अमीन के हाथों में सत्ता आने को यूं देखा जैसे कि युगांडा का निज़ाम दोबारा उनके हाथ में आ गया हो. अमीन का बकिंघम पैलेस में स्वागत किया गया, लेकिन पश्चिमी देशों ने ईदी अमीन के बारे में ग़लत अंदाज़ा लगाया था. उन्हें जल्द ही अपनी ग़लती का एहसास हो गया." ईदी अमीन की सरकार को मान्यता देने में ब्रिटेन अव्वल था, मगर कई अफ्रीकी देशों ने इस तख़्तापलट का विरोध किया. पड़ोसी देश तंज़ानिया ने भी इस पर नाख़ुशी ज़ाहिर की. पूर्व राष्ट्रपति ओबोटे ने तंज़ानिया में ही पनाह ली थी. एशियाई समुदाय पर शोषण का आरोप ब्रिटेन को जल्द ही एहसास हो गया कि ईदी अमीन पर भरोसा नहीं किया जा सकता. अमीन ने सेना की मदद से देश पर पूरा नियंत्रण स्थापित कर लिया. अमीन ने लोगों को डराने और ज़ुल्म ढाने के लिए सेना का भरपूर दुरुपयोग किया. हिंसक तरीक़ों का सहारा लिया. राजनीतिक अस्थिरता के इस दौर में युगांडा की अर्थव्यवस्था की हालत और भी बिगड़ती जा रही थी. हालात से निपटने के लिए अमीन ने बड़ा क़दम उठाने का फ़ैसला किया. अमीन ने एशियाई समुदाय पर देश के लोगों के शोषण का आरोप लगाते हुए उनके देश निकाले का एलान किया. मम्बुत्सिया एंडेबेसा कहते हैं कि आज़ादी के बाद एशियाई मूल के लोगों को शोषक के तौर पर देखा जाता था. इसलिए जब ईदी अमीन ने उन्हें देश से बाहर जाने का फ़रमान सुनाया तो अफ्रीकी समुदाय बेहद ख़ुश हो गया. उनके पास वो क़ाबिलियत नहीं थी कि वो भारतीय मूल के लोगों की जगह ले सकें. मगर फिर भी आम अफ्रीकी ने इस फ़ैसले पर ख़ुशी जताई. वैसे अपने भ्रष्टाचार का ठीकरा एशियाई मूल के लोगों पर फोड़ने वाले ईदी अमीन पहले अफ्रीकी नेता नहीं थे. 70 के दशक की शुरुआत में कई अफ्रीकी और एशियाई मूल के लोग थे जो आपस में घुल-मिल रहे थे. यास्मीन इस छोटे से तबक़े से ही ताल्लुक़ रखती थीं. वो कंपाला की मकेरेरे यूनिवर्सिटी में पढ़ती थीं. वहां पर उनके साथियों में अफ्रीकी समुदाय के लोग भी थे. यास्मीन कहती हैं कि वो युगांडा में उनकी ज़िंदगी के सबसे ख़ुशनुमा दिन थे. ''यूनिवर्सिटी का माहौल बहुत ख़ुला था. कैंपस में चारों तरफ़ हरियाली थी. अक्सर छात्रों के गुटों के बीच सियासी तक़रीरें और तकरारें होती थीं.'' लेकिन ईदी अमीन ने सत्ता में आने के बाद यूनिवर्सिटी में सियासी डिबेट पर रोक लगा दी. छात्रों ने इसका विरोध किया तो अमीन ने उन्हें डराने के लिए यूनिवर्सिटी में सेना की टुकड़ी भेज दी. यास्मीन बताती हैं, "बूट पहनकर टैंकों में सवार होकर जब अमीन के सैनिक यूनिवर्सिटी कैंपस में दाख़िल हुए तो ये मंज़र बेहद डरावना था. युगांडा के बेहतर भविष्य की उम्मीद जो मेरे मन में थी, उस सपने को ईदी अमीन के फ़ौजी बूटों ने कुचल डाला था." यास्मीन के यूनिवर्सिटी के दिनों के साथी ममद अलीभाई ने भी ईदी अमीन के दौर में युगांडा छोड़ दिया था. मगर उसकी तानाशाही ख़त्म होने के बाद ममद अलीभाई युगांडा लौट आए. आजकल वो सिक्योरिटी का कारोबार करते हैं जो बेहद कामयाब है. अलीभाई कहते हैं, "स्कूल और यूनिवर्सिटी के दिन मेरी ज़िंदगी के सबसे हसीन यादों वाले दिन हैं. एशियाई मूल के लोग बहुत कम थे. अफ्रीकी और भारतीय समुदाय के बीच की दूरियां घट रही थीं. लोग घुल-मिल रहे थे. हम एक ही स्कूल और यूनिवर्सिटी में पढ़ने लगे थे. ये काम हमसे पहले की पीढ़ी ने नहीं किया था. हमारे अगर एशियाई मूल के दोस्त थे, तो अश्वेत अफ्रीकी दोस्त भी हमने बनाए थे." हेनरी किएम्बा उस दौर के इतिहास को औरों से बेहतर जानते हैं. हेनरी ने मिल्टन ओबोटे के साथ भी काम किया था और बाद में वो ईदी अमीन की सरकार में भी मंत्री रहे थे. हेनरी के घर की तमाम दीवारें उनके लंबे सियासी सफ़र की गवाही देती हैं. हेनरी कहते हैं, "मैंने आज़ादी के बाद की युगांडा की हर सरकार के साथ काम किया है. अंग्रेज़ों से आज़ादी मिलने के बाद हम बहुत उत्साहित थे. हमें लगता था कि हम और भी बेहतर भविष्य बनाएंगे." लेकिन, ईदी अमीन के आने के बाद सब कुछ बदल गया. हेनरी कहते हैं कि ईदी अमीन एक दिलचस्प शख़्सियत थे. उनके दो चेहरे थे. एक वो जो बहुत मज़ाकिया था. दूसरा वो जो क्रूर था, दूसरों पर ज़ुल्म ढाने वाला था. कई भारतीय वहीं रुक गए थे अध्यापिका पीस ट्वीने भी अमीन के ज़ुल्मो-सितम की शिकार हुई थीं. पीस कभी भी उस दौर को भूल नहीं पाईं. वो कहती हैं, ''हमारी समझ में ही नहीं आया कि हुआ क्या है. हमें बस ये पता था कि देश में बहुत बड़ा बदलाव हुआ है. हम कहीं भी आते-जाते हुए डरते थे. रास्ते में सैनिक दिखने पर आंखें नीची करते थे. एक बार एक लड़की की हत्या हो गई तो यूनिवर्सिटी कैंपस में सैनिक घुस आए. लड़कियों ने ख़ुद को एक कमरे में बंद कर लिया. सैनिकों ने ज़बरदस्ती दरवाज़ा खुलवाया और लड़कियों को बुरी तरह पीटा. ऐसा लगता था कि उनकी नज़र में हम इंसान ही नहीं हैं." पश्चिमी देशों ने ईदी अमीन की हैवान हुकूमत के प्रति आंखें मूंद ली थीं. उनके लिए अश्वेतों की जान की कोई क़ीमत नहीं थी. मार-काट के इस दौर में जब भारतीय मूल के लोगों को युगांडा से निकाला गया तो कई परिवारों ने या तो अपनी मर्ज़ी से वहीं रहने का फ़ैसला किया या फिर उन्हें युगांडा में रहने की इजाज़त मिल गई. हुमा अहमद का परिवार ईदी अमीन के दौर में युगांडा में ही ठहर गया था. उनके बाबा ने युगांडा छोड़कर जाने से इनकार कर दिया. मजबूरी में हुमा के मां-बाप को भी रुकना पड़ा. हुमा बताती हैं कि उस दौर में बहुत कम भारतीय मूल के लोग कंपाला में बचे थे. कुछ लोग ऐसे थे जो ग्रामीण इलाक़ों में रहते थे. 'ईदी अमीन की नीयत साफ़ थी' हुमा कहती हैं कि देश निकाले से पहले युगांडा को भारतीय मूल के लोग ही चला रहे थे. अचानक उनके जाने से देश में एक खालीपन आ गया. लोगों को पता ही नहीं था कि बिना भारतीय मूल के लोगों के युगांडा का क्या होगा. हुमा मानती हैं कि ईदी अमीन को लेकर लोगों की सोच में नाइंसाफ़ी रही है. वो कहती हैं कि ईदी अमीन की नीयत साफ़ थी. वो अपने लोगों का भला चाहते थे. वो चाहते थे कि युगांडा का अफ्रीकी समुदाय तरक्की करे. समृद्ध बने. युगांडा की कमान अफ्रीकी समुदाय के लोगों के हाथ में ही हो. युगांडा के पत्रकार टिमोथी कैलीगेरा कहते हैं, "ईदी अमीन का किरदार डोनल्ड ट्रंप से मिलता था. वो दिल के साफ़ थे. बचकाना बर्ताव करते थे, अपनी ही बात से पलट जाते थे. तुनकमिज़ाज थे. बेवजह भड़क उठते थे, लेकिन वो अपने देश, अपनी जनता से बहुत प्यार करते थे. उसका भला चाहते थे." हालांकि जोएल किबाज़ो ऐसा नहीं मानते. जोएल के क़बीले को ईदी अमीन ने लगातार अपने निशाने पर रखा था. जोएल कहते हैं, "हम ख़ुशक़िस्मत थे कि बच निकले, लेकिन मेरे कई दोस्त सेना के हाथों मारे गए. कहा जाता है कि 10 लाख से ज़्यादा लोगों को ईदी अमीन ने मौत के घाट उतार दिया था. ये युगांडा की कुल आबादी का 7-8 फ़ीसदी था. इनमें बुद्धिजीवी भी थे. डॉक्टर और जज भी थे. हालांकि बहुत कम भारतीय मूल के लोग ईदी अमीन के शासन के दौरान मारे गए थे. वो ईदी अमीन के चंगुल से बचकर नई दुनिया बसा लेने में कामयाब रहे." लौटे कई भारतीय परिवार हेनरी किएम्बा ने काफ़ी वक़्त ईदी अमीन की सरकार में गुज़ारा था, लेकिन आख़िर में वो भी ईदी अमीन से अलग होकर देश छोड़कर चले गए. हेनरी कहते हैं, "ईदी अमीन ने जब मेरे भाई को मरवा दिया तो ये मेरे बर्दाश्त से बाहर हो गया था. मेरी मजबूरी थी कि मैं देश में ही रहूं क्योंकि मेरी मां यहीं थी. ईदी अमीन ने दो मंत्रियों को मौत के घाट उतरवा दिया था. उसने युगांडा के आर्कबिशप की हत्या करा दी. जब मेरे भाई को मार दिया गया तो मजबूर होकर मुझे देश छोड़ना पड़ा. ईदी अमीन के लिए किसी की जान की कोई क़ीमत नहीं थी." हालांकि अब युगांडा में एशियाई मूल और अफ्रीकी समुदाय के बीच दूरियां पाटने की कोशिशें हो रही हैं. भारतीय मूल के मयूर माधवानी के परिवार का युगांडा में चीनी बनाने का बड़ा कारोबार है. ईदी अमीन के दौर में माधवानी का परिवार युगांडा छोड़कर चला गया था. मगर 1979 में ईदी अमीन की तानाशाही ख़त्म होने के बाद माधवानी परिवार दोबारा युगांडा में आकर बस गया. मयूर की भतीजी निमिषा माधवानी संयुक्त अरब अमीरात में युगांडा की राजदूत हैं. दोनों ही मानते हैं कि ईदी अमीन के दौर में भारतीय मूल के लोगों की मुश्किलों को ज़्यादा सुर्ख़ियां मिलीं, लेकिन अफ्रीकी समुदाय ने अमीन के ज़ुल्म ज़्यादा झेले. निमिषा कहती हैं, ''ईदी अमीन के दौर में बमुश्किल दो भारतीय समुदाय के लोग मारे गए होंगे, जबकि उसके दौर में 5 लाख से ज़्यादा अश्वेत मारे गए. हिटलर की तरह ईदी अमीन भी इंसानियत का दुश्मन था.'' युगांडा के मौजूदा राष्ट्रपति योवेरी मुसेवेनी भारतीय और अफ्रीकी समुदायों के बीच दूरियां पाटने की कोशिश कर रहे हैं. 1986 में सत्ता में आने के बाद मुसेवेनी ने देश छोड़कर गए भारतीय समुदाय से युगांडा लौटने की अपील की. उन्होंने ईदी अमीन के दौर में ज़ब्त की गई भारतीय मूल के लोगों की पांच हज़ार से ज़्यादा संपत्तियां लौटा दीं. मुसेवेनी के इस प्रस्ताव को स्वीकारने वाले भारतीय मूल के लोगों में ममद अलीभाई सबसे पहले थे. वो कहते हैं कि आज भी युगांडा में अफ्रीकी और भारतीय मूल के लोगों के बीच बराबरी नहीं है. ये बहुत अफ़सोस की बात है. आज भारतीय समुदाय को युगांडा में निवेशक के तौर पर देखा जाता है. आज फिर युगांडा में भारतीय समुदाय के लोगों को आर्थिक शोषण के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है. ममद अलीभाई कहते हैं कि युगांडा की युवा पीढ़ी बेसब्र है. उसे आज भी भारतीय समुदाय के साथ बराबरी नहीं दिखती. अफ्रीकी समुदाय के लोगों के बीच भारतीय समुदाय को लेकर नाराज़गी फिर से बढ़ रही है. जानकार आशंका जताते हैं कि हालात में बदलाव नहीं हुआ तो 60 और 70 के दशक जैसी स्थिति फिर से बन सकती है. हालांकि यास्मीन समेत बहुत से ऐसे लोग हैं जो युगांडा की युवा पीढ़ी की तरफ़ बहुत उम्मीद से देख रहे हैं.

Tuesday, July 17, 2018

चाहे सारी दुनिया समाप्त हो जाये पर हम समाप्त नहीं होंगें क्योंकि हम तो सनातनी हैं।

हमारे यहाँ बहुत ज्यादा प्रचार है कि हमारा धर्म सनातन है, ये कभी ख़त्म नहीं हो सकता। जब हम ये बात सुनते हैं तो निश्चित हो जाते हैं कि चाहे सारी दुनिया समाप्त हो जाये पर हम समाप्त नहीं होंगें क्योंकि हम तो सनातनी हैं और हम समाप्त होने वाले नहीं हैं। ये एक बेहद ही झूठा, बेहूदा और अनर्गल प्रचार है, जिसे हमारी कायरता ने पैदा किया है। ईसाई और मुसलमान, इन दो संप्रदाय के पैदा होने से पहले पूरे विश्व में केवल हम ही हम थे। अब जरा सोचो कि - आज हम है कहाँ ? हमारी स्थिति क्या है ? हमारा भूतकाल हमारे भविष्य को कितना भयावह बयां कर रहा है ? सभी नेताओं और पार्टियों (कोई विशेष नहीं) ने हम हिन्दुओं से हमारे विनाश के आँकड़े छुपा कर हमें पूर्ण रूप से मूर्ख बना दिया है। जब हिन्दुस्तान में प्रथम लुटेरे मोहम्मद बिन कासिम ने पहली बार हिन्दुओं को जीता तो उस समय पूरी दुनिया में 70 करोड़ हिन्दू और 15 लाख मुसलमान थे। जब अंग्रेजों ने हिन्दुस्तान का राज अपने हाथ में लिया तब हिन्दू लगभग 1000 साल में केवल 20 करोड़ रह गये थे। इसका अर्थ यह नहीं है कि 1000 साल में 50 करोड़ हिन्दुओं का क़त्ल हुआ, इसका अर्थ है कि 1000 साल में कम से कम 500 करोड़ हिन्दुओं का क़त्ल विदेशी लुटेरों ने किया था। हम अंग्रेजों की गुलामी को गुलामी बोलते है किन्तु सत्य तो यह है कि अंग्रेजों ने तो हमारी आज़ादी का मार्ग तैयार किया था। अगर अंग्रेज इस देश में ना आते तो हमारा हिन्दू के रूप में नामो-निशान अब तक मिट चुका होता। इस हिन्दुओं की पवित्र भूमि पर मदरसे और उर्दू ने गुरुकुल और संस्कृत का स्थान ले लिया था। ये बहुत बड़ा विषय है और हमारे व्हाट्स एप और फेसबुक के बेताज बादशाहों को इतनी बड़ी पोस्ट पढ़ने की आदत कम ही है। मैं आपको केवल इतना बताना चाहता हूँ कि झूठी डींगों के कारण आज हिन्दू विनाश की और बहुत तीव्रता से बढ़ रहा है। "हिन्दुओं अब तो धरातल पर आ जाओ और सच का सामना करो" आज अपनी ही भूमि पर हिन्दू संस्कृति अपने अंतिम दौर में है क्योंकि यहाँ बहुत जल्दी मुस्लिम जनसंख्या तथाकथित "अल्पसंख्यक" के स्थान पर "बहुसंख्यक" हो जाने वाली है और अगर एक बार भी ये हो गया तो स्वयं देवाधिदेव भगवान महादेव शिव और जगद्जननी माँ जगदम्बा भी हिन्दुओं को बचाने नहीं आने वाले क्योंकि कायरों का कोई नहीं होता, इसलिये मुर्ख हिन्दुओं भावनाओं में मत बहो। तुम्हारे पास आज अपने धर्म की रक्षा का समय है, जो कल नहीं होगा। फिर तुम्हारे हर बेटे का क़त्ल होगा और तुम्हारी हर बेटी का बलात्कार होगा और वो मंडी में बैठेगी। अबकी बार तुम्हें सर पकड़ कर रोने का भी समय नहीं मिलेगा। इसलिये सारे मुद्दे छोड़कर इस देश के नेताओं को "जनसंख्या नियंत्रण कानून" बनाने के लिये विवश कर दो और जब तक ये कानून नहीं बन जाता अपनी सारी ताकत बच्चे पैदा करने में लगा दो क्योंकि अगर एक भी तुम उन जिहादियों से कम हो गये तो तो तुम्हें तुम्हारे विनाश से कोई नहीं बचा सकेगा। "निर्णय तुम्हारा है!" हर हर महादेव

इस संसार का शाश्वत सत्य केवल "मृत्यु" ही है

इस संसार का शाश्वत सत्य केवल "मृत्यु" ही है, जीवन मे कुछ भी होना पूर्ण संभावित नहीं है जबकि मृत्यु होना 100% संभावित है। एक न एक दिन मृत्यु सभी को आनी है। इस सच्चाई को जानते हुए भी हम मृत्यु से घबराते हैं। शरीर से प्राण निकलने के भी कई कारण होते हैं। यदि आध्यात्मिक रूप से देखा जाए तो मृत्यु का अर्थ है शरीर से प्राण अर्थात आत्मा का निकल जाना। इसके बिना शरीर सिर्फ भौतिक वस्तु रह जाता है। इसे ही मृत्यु कहते हैं। जबकि विज्ञान की दृष्टि से मृत्यु का अर्थ कुछ भिन्न है। उसके अनुसार शरीर में दो तरह की तरंगें होती हैं - पहली भौतिक तरंग और दूसरी मानसिक तरंग। जब किसी कारणवश इन दोनों का संपर्क टूट जाता है तो व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। साधारणत: मृत्यु 3 प्रकार से होती है - भौतिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक। किसी दुर्घटना या बीमारी से मृत्यु का होना भौतिक कारण की श्रेणी मे आता है। इस समय भौतिक तरंग अचानक मानसिक तरंगों का साथ छोड़ देती है और शरीर प्राण त्याग देता है। जब अचानक किसी ऐसी घटना-दुर्घटना के बारे मे सुनकर, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, मृत्यु होती है तो ऐसे समय मे भी भौतिक तरंगें मानसिक तरंगों से अलग हो जाती है और व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। यह मृत्यु का मानसिक कारण है। मृत्यु का तीसरा कारण आध्यात्मिक है। आध्यात्मिक साधना मे मानसिक तरंग का प्रवाह जब आध्यात्मिक प्रवाह मे समा जाता है, तब व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है क्योंकि भौतिक शरीर अर्थात भौतिक तरंग से मानसिक तरंग का तारतम्य टूट जाता है। ऋषि मुनियों ने इसे महामृत्यु कहा है। धर्म ग्रंथों के अनुसार महामृत्यु के बाद नया जन्म नहीं होता और आत्मा जीवन-मरण के बंधन से मुक्त हो जाती है। शस्त्रमेव जयते हर हर महादेव

आधी उर्दू आधा इस्लाम

अगर आपका किसी उर्दू वाले से पाला पड़ा है तो आपने पाया होगा कि उर्दू वाले का उच्चारण कुछ अजीब सा होता है। वो आधी ध्वनियों को पूरा बोलता है। क्लब को किलब, प्रचार को परचार, सरस्वती को सरसुती, प्रजातंत्र को परजा तंतर, ऐसे सैकड़ों उदाहरण दिए जा सकते हैं। कभी इस्लाम के वामपंथी मुखौटे जावेद अख़्तर को, घनघोर मुल्ला ओवैसी भाइयों को टीवी पर बोलते सुनिये। आपको उच्चारण का यह बहुत भौंडा अंतर तुरन्त समझ आ जायेगा। इसका कारण उर्दू वालों से पूछिये तो जवाब मिलता है कि उर्दू में आधे हर्फ़ नहीं लिखे जाते हैं अतः पढ़े-बोले भी नहीं जाते हैं। यहाँ एक तार्किक बात सूझती है कि हर्फ़ को हरफ़ तो नहीं बोला जाता। उर्दू के दो अक्षर स्वाद, ज़्वाद सवाद या सुवाद और ज़वाद नहीं बोले जाते अर्थात आधी ध्वनि लिख न पाने का बहाना झूठ है तो फिर क्या कारण है कि उर्दू वाले दूसरी भाषाओँ के उच्चारण बिगाड़ कर बोलते हैं! आपने कभी कुत्ता पाला है ? न पाला हो तो किसी पालने वाले से पूछियेगा। जब भी कुत्ते को घुमाने ले जाया जाता है तो कुत्ता सारे रास्ते इधर-उधर सूंघता हुआ और सूंघे हुए स्थानों पर पेशाब करता हुआ चलता है। स्वाभाविक है कि यह सूझे यदि कुत्ते को पेशाब आ रहा है तो एक बार में क्यों फ़ारिग़ नहीं होता, कहीं उसे पथरी तो हो नहीं गयी है ? फिर हर कुत्ते को पथरी तो नहीं हो सकती तो उसका पल-पल धार मारने का क्या मतलब है ? मित्रो! कुत्ता वस्तुतः पेशाब करके अपना इलाक़ा चिन्हित करता है। यह उसका क्षेत्र पर अधिकार जताने का ढंग है। बताने का माध्यम है कि यह क्षेत्र मेरी सुरक्षा में है और इससे दूर रहो अन्यथा लड़ाई हो जाएगी। उर्दू वालों का अन्य भाषाओं के शब्दों को उनकी मूल ध्वनियों की जगह बिगाड़ कर बोलना कहीं उन भाषाओं, उनके बोलने वालों में अपना इलाक़ा चिन्हित करना तो नहीं है! ईसाई विश्व का एक समय सबसे प्रभावी नगर कांस्टेंटिनोपल था। 1453 में इस्लाम ने इस नगर को जीता और इसका नाम इस्ताम्बूल कर दिया। स्वाभाविक ही मन में प्रश्न उठेगा कि कांस्टेंटिनोपल में क्या तकलीफ़ थी जो उसे इस्ताम्बूल बनाया गया! बंधुओ, यही इस्लाम है। सारे संसार को, संसार भर के हर विचार को, संसार भर की हर सभ्यता को, संसार भर की हर आस्था को मारकर, तोड़कर, फाड़कर, छीनकर, जीतकर, नोचकर, खसोटकर येन-केन-प्रकारेण इस्लामी बनाना ही इस्लाम का लक्ष्य है। रामजन्भूमि, काशी विश्वनाथ के मंदिरों पर पर इसी कारण मस्जिद बनाई जाती है। कृष्ण जन्मभूमि का मंदिर तोड़ कर वहां पर इसी कारण ईदगाह बनाई जाती है। पटना को अज़ीमाबाद इसी कारण किया जाता है। अलीगढ, शाहजहांपुर, मुरादाबाद, सहारनपुर और ऐसे ही सैकड़ों नगरों के नाम वाराणसी, मथुरा, दिल्ली, अजमेर चंदौसी, उज्जैन जैसे सैकड़ों नगरों में छीन कर भ्रष्ट किये गए मंदिर इन इस्लामी करतूतों के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। इस्लाम अपने अतिरिक्त हर विचार, जीवन शैली से इतनी घृणा करता है कि उसे नष्ट करता आ रहा है, नष्ट करना चाहता है। इसका इलाज ही यह है कि समय के पहिये को उल्टा घुमाया जाये। इन सारे चिन्हों को बीती बात कह कर नहीं छोड़ा जा सकता क्योंकि इस्लामी लोग अभी भी उसी दिशा में काम कर रहे हैं। बामियान के बुद्ध, आई एस आई एस द्वारा सीरिया के प्राचीन स्मारकों को तोड़ा जाना आज भी चल रहा है। इस्लामियों के लिये उनका हत्यारा चिंतन अभी भी त्यागने योग्य नहीं हुआ है, अभी भी कालबाह्य नहीं हुआ है। अतः ऐसी हर वस्तु, मूर्ति, चित्र, मंदिर, नगर, आस्था हमें वापस चाहिये। धर्मावलंबियों! इसका दबाव बनाना प्रारम्भ कीजिये। सोशल मीडिया पर, निजी बातचीत में, समाचारपत्रों में जहाँ बने जैसे बने इस बात को उठाते रहिये। यह दबाव लगातार बना रहना चाहिए। पेट तो रात-दिन सड़कों पर दुरदुराये जाते हुए पशु भी भर लेते हैं। मानव जीवन गौरव के साथ, सम्मान के साथ जीने का नाम है। हमारा सम्मान छीना गया था। समय आ रहा है, सम्मान वापस लेने की तैयारी कीजिये। हर हर महादेव

Friday, July 13, 2018

सफलता की नई शुरुवात आज ही करे

6-8 महीने का बच्चा घिसकना शुरू करता है। उसके बाद वो एक साल के आसपास चलना शुरू करता है। गिरता है फिर कोशिश करता है फिर गिरता है फिर कोशिश करता है लेकिन कोशिश करना बंद नही करता है। हम सब क्या करते हैं? वाह शाबास, आजा, वाह-वाह, भेरी गुड बेहतरीन शाबास अच्छा कर रहा है शानदार या ये कहते है कि बच्चे तुम चलो नही वरना गिर जावोगे मत चलो वरना चोट लग जायेगी। असफलता किसी भी सफलता की नींव है। आज हम क्यो भूल रहे है अपने बचपन की ये कोशिशें? क्यो अपने बचपन की बाते भूलते जा रहे है? हम क्यो भूलते जा रहे है कि असफलता ही सफलता की पहली सीढ़ी है। तो मित्रो उठो आज अपने बेहतर दिन की ही नही अपने जीवन की भी एक नई शुरुवात करो। आज से ही करो अभी से करो। खुद को शाबासी दो बोलो खुद को शाबाश मेरे शेर उठ जा आज चल अपने जीवन का नया आगाज कर।

पाचन तंत्र को जल्दी ठीक करने के उपाय

पाचन तंत्र को जल्दी ठीक करने के उपाय 1. अधिक मात्रा में पानी पीये –  हमारे लिए पानी बहुमूल्य है. अधिकतर लोग बहुत कम पानी पीते है. हमें एक दिन में लगभग 2 लीटर पानी पीना चाहिए. अगर आपका पाचन तन्त्र ठीक नहीं है तो आप इसे अधिक पानी भी पी सकते है. यह हमारे शरीर में पानी की मात्रा को पूरा करता है जिससे भोजन को पचने में आसानी होती है. इसलिए पानी पीये और भरपूर पीये. 2. अपनी दिनचर्या सही रखे – मनुष्य के लिए एक अच्छी दिनचर्या का होना बहुत आवश्यक है. अगर आपकी दिनचर्या संतुलित नहीं है तो आपको दिनभर कई छोटी – छोटी समस्याओ का सामना करना पड़ेगा. पाचनतंत्र को आप बेहतर दिनचर्या से दूर कर सकते हो. सुबह से लेकर रात सोने तक अपनी दिनचर्या सही रखे. सही समय पर अपना भोजन ले.  अगर आपका daily routine ठीक होगा तो आपका शरीर भी उसी अनुसार चलता रहेगा. जिससे पाचन तन्त्र भी दुरुस्त हो जाएगी. 3. रात को जल्दी सो जाए- कई लोग काम के चलते और कई अपनी बुरी दिनचर्या (Dincharya) के कारण देर रात जगे रहते है. वे जल्दी सोते नहीं और सुबह लेट में उठते है. देर रात तक जगे रहने से पाचन तन्त्र पर विपरीत प्रभाव पड़ता है. इसलिए रात को भोजन करने के बाद सो जाए. अगर देर रात तक जगे रहोगे तो आपका पाचन तंत्र का ख़राब होना तय है. इससे बचने का उपाय है की रात को देर से सोने की आदत को बदला जाए. 4.अच्छी नींद ले – नींद का हमारे शरीर से गहरा नाता है. जिस तरह हमारे लिए भोजन करना जरुरी है ठीक उसी तरह हमारे लिए नींद भी जरुरी है. बिना अच्छी नींद के अच्छे स्वास्थ्य की कल्पना करना भी मुश्किल है. कई लोग खुद को ओवर स्मार्ट समझते है और सोचते है की कम नींद लेने पर भी वे खुद को फिट रख सकते है. आप कुछ दिन तक तो ऐसा कर सकते हो पर long time में आपकी helth ख़राब हो ही जाएगी. एक दिन में इसलिए 8 से 9 घंटे की अच्छी नींद जरुर ले. 5. तनाव को करे दूर – तनाव आज लोगो का बहुत बड़ा दुश्मन बन गया है. तनाव आदमी को अन्दर ही अन्दर दीमक की तरह खोखला कर देता है. जिससे व्यक्ति कई रोगों से घिर जाता है. अधिक तनाव लेने से पाचन तन्त्र ख़राब हो जाता है. इसलिए तनाव को अपनी लाइफ से दूर करे. 6. फास्ट फ़ूड को कहे अलविदा–   स्वाद हर कोई लेना चाहता है. इस स्वाद के चक्कर में हम लोग फास्ट फ़ूड खाने लगते है. किसी को यह कम पसंद होता है तो किसी को ज्यादा. जिसको यह ज्यादा पसंद होता है वह ख़राब पाचन तन्त्र का शिकार बन जाता है. महीने में कभी – कभी तो फ़ास्ट फ़ूड (fast food) चल सकता है. लेकिन अगर आप रोजाना फ़ास्ट फ़ूड लेते हो तो इसका नेगेटिव इफ़ेक्ट आपको दिखने लग जायेगा. इसका सेवन बहुत कम मात्रा में ले और इसकी जगह helthi food ले. 7. शारारिक कार्य जरुर करे – अधिकतर पाचन तन्त्र ख़राब उन्ही लोगो का होता है जो शारारिक काम नहीं करते है. ऐसे बहुत से लोग होते है जिनका काम शारारिक नहीं होता. ऐसे लोग अपनी दिनचर्या में कुछ शारारिक काम कर सकते है. अगर काम नहीं है तो वे सुबह उठकर टहल सकते है. पैदल घूम सकते है या दौड़ लगा सकते है. इसके अलावा कोई  स्पोर्ट्स या साइकिलिंग कर सकते है. 8. सही समय पर रोजाना भोजन करे – सही समय पर भोजन करना अच्छी सेहत की निशानी होती है. ब्रेकफास्ट से लेकर डिनर तक आपका खाना खाने का time निश्चित होना चाहिए. हमारा शरीर हमारे डेली रूटीन के हिसाब से खुद को ढाल लेता है. अगर हम कभी 1 घंटे पहले कभी एक घंटे बाद खाना खाये तो हमारा भोजन रोज अनियमित हो जाएगा.  जो हमारे पाचन तन्त्र को गड़बड़ा देता है. माना आप सुबह 8 बजे अपना Breakfast लेते हो तो रोज उसी time पर ले. ऐसा हो Lunch और dinner पर भी करे. 9. खाने – पीने में कमी न करे –  यह बहुत लोगो की problem होती है की जब उनको तेज भूख लगती है तब वे कुछ नहीं खाते और जब भूख न हो तब पेट में कुछ न कुछ ठुसते रहते है. जो गलत है, अगर आप खाने – पीने में कमी करोगे तो आपकी सेहत बनना मुश्किल है. जब भी आपको भूख लगती है तब खुद को न रोके. उस समय कुछ खा लें. भूख के समय शरीर को भोजन दो तो पाचन तन्त्र भी अच्छा बना रहेगा. 10. शराब और सिगरेट से दूर रहे- शराब और सिगरेट हमारे Helth के लिए ठीक नहीं होते यह शायद आपको बताने की जरुरत नहीं है. यह आप जानते हो फिर भी जानने के बावजूद लोग इसका सेवन करते रहते है. इनका लगातार सेवन करते रहने से हमारा पाचन तन्त्र ख़राब हो जाता है और कई बीमारियाँ भी घेर देती है. इसके अलावा चाय और कॉफ़ी से भी दूरी बनाये रखे. 11. अधिक खाना खाने से बचे – आवश्यकता से अधिक भोजन लेना हमारे स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं होता. अधिक खाने से हमें अपच हो सकती है. जितनी भूख हो हमें उतना ही खाना चहिये. कई बार लोग स्वाद के चक्कर में अधिक खाना खा लेते है और बाद में उन्हें पछताना पड़ता है. आप ऐसा न करे. खाने से ज्यादा प्राथमिकता अपने शरीर को दे. अधिक खाना लेने से हमारे पाचन तन्त्र पर अधिक दबाव पड़ता है जो की उचित नहीं है. ऐसा करने से इसलिए बचे. 12. हमेशा बैठे – बैठे काम न करे- अगर आपका काम ऑफिस का है, आपको कंप्यूटर के आगे या कुर्सी पर बैठकर काम करना पड़ता है तो आप बीच – बीच में ब्रेक लेते रहे. अगर आपको लगातार काम करना होता है तो हर दो घंटे में कुछ मिनट निकाल कर थोड़ा टहल ले. बैठे रहने से हमारा भोजन पच नहीं पाता फलस्वरूप हमारे पाचन तन्त्र के लिए इसे  हैंडल कर पाना मुश्किल हो जाता है. 13. ऑयली खाने से परहेज करे– ज्यो हमारी उम्र बढती जाती है.. हमारे लिए ऑयली खाने को पचा पाना मुश्किल होने लग जाता है. अगर हम Oily  खाना ज्यादा खा लेते है तो इससे हमें उल्टी, अपच और खट्टी डकारे हो सकती है. इनसे बचने के लिए जरुरी है कि इन चीजो को बहुत ही कम मात्रा में खायें. ऑयली खाना पचा पाना थोड़ा मुश्किल रहता है. इसलिए अपने पाचन तंत्र की मदद करे और तैलीय खाना कम ही खाएं. 14. वसायुक्त भोजन लेने से बचे- उन चीजो को लेने से बचे जिनमे बहुत ज्यादा Fat होता है. वसा युक्त पदार्थ हमारे पाचन क्रिया को Slow कर देता है. अगर पाचन तंत्र स्लो रहेगा तो भोजन पचने में भी समय लगेगा. जितना हो सके बेहतर पाचन तन्त्र के लिए वसायुक्त भोजन कम ही ले. *15. रोजाना व्यायाम करे* – व्यायाम करना हमारी body के लिए बहुत लाभदायक होता है. रोजाना Exercise को अपनी दिनचर्या में शामिल करे. डेली एक्सरसाइज करने से हमें खाना बेहतर रूप से पचता है. इसके अलावा यह हमारे वजन का सही स्तर बनाये रखता है जो हमारे digestive health के लिए अच्छा है. इसलिए रोजाना एक्सरसाइज करे और एक अच्छी सेहत बनाये. पाचन शक्ति बढ़ाने के लिए इन चीजो का सेवन इलायची का सेवन- इलायची का सेवन एक गर्भवती महिला के लिए बहुत लाभकारी होता है. यह गर्भवती स्त्री के पाचन सम्बन्धी परेशानियों को दूर करता है. आप इलायची को चाय के साथ के सकते है निम्बू ले– नींबू हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभकारी होता है. इसका सेवन करते रहने से यह हमारे पेट की कई समस्याएँ दूर कर देता है. नींबू हमारी बदहजमी और पेट की गैस को दूर करता है. यह हमारे पाचन शक्ति के लिए भी लाभकारी होता है. सलाद का सेवन करे- खाने में अगर सलाद हो तो खाने का मजा दोगुना बढ़ जाता है. सलाद अच्छे खाने के साथ – साथ हमारे हेल्थ के लिए भी अच्छा है. खाने को अगर अच्छी तरह पचाना है तो खाने के साथ सलाद भी ले. जिसमे आप नींबू, टमाटर और प्याज ले सकते है. अमरुद खाएं- अमरुद एक बहुत ही उपयोगी फल है जो पौष्टिक होता है. अमरुद में विटामिन सी, फास्फोरस और पौटेशियम पाया जाता है जो स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है. अमरुद के सेवन करते रहने से मस्तिष्क, ह्रदय और पाचन शक्ति मजबूत बनती है. सौंफ का प्रयोग करे एसिडिटी को दूर करने के लिए, सीने की जलन कम करने के लिए और खाना अच्छी तरह पचाने के लिए आप सौफ ले सकते है. रोजाना एक एक चम्मच सौंफ लेने से पाचन क्रिया सही बनी रहती है. एलोवेरा ले- पाचन क्रिया को मजबूत बनाने के लिए एलोवेरा का इस्तेमाल करे. एलोवेरा हमारी पाचन सम्बन्धी रोगों को दूर करता है जिसमे सुजन और पेट का अल्सर शामिल है.पानी के साथ आप एलोवेरा जेल का इस्तेमाल कर सकते हो. हल्दी का प्रयोग करे – हल्दी हमारे शरीर के अपच, अल्सर,पित्त निकालने और पाचन से सम्बन्धित अन्य समस्याओ को दूर करता है. पाचन सम्बन्धी समस्याएँ दूर करने के लिए एक ग्लास पानी के साथ हल्दी लेते रहे. आंवले लेते रहे– आंवला हमारे शरीर में विटामिन सी की कमी को दूर करता है. आवले का लगातार सेवन करते रहने से यह हमारे पाचन तन्त्र को ख़राब होने से बचाता है. आंवले को पिस करके उसमे काली मिर्च, हींग और जीरा मिला कर भी आप ले सकते है. पपीता का सेवन- कच्चा पपीता सेहत के लिए बहुत अच्छा है. आंत की कमजोरी के कारण शरीर में विटामिन्स का संचय नहीं होता है तो हम पपीते के सेवन से विटामिन सी प्राप्त कर सकते हैं. इसमें पपाइन होता है जो कि प्रोटीन को विभाजित करता है और खाने को पाचन योग्य बनाता है और पाचन क्रिया को प्रबल बनाता हैं. केला खाएं – केला हर मौसम और हर सीजन में मिल जाता है. यह हमारे पेट के लिए बहुत better है. सस्ता होने के साथ – साथ यह हमारे पाचन शक्ति को भी बढाता है. इसलिए केला खाएं और अपनी सेहत बनाये. इसके अलावा भी आप अपने भोजन में मूंग, अंकुरित चना, गेहूं और जौ की रोटियां शामिल करे और इन फलों को आम, अनार, अंजीर, अमरूद और संतरे को लेते रहे. ये फल आपके पेट को साफ़ रखेंगे जिससे आपका पाचन तन्त्र मजबूत बनेगा. पाचन शक्ति को दुरुस्त करने के अन्य घरेलू नुस्खे– अपने भोजन को हमेशा चबा – चबा कर खाएं जिससे भोजन अच्छी तरह पचे. दही का सेवन हमारे पाचन के लिए अच्छा होता है. खाने में दही शामिल करे. मीठे अनार का रस मुँह में लेने से आंत दोष ठीक होता है और पाचन शक्ति बढती है. अजवाइन को पानी में उबाल कर पीने से भी पाचन तंत्र सही रहता है. रोजाना 3 ग्राम काली राई लेने से कब्ज वाली बदहजमी दूर हो जाती है. अनन्नास का रस हमारे पाचन के लिए लाभदायी होता है. अमरूद के पत्तों में शक्कर मिलाकर सेवन करने से बदहजमी दूर हो जाती है. हरड़ का मुरब्बा भी हमारे पाचन के लिए अच्छा होता है. नींबू पर काला नमक लगाकर चाटते रहे इससे बदहजमी दूर हो जाएगी. हींग का उपयोग करे.. इसका प्रयोग बदहजमी और गैस को दूर करने के लिए किया जाता है. लेख पढ़ने के बाद इसके लिंक को अपने व्हाट्सअप ग्रुप में जरूर शेयर करे। अरुण मिश्रा

🌻हींग के प्रयोग 🌻

🕉दांतों में कीड़ा लग जाने पर रात्रि को दांत में हींग दबाकर सोएं। कीड़े खुद-ब-खुद निकल जाएंगे। 🕉यदि शरीर के किसी हिस्से में कांटा चुभ गया हो तो उस स्थान पर हींग का घोल भर दें। कुछ समय में कांटा स्वतः निकल आएगा। 🕉हींग में रोग-प्रतिरोधक क्षमता होती है। दाद, खाज, खुजली व अन्य चर्म रोगों में इसको पानी में घिसकर उन स्थानों पर लगाने से लाभ होता है। 🕉 हींग का लेप बवासीर, तिल्ली व उदरशोथ में लाभप्रद है। 🕉कब्जियत की शिकायत होने पर हींग के चूर्ण में थोड़ा सा मीठा सोड़ा मिलाकर रात्रि को फांक लें, सबेरे शौच साफ होगा। 🕉पेट के दर्द, अफारे, ऐंठन आदि में अजवाइन और नमक के साथ हींग का सेवन करें तो लाभ होगा। 🕉 पेट में कीड़े हो जाने पर हींग को पानी में घोलकर एनिमा लेने से पेट के कीड़े शीघ्र निकल आते हैं। 🕉जख्म यदि कुछ समय तक खुला रहे तो उसमें छोटे-छोटे रोगाणु पनप जाते हैं। जख्म पर हींग का चूर्ण डालने से रोगाणु नष्ट हो जाते हैं। 🕉प्रतिदिन के भोजन में दाल, कढ़ी व कुछ सब्जियों में हींग का उपयोग करने से भोजन को पचाने में सहायक होती है। 🕉 ये सभी फायदे असली हींग से मिलते हैं, सामान्य तौर पर प्रयोग की जाने वाली बँधानी हींग केवल नाम के लिए हींग होती है, उसमे कोई गुण नही होता। अरुण मिश्र

उबलतें दूध में जब डाली जाती हैं तुलसी की पत्तियाँ तो होता है चमत्कार - Tulsi with Milk

🌿 घरेलू नुस्खे बिना किसी साइड इफेक्ट के कई बीमारियों को दूर करते हैं। पीढि़यों से चले आ रहे ये नुस्खे हमेशा से फायदेमंद साबित हुए है और शायद आगे भी होते रहेंगे। ऐसे ही कुछ टिप्स तुलसी को लेकर भी है। तुलसी एक ऐसा हर्ब है जो कई समस्याओं को आसानी से दूर कर सकती है। सर्दी जुकाम हो या सिरदर्द तुलसी का काढ़ा बनाकर पीने से लाभ मिलता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि तुलसी को अगर दूध के साथ मिला लिया जाये तो ये कई बीमारियों के लिए रामबाण साबित होती है। आज हम आपको बता रहे हैं कैसे तुलसी की तीन से चार पत्तियां उबलते हुए दूध में डालकर खाली पेट पीने से आप सेहतमंद रह सकते हैं। किडनी की पथरी में यदि किडनी में पथरी की समस्या हो गई हो और पहले दौर में आपको इसका पता चलता है तो तुलसी वाला दूध का सेवन सुबह खाली पेट करना शुरू कर दें। इस उपाय से कुछ ही दिनों में किडनी की पथरी गलकर निकल जाएगी। आपको इस समस्या से छुटकारा मिल जाएगा। दिल की बीमारी में यदि घर में किसी को दिल से सबंधित कोई बीमारी है या हार्ट अटैक पड़ा हो तो आप तुलसी वाला दूध रोगी को सुबह के समय खाली पेट पिलाएं। इससे दिल से संबंधित कई रोग ठीक होते हैं। सांस की तकलीफ में सांस की सबसे खतरनाक समस्या है दमा। इस रोग में इंसान को सांस लेने में बड़ी परेशानी आती है। खासतौर पर तब जब मौसम में बदलाव आता है। इस समस्या से बचने के लिए जरूरी है कि आप दूध और तुलसी का सेवन करें। नियमित इस उपाय को करने से सांस से संबंधित अन्य रोग भी ठीक हो जाएगें। कैंसर की समस्या एंटीबायोटिक गुणों की वजह से तुलसी कैंसर से लड़ने में सक्षम होती है। दूध में भी कई तरह के गुण होते हैं जब दोनों आपस में मिलते हैं तो इसका प्रभाव बेहद प्रभावशाली और रोग नाशक हो जाता है। यदि आप नियमित तुलसी वाला दूध पीते हैं तो कैंसर जैसी बीमारी शरीर को छू भी नहीं सकती है। फ्लू वायरल फ्लू होने से शरीर कमजोर हो जाता है। यदि आप दूध में तुलसी मिलाकर सुबह खाली पेट इसका सेवन करते हो ता आपको फ्लू से जल्दी से आराम मिल जाएगा। टेंशन में अधिक काम करने से या ज्यादा जिम्मेदारियों से अक्सर हम लोग टेंशन में आ जाते हैं एैसे में हमारा नर्वस सिस्टम काम नहीं कर पाता है और हम सही गलत का नहीं सोचते हैं। यदि इस तरह की समस्या से आप परेशान हैं तो दूध व तुलसी वाला नुस्खा जरूर अपनाएं। आपको फर्क दिखने लगेगा। सिर का दर्द और माइग्रेन में सिर में दर्द होना आम बात है। लेकिन जब यह माइग्रेन का रूप ले लेती है तब सिर का दर्द भयंकर हो जाता है। ऐसे में सुबह के समय तुलसी के पत्तों को दूध में डालकर पीना चाहिए। यह माइग्रेन और सिर के सामान्य दर्द को भी ठीक कर देती है। अक्सर हमारे घर में बहुत सी प्राकृतिक औषधियां होती है जिनके बारे में पता रहने से हम मंहगी दवाओं से होने वाले साइड इफेक्ट से बच सकते हैं। यह मैसेज अगर आपको अच्छा लगे या समझ में आये की यह किसी के लिया रामबाण की तरह काम आएगा तो आप से ?निवेदन है कि इस मैसेज के लिंक को अपने परिचित /मित्र/ या आपके व्हाट्स एप्प ग्रुप फ्रेंड्स तक भेज दे । आपका यह कदम स्वस्थ भारत के निर्माण में योगदान के रूप में होगा प्रार्थना मैं बड़ी ताकत स्वस्थ रहो मस्त रहो व्यस्त रहो और सदा खुश रहो नोट :-अगर आपको प्रतिदिन हेल्थ पोस्ट हमारे द्वारा भेजी जाती है और आपको हमारी पोस्ट अच्छी लगती है तो प्लीज आप अपने किसी ग्रुप मे फोरवरड करे ताकि आपके साथ लोगो को भी फायदा पहुच सके। अरुण मिश्रा

कलाकार जामुन के कुछ अलग गुण

बरसात में जामुन खाने से होता है इन सारी बीमारियों का इलाज सामान्यत: बरसात के मौसम में आने वाला फल जामुन सेहत के लिए बहुत लाभदायक होता है। जामुन अम्लीय प्रवृति वाला होता है यही कारण है कि जामुन को नमक के साथ खाया जाता है। जामुन में ग्लूकोज और फ्रक्टोज पाया जाता है।जामुन में आयरन, विटामिन और फाइबर भी पाया जाता है इसमें खनिजों की मात्रा अधिक होती है। इसके बीज में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और कैल्शियम पाया जाता है। जामुन के इन्हीं गुणों के कारण हम आपको बताने जा रहे हैं जामुन से जुड़े कुछ खास नुस्खे जो रोगों में रामबाण की तरह काम करते हैं। गठिया के उपचार में भी जामुन बहुत उपयोगी है। इसकी छाल को खूब उबालकर बचे हुए घोल का लेप घुटनों पर लगाने से गठिया में आराम मिलता है। गले के रोगों में जामुन की छाल को बारीक पीसकर सत बना लें। इस सत को पानी में घोलकर 'माउथ वॉश' की तरह गरारा करना चाहिए। इससे गला तो साफ होगा ही, साँस की दुर्गंध भी बंद हो जाएगी और मसूढ़ों की बीमारी भी दूर हो जाएगी। जामुन का गूदा पानी में घोलकर या शरबत बनाकर पीने से उल्टी, दस्त, जी-मिचलाना, खूनी दस्त और खूनी बावासीर में लाभ होता है। है। जामुन की गुठली के चूर्ण 1-2 ग्राम पानी के साथ सुबह लेने से मधुमेह रोग ठीक हो जाता है।

Tuesday, July 10, 2018

जो अकेले रहते हैं,उनकी सेहत के लिए।

जो अकेले रहते हैं,उनकी सेहत के लिए। अपने साथ भुने चने भुनी मूंगफली चावल के मुरमुरे मक्की के पीले परमल रखें। जब भूख लगे,खाएं। सुबह या कभी भी जब मन करे,दूध की जगह Amul या पतंजलि के मिल्क पौडर की 3-4 चम्मच ऐसे ही खा लिया करें। छाछ हर जगह मिलती है,आधा लीटर दिन में एक बार कभी भी पानी की जगह ले लिया करें,केल्शियम की पूर्ति होगी,एसिडिटी नहीं होगी। जब मन या समय हो मौसम के 2 सस्ते फल रोज बदल बदल कर खाएं,छुरी अपने साथ रखें। जलजीरा के 2 पाउच हमेशा अपने साथ रखें,दिन में कभी भी पानी में घोलें और पियें। नाश्ते में कभी कुछ न हो तो 4 पिस्ता 4 बादाम 2 अखरोट 8 किशमिश बहुत धीरे धीरे चबा कर खा लिया करें। घर में सूखा नारियल और गुड़ हमेशा रखें,जब मन हो या कुछ खाने की इच्छा हो,नारियल के टुकड़े के साथ थोड़ा गुड़ खा लें। बिस्कुट,नमकीन,कचौड़ी, समोसे से बचें। साथियों की परवाह न कर जब भी खाना खाएं,उसके साथ टमाटर प्याज धनिया हरा लहसुन हरी मिर्च जो मिले और अच्छा लगे,सलाद के तौर पर खाएं। मुरब्बे वाला एक आंवला रोज, नीबू किसी भी रूप में एक रोज रात को सोते समय एक चम्मच त्रिफला रोज व सुबह व रात को पतंजलि का मंजन करने का नियम बना लें। नहाने के बाद सिर में नाक में नाभि में सरसों का तेल लगाएं। रोज एक घण्टा अच्छा साहित्य पढ़ें। मन्दिर जाएं। सुबह,शाम घूमने जाएं। सुबह घर में भजन या जो संगीत अच्छा लगे बजाएं। सम्भव हो तो बदल बदल कर दूध दलिया दाल दलिया सब्जी दलिया स्वयं बनाकर खाएं। कुकर स्टील का ही लें। RO का पानी,कोई भी कोल्ड ड्रिंक, आइसक्रीम बिल्कुल न लें। 30 दिन में आपको स्वयं में परिवर्तन लगेगा।

रैन बसेरा

राजा परीक्षित को भागवत् सुनाते हुए जब शुकदेव को छः दिन बीत गये और सर्प के काटने से मृत्यु होने का एक दिन रह गया तब भी राजा का शोक और मृत्यु भय दूर न हुआ। कातर भाव से अपने मरने की घड़ी निकट आती देखकर राजा क्षुब्ध हो रहा था। शुकदेव जी ने राजा को एक कथा सुनाई - राजन् बहुत समय पहले की बात है। एक राजा किसी जंगल में शिकार खेलने गया। संयोगवश वह रास्ता भूलकर बड़े घने जंगल में जा निकला, रात्रि हो गई। वर्षा पड़ने लगी। सिंह व्याघ्र बोलने लगे। राजा बहुत डरा और किसी प्रकार रात्रि बिताने के लिए विश्राम का स्थान ढूँढ़ने लगा। कुछ दूर पर उसे दीपक दिखाई दिया। वहाँ पहुँचकर उसने एक गन्दे बीमार बहेलिये की झोंपड़ी में ही एक ओर उसने मल-मूत्र त्यागने का स्थान बना रखा था। अपने खाने के लिये जानवरों का माँस उसने झोंपड़ी की छत पर लटका रखा था। बड़ी गन्दी, छोटी, अन्धेर और दुर्गन्ध युक्त वह कोठरी थी। उसे देखकर राजा पहले तो ठिठके पर पीछे उसने और कोई आश्रय न देखकर विवशता वश उस बहेलिये से अपनी कोठरी में रात भर ठहर जाने देने के लिए प्रार्थना की। बहेलिये ने कहा- आश्रय हेतु कुछ राहगीर कभी-कभी यहाँ आ भटकते हैं और मैं उन्हें ठहरा लेता हूँ। लेकिन दूसरे दिन जाते समय वे बहुत झंझट करते हैं। इस झोंपड़ी की गन्ध उन्हें ऐसी भा जाती है कि फिर उसे छोड़ना ही नहीं चाहते। इसी में रहने की कोशिश करते हैं और अपना कब्जा जमाते हैं। ऐसे झंझट में मैं कई बार पड़ चुका हूँ। अब किसी को नहीं ठहरने देता। आपको भी इसमें नहीं ठहरने दूँगा।” राजा ने प्रतिज्ञा की, कसम खाई कि वह दूसरे दिन इस झोंपड़ी को अवश्य खाली कर देगा। उसका काम तो बहुत बड़ा है। यहाँ तो वह संयोगवश ही आया है। सिर्फ एक रात ही काटनी है। बहेलिये न अन्यमनस्क होकर राजा को झोंपड़ी के कोने में ठहर जाने दिया, पर दूसरे दिन प्रातःकाल ही बिना झंझट किये झोंपड़ी खाली कर देने की शर्त की फिर दुहरा दिया। राजा एक कोने में पड़ा रहा। रात भर सोया। सोने में झोंपड़ी की दुर्गन्ध उसके मस्तिष्क में ऐसी बस गई कि सवेरे उठा तो उसे वही सब परमप्रिय लगने लगा। राज-काज की बात भूल गया और वहीं निवास करने की बात सोचने लगा। प्रातःकाल जब राजा और ठहरने के लिये आग्रह करने लगा तो बहेलिये ने लाल पीली आँखें निकाली और झंझट शुरू हो गया। झंझट बढ़ा। उपद्रव और कलह का रूप धारण कर लिया। राजा मरने मारने पर उतारू हो गया। उसे छोड़ने में भारी कष्ट और शोक अनुभव करने लगा। शुकदेव जी ने पूछा - परीक्षित बताओ, उस राजा के लिए क्या यह झंझट उचित था ? परीक्षित ने कहा - भगवान वह कौन राजा था, उसका नाम तो बताइए। वह तो बड़ा मूर्ख मालूम पड़ता है कि ऐसी गन्दी कोठरी में अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर राज-काज छोड़कर, नियत अवधि से भी अधिक रहना चाहता था। उसकी मूर्खता पर तो मुझे भी क्रोध आता है। शुकदेव जी ने कहा - परीक्षित वह और कोई नहीं तुम स्वयं हो। इस मल मूत्र की कोठरी देह में जितने समय तुम्हारी आत्मा को रहना आवश्यक था वह अवधि पूरी हो गई। अब उस लोक को जाना है जहाँ से आप आये थे। इस पर भी आप झंझट फैला रहे हैं। मरना नहीं चाहते एवं मरने का शोक कर रहे हो। क्या यह उचित है ? राजा ने कथा के मर्म को स्वयं पर आरोपित किया एवं मृत्यु भय को भुलाते हुए मानसिक रूप से निर्वाण की अपनी तैयारी कर ली। अंतिम दिन का कथा श्रवण उन्होंने पूरे मन से किया। वस्तुतः मरने के लिये हर मानव हो हर घड़ी तैयार रहना चाहिये। यह शरीर तो कभी न कभी विनष्ट होना ही है। लेकिन आत्मा कभी नहीं मरती। उसी को ऊँचा उठाने के प्रयास जीवन पर्यन्त किये जाते रहें तो भागी जन्म सार्थक किया जा सकता है।

मोहे गिरधर गोपाल : जन्माष्टमी विशेष

अदभुत देवेन्द्र सिकरवार का लेख अदभुत! ***************************************** #मो_मन_गिरिधर_छवि_पे_अटक्यो भारत अपने अधोपतन के कालखंड स...