Saturday, August 25, 2018

रक्षाबंधन विशेष : बहन से वादा

सुबह बहन जल्दी उठती है और घर के सारे कामों को खत्म कर अपने भैया को जगाती है बहन - भैया उठो ना,जल्दी से उठो ना, आज आज रक्षाबन्धन है । आप जल्दी से तैयार हो जाओ, मै सबसे पहले आपको राखी बांधुगी । भाई - ठीक है । भाई तैयार हो जाता है और बहन पूजा की थाली, मिठाई और राखी लेकर आती है बहन - भैया अपना दाहिना हाथ आगे बढाओ । भाई अपना हाथ आगे करके राखी बंधवा लेता है और जेब से निकालकर उसको एक खूबसूरत घड़ी देता है । ( जो उसने बहन के लिए एक दिन पहले ही खरीदी थी ) लेकिन बहन मना कर देती है फिर भाई अपने पर्स से कुछ पैसे निकाल कर देता है लेकिन बहन फिर वापस कर देती है तब भाई पुछता है कि बताओ तुम्हे क्या चाहिए ? बहन - जो मागुंगी वो दोगे ? भाई - हां दुंगा । बहन - पहले मुझसे वादा करो ? भाई - हां मैं पक्का वादा करता हूँ कि जो तू मांगेंगी वो मैं दुंगा । अब बोल तुझे क्या चाहिए ? बहन - भैया आज रक्षाबन्धन के दिन आप मुझसे ये वादा करो कि आप आज से मां की बहन की गालियां नहीं दोगे । इतना कहकर उसकी आंखों में आसूं आ जाते हैं । (बहन रोते हुए ) भैया हम लोगों ने आप लोगों का क्या बिगाड़ रखा है जो हमेशा मां की बहन की गालियां देते हो हमें सरेआम बदनाम करते हो । बोलो भैया बोलो भाई - ( सिर नीचे किये हुए चुप है) बहन - आज रक्षाबंधन पर आप मुझसे वादा करते हो कि नहीं ? भाई - ( आत्मग्लानि से रोते हुए ) हां बहन मैं आज तुमसे ये वादा करता हूं कि मैं जीवन में कभी मां की बहन की गाली नहीं दुंगा और ना ही किसी को देने दुंगा । फिर अपने आप को सम्हाल कर बहन को भी चुप कराता है । और कहता है कि...... मिठाई देखकर मुंह में पानी आ रहा है चल अब जल्दी से मिठाई खिला बहन थोड़ा हंसने लगती है उसकी आंखों में अभी भी आंसू थे लेकिन ये आंसू खुशी के थे, भाई पर आत्मविश्वास के थे ।

Thursday, August 23, 2018

काठगोदाम नाम क्यो

"काठगोदाम" _________________________________________________________________ यह काठगोदाम का रेलवे स्टेशन है। किंतु मैं तो कभी काठगोदाम गया नहीं। जैसे कि मैं कभी लैंसडोन ही कहां गया। किंतु लैंसडोन को जैसे सोचता रहता हूं, उसके कठगुलाबों को मन में संजोये रहता हूं, वैसे ही काठगोदाम को भी सोचता रहा हूं। इसलिए सोच के अहाते में काठगोदाम की एक जगह बन गई है। कुमाऊं के कोनों-अंतरों तक इसके बाद सड़क जाती है। रेल लाइन काठगोदाम आकर चुक जाती है। वो रेल, जो सन् 1884 में सबसे पहले यहां पहुँची थी, कूक का कहरवा गाते! धूप से भरा यह दृश्य! पहाड़ों की कोमल पीली धूप। जिसे श्रीनरेश मेहता "पीताम्बरा" कहते, आकाश में देववस्त्रों सी अकलंक बताते। और फिर "धूप-कृष्णा" कहकर एक वरेण्य संज्ञा से अभिहित कर देते। इसका नाम भले "काठगोदाम" हो, मैं तो इसे "धूप-शहर" कहकर ही बुलाऊंगा। धरा पर धूप का धाम! किंतु यह धूप-शहर तो है नहीं, काठगोदाम है, इसलिए फ़िलवक़्त तो यही पूछा जाए कि यह काठगोदाम ही क्यों है। काठ का गोदाम यानी "टिम्बर डिपो"। यहां पर सच में ही बड़ा-सा टिम्बर डिपो एक ज़माने में हुआ करता था। टिम्बर किंग ऑफ़ इंडिया कहलाने वाले दान सिंह के चौहान पट्‌टे में पड़ने वाला इलाक़ा। फ़िरंगियों के दफ़्तरों में आज भी इसका नाम "चौहान पट्‌टा" ही मिलता है, किंतु वक़्त के साथ यह काठगोदाम हो गया, जो निहायत ही ख़ूबसूरत नाम है। यों तो पहाड़ों के समस्त इलाक़े ही काठगोदाम हैं, किंतु वृक्षों के जीवित काष्ठ वाले। टिम्बर डिपो वाला जो काठगोदाम होता है, वहाँ वृक्षों के शव होते हैं, जिन्हें क़तार में उसी तरह सजाया जाता है, जैसे मनुष्यों के शव हस्पतालों के अहातों में क़तार से सजाए जाते हैं। काफ़्का होता तो काठ के वैसे ही किसी गोदाम को देखकर कहता- "पेड़ के इन लट्ठों को एक-एक कर लुढ़का दूं तो?" फिर आगे कहता- "जो दरख़्त धरती में जड़ें जमाए मालूम होते हैं, कहीं वह भी वहम तो नहीं? एक धक्के से कहीं वे भी तो लुढ़कने नहीं लगेंगे?" लेकिन मुझे यह नाम रुच गया है- "काठगोदाम"। कवि अज्ञेय ने कहा था- "ताज़ा चिरी लकड़ी की गंध जिसमें हो, वैसी भाषा मुझको चाहिए।" वैसी भाषा का तो मालूम नहीं, किंतु इस शब्द से मुझे वैसी ही गंध आती है- "काठगोदाम"। काठ की गंध से भरी नामसंज्ञा। इधर के शहरों-क़स्बों के नाम ऐसे ही हैं। किसी के नाम में ताल जुड़ा है- नैनीताल, भीमताल, नौकुछियाताल। किसी के नाम में खेत जुड़ा है- रानीखेत। किसी के नाम में डेरा जुड़ा है- देहरादून। किसी के नाम में वन जुड़ा है- हल्द्वानी। हल्द्वानी यानी हल्दू का वन! इधर लालकुंआ-हल्द्वानी मार्ग पर हल्दू का एक बड़ा-सा दरख़्त हुआ करता था, जिसके नाम पर ही उस इलाक़े को मोटाहल्दू कहा जाने लगा था। रामपुर-काठगोदाम सड़क के काम में जब उसे काट दिया गया तो वहां के लोगों को लगा, जैसे उनके परिवार के किसी सदस्य की हत्या कर दी गई हो। तब धूप के उस देश में शोक का अंधेरा व्याप गया! मैंने हल्दू का पेड़ कभी देखा नहीं है, केवल हल्द्वानी का नाम सुना है। मैंने काठगोदाम भी देखा नहीं है, केवल काठ की गंध का अनुभव किया है। मैंने पहाड़ की धूप तक नहीं देखी! लेकिन जितने लोग पहाड़ों से लौटकर पठारों पर आए, उनमें से किसी ने भी किसी पहाड़ी क़स्बे को कभी "धूप-शहर" कहकर नहीं पुकारा। मैंने पुकारा! जब तक लैंसडोन, नैनीताल और हल्द्वानी में यों ही नहीं चला जाता, जैसे बारिश होती है, जैसे रात घिरती है, तब तक मैं संतोष की इस कनी को ही अपने कमीज़ की जेब में सम्हाले रक्खूंगा कि धूप से धुले काठगोदाम टेसन को निमिष भर निहारा! सुशोभित की कलम से

Wednesday, August 22, 2018

अटल मोदी व महाभारत

महाभारत काल के दौरान आप देखिए कि कौरवों को सिर्फ युधिष्टिर सबसे अच्छे लगते थे...! जानते हैं क्यों...??? क्योंकि वो धर्मराज थे, हर कार्य को धर्म की कसौटी से ही देखा करते थे, सीधे थे, सरल थे, और कई बार धर्म का हवाला देकर और धार्मिक मान्यताओं के कारण अन्य पांडवों पर दबाव डालने में भी सफल रहते थे...! कई ऐसे मौके और उदाहरण है, चाहे वनवास के लिए तैयार हो जाना हो, चाहे अज्ञातवास जैसी कठिन शर्त को सहर्ष तैयार हो जाना हो, चाहे पूरे राज्य को छोड़ 5 गांव मांगने का प्रस्ताव हो, चाहे द्रौपदी को जुए में दांव लगाने को तैयार हो जाना हो........युधिष्टिर हमेशा ही सर्व सुलभ होते थे, और अन्य पांडवों की अपेक्षा उन्हें मनाना आसान हुआ करता था, और धर्म के नाम पे तो उन्हें बड़ी आसानी से मिलाया जा सकता था...! अब आइये ये जानते हैं कि कौन से पांडव से कौरव या दुर्योधन सबसे ज्यादा चिढ़ते थे...??? तो इसका उत्तर है अर्जुन और भीम...! भीम से तो दुर्योधन का पुराना वैमनस्य था ही, दोनों ही गदा धारी थे और लगभग समान बलशाली भी थे, भीम थोड़े से आक्रामक भी थे, युधिष्टिर के लिहाज की वजह से वो मन मसोस कर रह जाते थे, अन्यथा तो वो अकेले ही सभी कौरवों को मारने में समर्थ थे.....और महाभारत के रण में ये काम उन्होंने किया भी था...! अर्जुन हमेशा से ही कौरवों की आंखों में इसलिए खटकते रहे थे, क्योंकि वो गुरु द्रोणाचार्य के प्रिय भी थे और उन जैसा धनुर्धारी कोई था ही नही.........ऊपर से अर्जुन का सबसे बड़ा शत्रु कर्ण था, जो दुर्योधन का सबसे बड़ा मित्र था, लेकिन अर्जुन भी धर्मराज युधिष्टिर द्वारा बनाई गई मर्यादाओं में बंधे थे...! लेकिन फर्क तब पड़ा जब पांडवों को श्रीकृष्ण का साथ मिला, कृष्ण ने ही अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया, धर्म और अधर्म का फर्क समझाया, उन्होंने ही ये समझाया कि धर्म की विजय के लिए जो तरीका अपनाना पड़े, अपनाना चाहिए...! इसी वजह से अर्जुन को कई विजय प्राप्त हुई, इसी वजह से अर्जुन भीष्म पितामह पर विजय प्राप्त कर पाए, फिर जयद्रथ का संहार हो, या कर्ण का वध हो, ये सब कुछ तभी संभव था जबतक श्री कृष्ण अपनी लीला ना दिखाते और अर्जुन को धर्म-अधर्म के मायाजाल से ना निकालते...! कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि कौरव युधिष्ठिर को इसलिए मानते थे, क्योंकि वो एक आसान से शिकार थे उनके लिए, उन्हें मनाना आसान था........वहीं ये लोग अर्जुन और भीम से इसलिए चिढ़ा करते थे, क्योंकि ये उन्ही के तौर तरीकों को इस्तेमाल करने में विश्वास किया करते थे...! धर्म से धर्म और अधर्म से अधर्म को काटने की कला इन दोनों में ही थी, जिसमे श्री कृष्ण का भी योगदान था...! अब जैसा कि आप लोगों ने भी देखा होगा कि जब से अटल जी देहावसान हुआ है तभी से अलग अलग चैनलो पर बहस, सोशल मीडिया पर अनगिनत पोस्ट, नाना प्रकार के तर्क कुतर्क किये जा रहे हैं...! यदि विरोधियों के इन सब प्रपंच का सारांश निकालें तो यह बात निकलती है कि वाजपेयी जी एक अजातशत्रु थे...! सभी पक्ष और विपक्ष के लोग उनका सम्मान करते थे...! वे एक सर्वमान्य नेता थे जो सेक्युलर और लिबरल ढांचे में फिट होते थे...! और इन्ही बातों के सहारे मोदीजी की सरकार और उनके अन्य नेताओं पर टीका टिप्पणी भी की गयी...! सब मिलाकर कोई कोर कसर और मौका नही छोड़ा गया मोदीजी और उनकी सरकार को नीचा दिखाने का, जबकि चाहे मोदी जी हों, चाहे शाह हों, आडवाणी जी हों, राजनाथ सिंह जी हों या स्वयं वाजपेयी जी हों......इन सभी की विचारधारा एक ही रही है, हां समय और काल का फर्क इनके कार्यो पर जरूर दिख जाता है......और ये ठीक ही है...! लेकिन इनकी चिढ़ का कारण क्या है मेरे समझ मे यही नहीं आ रहा है......वाजपेयी जी कर्म योगी थे, लेकिन वो राजनीत को एक धर्म मान कर चलते थे, इसमे उनकी कोई गलती नही थी, वो शायद गलत विपक्ष के बीच मे अवतरित हुए थे, उनके हर धर्म का जवाब विपक्ष ने अधर्म से दिया था...! जोड़ तोड़ की सरकार को चिमटे तक से ना छूने वाले वाजपेयी जी को सत्ता का लालची बता कर, सारे अनैतिक रास्ते अपना कर कभी 13 दिन में कभी 13 महीने में, एक एक वोट से सरकार गिरा भारत को अनिश्चितता के दौर में धकेलने का दुष्कर्म इस अनैतिक विपक्ष ने ही किया था...! सब कुछ सही हो कर भी, जनमत संदेश पा कर भी सत्ता से अपदस्थ किये जाने के बाद के वाजपेयी जी के बयानों को सुनिए.....उन्हें सत्ता का लालच तो नही था, लेकिन इस राजनीति द्युत के खेल में उन्हें हर बार विपक्ष के शकुनि छलते थे, और वे कातर दृष्टि से देखने के अलावा कुछ नही कर पाते थे...! संसद में मजाक उड़ाया जाता था, कहा जाता था कि ये तो गायों के तबेले की पार्टी है........इन्हें जानता ही कौन है......हरियाणा से ऊपर और गुजरात से नीचे इन्हें पहचानता ही कौन है...? 2004 में हार के जो कारण रहे हो, लेकिन उससे आज की राजनीति के धर्मराज को ऐसा झटका लगा था कि कुछ सालों में वे सार्वजनिक जीवन से सन्यास ही ले बैठे, बोलना तक बिसार दिया...! लेकिन ये विपक्षी शायद ये भूल गए थे कि कहीं भीम और अर्जुन तो पल रहे थे, बड़े हो रहे थे...! 10 साल के शासन के पश्चात 2014 में बाजी फिर से पलटती है, एक ऐसा नेता चुन कर आता है जिसे पिछले 12 सालो से हर दिन हर क्षण एक नई कसौटी पे परखा गया हो। जिसे जहां मौका लगा हो विपक्ष ने बेइज्जत करने का कोई मौका ना छोड़ा हो...! और पहले ही दिन से विपक्षी खेमे में कोलाहल मच जाता है, उस इंसान से इतना डर कि हर दूसरे दिन कोई नया शिगूफा पैदा किया जाता है, ताकि उसकी बढ़ती मान्यता को कम किया जा सके...! अरे ये तो चाय बेचने वाला है, अरे इसको गुजरात से बाहर जानता ही कौन है, अरे ये तो नीच है, मौत का सौदागर है, हिटलर है, फ़ासिस्ट है और ना जाने क्या क्या...! लेकिन वो बदले में क्या करता है.........वो आपकी ही तरकीबो को इस्तेमाल करता है......वो भी साम दाम दण्ड भेद सब कुछ इस्तेमाल करता है और एक के बाद एक राज्यो से आपके नामो निशान हटाता जाता है.......आपको समझ ही नही आ रहा कि हो क्या रहा है...??? आप चिल्ला रहे हैं, चीख रहे है, तड़प रहे हैं, तिलमिला रहे है.......आप चाह रहे हैं कि कैसे इसका चक्रव्यूह तोड़ें......कैसे इससे बचें......कैसे अपने बचे हुए आधार को बचाए रखें...??? जब आपको मौके नही मिलते तो आप बनाने लगते हैं...........असहिंष्णुता का स्वांग रचते हैं.......फिर दलित हिंसा पर छाती पीटते हैं.....कभी अल्पसंख्यकों की याद आती है......कभी सेना की आड़ लेते हैं.........कभी व्यापारियों को चारा बनाते हैं, लेकिन कुछ नही होता...! फिर आपको ये राजनीति बुरी लगने लगती है.......आपको वाजपेयी जी अच्छे लगने लगते हैं.....क्योंकि वे सौम्य थे.....सरल थे.....ईमानदार थे......आसानी से विश्वास कर लेते थे......आसानी से आपके चंगुल में फंस जाते थे...! लेकिन ये नया योद्धा तो आपको आपकी ही भाषा मे जवाब देने में पारंगत है.....तो वो भला क्यों अच्छा लगेगा...! खैर.....छोड़िये ये तो आदत है आपकी.......पहले मुखर्जी बुरे लगे, उन्हें गिरफ्तार किया और मरवा दिया, फिर आपको वाजपेयी और आडवाणी बुरे लगे.....धीरे धीरे वाजपेयी आपको अच्छे लगने लगे क्योंकि कोसने के लिए आडवाणी थे.....बाकि आपका व्यवहार दोनों के ही किये समान था.....आज मोदी हैं तो आपको वाजपेयी-आडवाणी की विरासत पे प्यार आता है...! ये सब को मालूम है कि आज नहीं तो कल आपको मोदी भी भगवान सरीखे लगने लगेंगे जब वो अपनी राजनीतिक विरासत को अपने उत्तराधिकारी के कांधो पे रखेंगे......क्योंकि वो योद्धा तो आपको सांस भी नही लेने देगा......... क्या करें आप ही से तो सीखे हैं ये राजनीति के दांव पेंच......अब तो अमल में लाने शुरू किए है......आगे आगे देखिए होता है क्या...?

Sunday, August 19, 2018

कैसे मनाए रक्षाबंधन का पर्व

रक्षा बंधन के पर्व की वैदिक विधि -वैदिक रक्षा सूत्र बनाने की विधि : इसके लिए ५ वस्तुओं की आवश्यकता होती है - (१) दूर्वा (घास) (२) अक्षत (चावल) (३) केसर (४) चन्दन (५) सरसों के दाने । इन ५ वस्तुओं को रेशम के कपड़े में लेकर उसे बांध दें या सिलाई कर दें, फिर उसे कलावा में पिरो दें, इस प्रकार वैदिक राखी तैयार हो जाएगी । इन पांच वस्तुओं का महत्त्व - (१) दूर्वा - जिस प्रकार दूर्वा का एक अंकुर बो देने पर तेज़ी से फैलता है और हज़ारों की संख्या में उग जाता है, उसी प्रकार मेरे भाई का वंश और उसमे सदगुणों का विकास तेज़ी से हो । सदाचार, मन की पवित्रता तीव्रता से बदता जाए । दूर्वा गणेश जी को प्रिय है अर्थात हम जिसे राखी बाँध रहे हैं, उनके जीवन में विघ्नों का नाश हो जाए । (२) अक्षत - हमारी गुरुदेव के प्रति श्रद्धा कभी क्षत-विक्षत ना हो सदा अक्षत रहे । (३) केसर - केसर की प्रकृति तेज़ होती है अर्थात हम जिसे राखी बाँध रहे हैं, वह तेजस्वी हो । उनके जीवन में आध्यात्मिकता का तेज, भक्ति का तेज कभी कम ना हो । (४) चन्दन - चन्दन की प्रकृति तेज होती है और यह सुगंध देता है । उसी प्रकार उनके जीवन में शीतलता बनी रहे, कभी मानसिक तनाव ना हो । साथ ही उनके जीवन में परोपकार, सदाचार और संयम की सुगंध फैलती रहे । (५) सरसों के दाने - सरसों की प्रकृति तीक्ष्ण होती है अर्थात इससे यह संकेत मिलता है कि समाज के दुर्गुणों को, कंटकों को समाप्त करने में हम तीक्ष्ण बनें । इस प्रकार इन पांच वस्तुओं से बनी हुई एक राखी को सर्वप्रथम भगवान -चित्र पर अर्पित करें । फिर बहनें अपने भाई को, माता अपने बच्चों को, दादी अपने पोते को शुभ संकल्प करके बांधे । इस प्रकार इन पांच वस्तुओं से बनी हुई वैदिक राखी को शास्त्रोक्त नियमानुसार बांधते हैं हम पुत्र-पौत्र एवं बंधुजनों सहित वर्ष भर सूखी रहते हैं । राखी बाँधते समय बहन यह मंत्र बोले – येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल: | तेन त्वां अभिबन्धामि रक्षे मा चल मा चल || शिष्य गुरु को रक्षासूत्र बाँधते समय – ‘अभिबन्धामि ‘ के स्थान पर ‘रक्षबन्धामि’ कहे | और चाकलेट ना खिलाकर भारतीय मिठाई या गुड से मुहं मीठा कराएँ। अपना देश अपनी सभ्यता अपनी संस्कृति अपनी भाषा अपना गौरव वन्दे मातरम्

Saturday, August 18, 2018

महाभारत में भोजन प्रबंधन : श्रीकृष्ण

महाभारत को हम सही मायने में विश्व का प्रथम विश्वयुद्ध कह सकते हैं क्यूंकि शायद ही कोई ऐसा राज्य था जिसने इस युद्ध में भाग नहीं लिया।
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आर्यावर्त के समस्त राजा या तो कौरव अथवा पांडव के पक्ष में खड़े दिख रहे थे। बलराम और रुक्मी ये दो ही व्यक्ति ऐसे थे जिन्होंने इस युद्ध में भाग नहीं लिया।
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कम से कम हम सभी तो यही जानते हैं। किन्तु एक और राज्य ऐसा था जो युद्ध क्षेत्र में होते हुए भी युद्ध से विरत था। वो था दक्षिण के "उडुपी" का राज्य।
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जब उडुपी के राजा अपनी सेना सहित कुरुक्षेत्र पहुँचे तो कौरव और पांडव दोनों उन्हें अपनी ओर मिलाने का प्रयत्न करने लगे।
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उडुपी के राजा अत्यंत दूरदर्शी थे। उन्होंने कृष्ण से पूछा - "हे माधव ! दोनों ओर से जिसे भी देखो युद्ध के लिए लालायित दिखता है किन्तु क्या किसी ने सोचा है कि दोनों ओर से उपस्थित इतनी विशाल सेना के भोजन का प्रबंध कैसे होगा ?
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इस पर कृष्ण ने कहा - महाराज ! आपने बिलकुल उचित सोचा है। आपके इस बात को छेड़ने पर मुझे प्रतीत होता है कि आपके पास इसकी कोई योजना है। अगर ऐसा है तो कृपया बताएं।
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इसपर उडुपी नरेश ने कहा - "हे वासुदेव ! ये सत्य है। भाइयों के बीच हो रहे इस युद्ध को मैं उचित नहीं मानता इसी कारण इस युद्ध में भाग लेने की इच्छा मुझे नहीं है।
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किन्तु ये युद्ध अब टाला नहीं जा सकता इसी कारण मेरी ये इच्छा है कि मैं अपनी पूरी सेना के साथ यहाँ उपस्थित समस्त सेना के भोजन का प्रबंध करूँ।
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इस पर कृष्ण ने हर्षित होते हुए कहा - "महाराज ! आपका विचार अति उत्तम है। इस युद्ध में लगभग ५०००००० (५० लाख) योद्धा भाग लेंगे और अगर आप जैसे कुशल राजा उनके भोजन के प्रबंधन को देखेगा तो हम उस ओर से निश्चिंत ही रहेंगे।
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वैसे भी मुझे पता है कि सागर जितनी इस विशाल सेना के भोजन प्रबंधन करना आपके और भीमसेन के अतिरिक्त और किसी के लिए भी संभव नहीं है।
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भीमसेन इस युद्ध से विरत हो नहीं सकते अतः मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप अपनी सेना सहित दोनों ओर की सेना के भोजन का भार संभालिये।" इस प्रकार उडुपी के महाराज ने सेना के भोजन का प्रभार संभाला।
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पहले दिन उन्होंने उपस्थित सभी योद्धाओं के लिए भोजन का प्रबंध किया। उनकी कुशलता ऐसी थी कि दिन के अंत तक एक दाना अन्न का भी बर्बाद नहीं होता था।
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जैसे-जैसे दिन बीतते गए योद्धाओं की संख्या भी कम होती गयी। दोनों ओर के योद्धा ये देख कर आश्चर्यचकित रह जाते थे कि हर दिन के अंत तक उडुपी नरेश केवल उतने ही लोगों का भोजन बनवाते थे जितने वास्तव में उपस्थित रहते थे।
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किसी को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर उन्हें ये कैसे पता चल जाता है कि आज कितने योद्धा मृत्यु को प्राप्त होंगे ताकि उस आधार पर वे भोजन की व्यवस्था करवा सकें।
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इतने विशाल सेना के भोजन का प्रबंध करना अपने आप में ही एक आश्चर्य था और उसपर भी इस प्रकार कि अन्न का एक दाना भी बर्बाद ना हो, ये तो किसी चमत्कार से कम नहीं था।
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अंततः युद्ध समाप्त हुआ और पांडवों की जीत हुई। अपने राज्याभिषेक के दिन आख़िरकार युधिष्ठिर से रहा नहीं गया और उन्होंने उडुपी नरेश से पूछ ही लिया
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हे महाराज ! समस्त देशों के राजा हमारी प्रशंसा कर रहे हैं कि किस प्रकार हमने कम सेना होते हुए भी उस सेना को परास्त कर दिया जिसका नेतृत्व पितामह भीष्म, गुरु द्रोण और हमारे ज्येष्ठ भ्राता कर्ण जैसे महारथी कर रहे थे।
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किन्तु मुझे लगता है कि हम सब से अधिक प्रशंसा के पात्र आप है जिन्होंने ना केवल इतनी विशाल सेना के लिए भोजन का प्रबंध किया अपितु ऐसा प्रबंधन किया कि एक दाना भी अन्न का व्यर्थ ना हो पाया। मैं आपसे इस कुशलता का रहस्य जानना चाहता हूँ।
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इसपर उडुपी नरेश ने हँसते हुए कहा - "सम्राट ! आपने जो इस युद्ध में विजय पायी है उसका श्रेय किसे देंगे ?
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इसपर युधिष्ठिर ने कहा "श्रीकृष्ण के अतिरिक्त इसका श्रेय और किसे जा सकता है ? अगर वे ना होते तो कौरव सेना को परास्त करना असंभव था।
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तब उडुपी नरेश ने कहा "हे महाराज ! आप जिसे मेरा चमत्कार कह रहे हैं वो भी श्रीकृष्ण का ही प्रताप है।" ऐसा सुन कर वहाँ उपस्थित सभी लोग आश्चर्यचकित हो गए।
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तब उडुपी नरेश ने इस रहस्य पर से पर्दा उठाया और कहा - "हे महाराज! श्रीकृष्ण प्रतिदिन रात्रि में मूँगफली खाते थे।
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मैं प्रतिदिन उनके शिविर में गिन कर मूँगफली रखता था और उनके खाने के पश्चात गिन कर देखता था कि उन्होंने कितनी मूंगफली खायी है।
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वे जितनी मूँगफली खाते थे उससे ठीक १००० गुणा सैनिक अगले दिन युद्ध में मारे जाते थे। अर्थात अगर वे ५० मूँगफली खाते थे तो मैं समझ जाता था कि अगले दिन ५०००० योद्धा युद्ध में मारे जाएँगे।
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उसी अनुपात में मैं अगले दिन भोजन कम बनाता था। यही कारण था कि कभी भी भोजन व्यर्थ नहीं हुआ।" श्रीकृष्ण के इस चमत्कार को सुनकर सभी उनके आगे नतमस्तक हो गए।
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ये कथा महाभारत की सबसे दुर्लभ कथाओं में से एक है। कर्नाटक के उडुपी जिले में स्थित कृष्ण मठ में ये कथा हमेशा सुनाई जाती है।
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ऐसा माना जाता है कि इस मठ की स्थापना उडुपी के सम्राट द्वारा ही करवाई गयी थी जिसे बाद में माधवाचार्य ने आगे बढ़ाया।

अटल विहारी वाजपेयी : एक महान योद्धा

वर्ष 1957 में जब अटल जी ने बलरामपुर से अपना पहला लोकसभा चुनाव जीता था, तब तक उन्होंने एक बार भी बलरामपुर की यात्रा नहीं की थी। इस चुनाव की भी बड़ी रोचक कहानी है। 1952 में जब पहले लोकसभा चुनाव हुए, तब पंडित जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल में शामिल दो कर्णधार अपनी स्वतंत्र पार्टियां बनाकर उनके विरुद्ध चुनाव लड़ रहे थे। डॉ. भीमराव आंबेडकर शेड्यूल्ड कास्ट फ़ेडरेशन की ओर से, जिसका नामकरण बाद में रिपब्लिकन पार्टी कर दिया गया। और पं. श्यामाप्रसाद मुखर्जी भारतीय जनसंघ से, जिसका गठन गांधी-वध के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लगाए गए प्रतिबंध के परिप्रेक्ष्य में एक राजनीतिक दल की आवश्यकता महसूस किए जाने पर किया गया था। कुल 489 सीटों पर लड़े गए चुनाव में नेहरू जी की कांग्रेस 364 सीटें जीत गईं। आंबेडकर की पार्टी को 2 और श्यामाप्रसाद जी की पार्टी को 3 ही सीटें मिलीं। अटल जी तब राजनीति में नहीं थे। वे लखनऊ से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका "राष्ट्रधर्म" में सम्पादक थे। वे एक पत्रकार के रूप में ही पं. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के सम्पर्क में आए थे और फिर उनके साथ निरंतर यात्राएं करने लगे। 1953 में कश्मीर में मुखर्जी की संदेहास्पद मृत्यु के बाद अटल जी के मन में पत्रकारिता के बजाय लोकप्रिय राजनीति का संकल्प सुदृढ़ हो गया। भारतीय जनसंघ का चुनाव चिह्न दीपक हुआ करता था। तब पार्टी के कार्यकर्तागण चुनाव प्रचार के तौर पर दीवारों पर चढ़कर दिया जलाते थे। अटल जी इन कार्यकर्ताओं में शामिल थे। किंतु अन्य कार्यकर्ताओं से अधिक वे एक ओजस्वी वक्ता भी थे। वर्ष 1957 में जब दूसरा लोकसभा चुनाव हुआ तो अटल जी को उनकी वक्तृता शैली के कारण ही चुनाव लड़ाने का निश्चय किया गया। तीन सांसदों वाली जनसंघ तब छोटी-सी पार्टी थी, जिसके क़द्दावर संस्थापक का देहांत हो चुका था। आचार्य देवप्रसाद घोष तब उसके अध्यक्ष थे। दीनदयाल उपाध्याय, बलराज मधोक, लालकृष्ण आडवाणी और अटल जी उसके कर्णधार थे। तय किया गया कि प्रखर वक्ता अटल जी को तीन सीटों से चुनाव लड़ाया जाएगा- मथुरा, लखनऊ और बलरामपुर। मथुरा से इसलिए कि पार्टी एक ऐसा उम्मीदवार खोज रही थी, जो ज़मानत ज़ब्त होने से बचा सके। जीत का तो सवाल ही नहीं था। लखनऊ से इसलिए कि अटल जी वहीं के निवासी थे और एक उपचुनाव में अच्छे वोट प्राप्त कर चुके थे। अलबत्ता जीत की उम्मीद यहां भी नगण्य थी। बलरामपुर से इसलिए कि वहां पर अवश्य पार्टी की स्थिति ठीक-ठाक मानी जा सकती थी। वहां पार्टी के कार्यकर्ता प्रतापनारायण तिवारी ने संगठन को मज़बूती प्रदान कर दी थी। एक और बात यह थी कि बलरामपुर में तब मुस्लिम ज़मींदारों का आधिपत्य था और उनके शोषण के शिकार छोटे किसानों की सहानुभूति पार्टी जीत सकती थी। अटल जी इससे पहले कभी बलरामपुर गए भी नहीं थे। "बिंदु-बिंदु विचार" में अटल जी ने लिखा है- "न मुझे बलरामपुर के भूगोल का कोई ज्ञान था, न इतिहास का। गोंडा से गोरखपुर के लिए छोटी लाइन जाती थी, बलरामपुर स्टेशन उसी पर स्थित था। आधी रात को रेलगाड़ी गोंडा से चलती थी और ब्रह्ममुहूर्त में बलरामपुर पहुंचती थी। मैं गोंडा से गाड़ी में चढ़ा और संकरी-सी बर्थ पर बिस्तर बिछाकर सो गया। आंख खुली तो गाड़ी एक स्टेशन पर खड़ी थी। खिड़की खोलकर देखा तो सैकड़ों कौए स्टेशन पर लगे पेड़ों पर कांव-कांव कर रहे थे। सारा आकाश गूंज रहा था। मैंने पूछा- यह कौन-सा स्टेशन है? उत्तर मिला- कौवापुर।" कौवापुर और इंटियाथोक के बीच ही नेपाल सीमा पर बलरामपुर था, जहां रेलगाड़ी के फ़र्श पर सोते हुए अटल जी चुनाव लड़ने पहुंचे थे। अटल जी ने लिखा है कि वहां पर मुस्लिम ज़मींदारों का ऐसा ख़ौफ़ था कि शंख-घड़ियाल बजाने पर भी रोक थी। जनसंघ की विचारधारा से वहां का उत्पीड़ित किसान वर्ग तुरंत जुड़ा। चुनाव हुए। मथुरा में ज़मानत नहीं बचाई जा सकी। लखनऊ में करारी हार मिली। किंतु बलरामपुर में विजयश्री ने अटल जी का प्रथम वरण किया। 1957 के चुनाव में भारतीय जनसंघ ने 4 सीटें जीती थीं। उनमें से एक बलरामपुर के सांसद अटल बिहारी वाजपेयी थे। शेष तीन सीटें हरदोई, धूलिया और रत्नागिरी से प्राप्त हुई थीं। जिस लोकसभा में पंडित जवाहरलाल नेहरू 371 सीटों के धुंआधार बहुमत से प्रधानमंत्री बने हों और उनके मंत्रिमंडल में मौलाना आज़ाद, गोविंदवल्लभ पंत, मोरारजी देसाई, जगजीवनराम जैसे मूर्धन्य हों, उसमें भारतीय जनसंघ के चारों सांसदों में जिस एक सांसद ने सबका, स्वयं प्रधानमंत्री का, ध्यान खींचा, उसका नाम अटल बिहारी वाजपेयी था। अपने पहले ही लोकसभा भाषण में अटल जी ने एक वाक्य कहा था- "बोलने के लिए वाणी चाहिए, किंतु चुप रहने के लिए वाणी और विवेक दोनों चाहिए।" इस एक बात ने पं. नेहरू का दिल जीत लिया था। पंडितजी अंग्रेज़ी में भाषण करते थे, किंतु उन्होंने अटल जी का नाम लेकर उनके द्वारा कही गई ये पंक्तियां हिंदी में दोहराईं और प्रभावी युवा नेता-वक्ता का अभिनंदन किया। वो 1957 था, उसके पूरे 42 साल बाद अटल जी को प्रधानमंत्री के उसी सिंहासन पर विराजमान होना था, जिस पर तब नेहरूजी आसीन थे। किंतु केवल 13 दिनों के लिए। चार दशक की तपस्या और तेरह दिन का राज, किंतु पराजय का वह क्षण अटल जी के प्रधानमंत्रित्व का अंत नहीं था, वास्तव में वह तो उसका यशस्वी शंखनाद था, पाञ्चजन्य के जयघोष से भरा। कवि, पत्रकार, स्वयंसेवक, कार्यकर्ता, जनप्रतिनिधि, सांसद, राजनेता, प्रधानमंत्री, गठबंधन सरकार के मुखिया - अटल-व्यक्तित्व को देखना हो तो इतने वैराट्य में ही देखना समीचीन होगा। और सत्ता का दम्भ सिर चढ़कर बोलने लगे, तो 3 सीटें जीतने वाली जनसंघ की गंगोत्री का स्मरण संसदीय राजनीति में विनम्रता बनाए रखने का निमित्त होगा, जिसके लिए युवा अटल जी ने दिये जलाए थे। इति शुभम्। 🙏 सुशोभित सक्तवत के फेसबुक से

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