Wednesday, July 25, 2018

पूर्वी अफ्रीकी देश युगांडा का तानाशाह ईदी अमीन

पूर्वी अफ्रीकी देश युगांडा का जब भी ज़िक्र होता है, तब वहां के तानाशाह ईदी अमीन का नाम ज़रूर लिया जाता है| ईदी अमीन को इंसानियत का दुश्मन, हैवान, राक्षस और न जाने क्या-क्या कहा जाता है. युगांडा पर आठ बरस की तानाशाही में ईदी अमीन ने लाखों लोगों को मरवा दिया था. उनके बारे में तमाम तरह की कहानियां प्रचलित हैं कि 'वो लोगों का ख़ून पीता था, आदमख़ोर था'| ईदी अमीन ने अपनी तानाशाही के दौरान भारतीय मूल के क़रीब 90 हज़ार लोगों को देश निकाला दे दिया था| ब्रिटिश पत्रकार यास्मीन अलीभाई-ब्राउन युगांडा में पैदा हुई थीं. वहीं पली-बढ़ीं. यास्मीन के पिता भारत से जाकर युगांडा में बसे थे. यास्मीन उन एशियाई मूल के लोगों में से हैं जो ईदी अमीन की तानाशाही सनक के शिकार हुए थे जब अचानक अमीन ने हज़ारों एशियाई मूल के लोगों को युगांडा छोड़कर जाने का फ़रमान सुना दिया था| इस ख़ास रिपोर्ट के लिए यास्मीन ने बीबीसी से बात की.इसमें उन्होंने ईदी अमीन के दौर के तजुर्बे साझा किए, युगांडा के अपने दोस्तों से बात की और उस दौर यानी ईदी अमीन के तानाशाही शासन को फिर से, नए सिरे से समझने की कोशिश की. अमीन के राज को न सिर्फ़ युगांडा के इतिहास का काला अध्याय कहा जाता है बल्कि इंसानियत की तारीख़ का भी बहुत बुरा दौर माना जाता है. यास्मीन बताती हैं, ''युगांडा में एशियाई मूल के लोगों की ज़िंदगी बेहद शानदार थी. वो युगांडा की कुल आबादी के महज़ एक फ़ीसदी थे मगर युगांडा की क़रीब 20 फ़ीसदी संपत्ति इन एशियाई मूल के लोगों के पास थी.'' अंग्रेज़ एशियाई मूल के लोगों को युगांडा ले गए इन एशियाई मूल के लोगों को अंग्रेज़, भारतीय उपमहाद्वीप से युगांडा ले गए थे. अंग्रेज़ों का मक़सद था, इन भारतीयों की मदद से पूर्वी अफ्रीका का प्रशासन चलाना. इसके अलावा भारतीय मूल के लोगों की मदद से युगांडा में रेलवे लाइन भी बिछाई गई. बाद में बहुत से भारतीय युगांडा में ही बस गए. कुछ ने प्रशासन में सिक्का जमाया, तो बहुत से लोगों ने कारोबार में नाम-दाम कमाया. इनमें से ज़्यादातर लोग मूल रूप से गुजरात के रहने वाले थे. जब ईदी अमीन ने 90 हज़ार के क़रीब एशियाई मूल के लोगों को देश निकाले का फ़रमान सुनाया तो इनमें से क़रीब 20 हज़ार के पास ब्रिटिश पासपोर्ट था. यानी वो ब्रिटेन के नागरिक थे. युगांडा से निकाले जाने के बावजूद उन्होंने ब्रिटेन में भी ख़ूब कामयाबी हासिल की. 70 के दशक में युगांडा की राजधानी कंपाला में ज़्यादातर कारोबार एशियाई मूल के लोगों के हाथ में था. वहां की सड़कों के नाम एशियाई मूल के लोगों के नाम पर थे. अब दौर बदल गया है. बहुत-सी सड़कों के जो नाम यास्मीन के बचपन के दिनों में थे, वो अब बदल गए हैं. आज बड़ी तादाद में अफ्रीकी भी कारोबार कर रहे हैं. यास्मीन अपने बचपन के दिनों को याद कर कहती हैं कि उन्हें अफ्रीकी लोग स्वाहिली में 'मटोटो पोटेया' यानी 'खोया हुआ बच्चा' कहते थे. यास्मीन कहती हैं कि वो अक्सर बाज़ार में खो जाया करती थीं. 'युगांडा के कसाई' ईदी अमीन ने जब 90 हज़ार एशियाई मूल के लोगों को देश से निकाला तो उनके लिए पूरी दुनिया में आवाज़ उठी. आज भी ईदी अमीन का ज़िक्र होता है, तो उस देश निकाले की बात होती है. मगर, ईदी अमीन के दौर में युगांडा के अफ्रीकी लोगों पर जो बीती, उसकी तरफ़ से दुनिया ने आंखें फेर रखी थीं. आज उस क़िस्से को भुला दिया गया है. लाशें सड़ती हुई मिलीं ईदी अमीन की हुक़ूमत ख़त्म होने के बाद युगांडा में कई जगह लोगों की लाशें सड़ती हुई मिली थीं. तमाम सामूहिक क़ब्रों का पता चला था. वो वाक़ई में एक राक्षस था जिसने अपने ही देश के लाखों लोगों का ख़ून किया था. एक दौर ऐसा भी था जब ईदी अमीन अपने देश के लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय था. जब उसने एशियाई मूल के लोगों को देश से बाहर निकाल फेंकने का एलान किया तो उसे भारी जनसमर्थन मिला था. 19वीं सदी के आख़िर में अंग्रेज़ों ने पूर्वी अफ्रीका के एक बड़े हिस्से पर अपना उपनिवेश क़ायम कर लिया था. वहां के निज़ाम को चलाने के लिए अंग्रेज़ों को ऐसे लोग चाहिए थे जो उनके रहन-सहन को जानें और अफ्रीकी लोगों से संवाद का ज़रिया भी बनें. साम्राज्यवादी सरकार ने भारतीय मूल के बहुत से लोगों को युगांडा लाकर बसाया. वहां बसे भारतीय मूल या एशियाई मूल के इन लोगों ने अंग्रेज़ों से तो नज़दीकी क़ायम कर ली, मगर अफ्रीकी नस्ल के मूल निवासियों से वो दूर ही रहे. युगांडा में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों की अपनी अलग बस्तियां थीं. उनके कारोबार अलग थे. स्कूल अलग थे. वो अफ्रीकी मूल के लोगों के साथ घुलते-मिलते नहीं थे. 9 अक्टूबर 1962 को जब युगांडा को ब्रिटेन से आज़ादी मिली तो एशियाई मूल के लोग बहुत आशंकित थे. उन्हें युगांडा का अंग्रेज़ों से आज़ाद होना शायद अच्छा नहीं लगा था. अफ्रीकियों की एशियाई मूल के लोगों से नाराज़गी आज़ादी के बाद मिल्टन ओबोटे युगांडा के पहले प्रधानमंत्री बने. वहां के सबसे बड़े क़बीले बगांडा के सरदार एडवर्ड मोटेसा देश के राष्ट्रपति बनाए गए. चार साल बाद ही ओबोटे ने मोटेसा को राष्ट्रपति पद से हटाकर पूरी सत्ता हथिया ली. सत्ता परिवर्तन के दौरान कुछ एशियाई मूल के लोग ओबोटे की सरकार में शामिल हुए. मगर युगांडा के अफ्रीकी मूल के लोगों और एशियाई समुदाय के बीच दूरी बनी रही. ज़्यादातर एशियाई मूल के लोगों की सोच अफ्रीकी लोगों के प्रति नस्लवादी थी. अफ्रीकी मूल के लोग भी एशियाई मूल के लोगों से नाख़ुश थे. युगांडा के पत्रकार ड्रेक सकेबा कहते हैं, "एशियाई समुदाय के लोग अफ्रीकी मूल के लोगों से दूरी बनाकर रखते थे. दोनों समुदायों के अपने अलग स्कूल थे. दोनों समुदायों के बीच ताल्लुक़ की डोर ही नहीं थी. यही वजह थी कि युगांडा के लोग अंग्रेज़ों को साम्राज्यवादी ताक़त मानते थे तो एशियाई समुदाय को शोषक वर्ग के तौर पर देखते थे जो देश के मूल निवासियों का 'शोषण' कर रहे थे. इसीलिए दोनों समुदायों के बीच बहुत कड़वाहट थी. इक्का-दुक्का लोग रहे होंगे, जो मिलकर काम कर रहे थे." युगांडा का हाल दक्षिण अफ्रीका जैसा था जहां यूरोपीय समुदाय हुक़ूमत कर रहा था तो भारतीय मूल वहां का मध्यम वर्ग था. मूल अफ्रीकी समुदाय के लोगों की हालत देश में सबसे निचले पायदान पर होने की वजह से बहुत बुरी थी. सिनेमाघरों में हिंदी फ़िल्में लंदन में रहने वाले मीडिया सलाहकार जोएल किबाज़ो युगांडा के बारे में गहरी समझ रखते हैं. जोएल का परिवार भी युगांडा छोड़कर ब्रिटेन में आ बसा था. जोएल कहते हैं कि एक दौर ऐसा था कि युगांडा की राजधानी कंपाला में भारतीय मूल के लोगों का ही दबदबा था. जोएल बताते हैं, "कंपाला में शाम के वक़्त भारतीय मूल के लोग सड़कों पर निकला करते थे. उस वक़्त अफ्रीकी समुदाय के लोगों के सड़कों पर निकलने की मानो मनाही थी, कोई क़ानून नहीं था. मगर सब को पता था कि कंपाला की सड़कों पर अफ्रीकी समुदाय के लोग नहीं घूम सकते. वो जगह केवल गोरों और 'ब्राउन साहेब' यानी एशियाई मूल के लोगों के लिए थी." जोएल उन दिनों को याद कर कहते हैं कि शहर के कमोबेश हर सिनेमाघर में भारतीय, हिंदी फ़िल्में दिखाई जाती थीं. दिन के वक़्त तो अफ्रीकी कामगार कंपाला में आ सकते थे. शाम के वक़्त सारा शहर भारतीय हो जाता था. ओबोटे के दौर में कुछ दिनों तक युगांडा में स्थिरता रही. आर्थिक हालात भी कुछ सुधरे. मगर असल बदलाव कहीं नहीं दिख रहा था. भारतीय मूल के लोगों के हाथों में देश की संपत्ति जोएल किबाज़ो कहते हैं, "देश की संपत्ति भारतीय मूल के लोगों के हाथों में थी. हमारे लिए आज़ादी के कोई मायने नहीं थे क्योंकि मिस्टर पटेल अपनी दुकान केवल किसी और मिस्टर पटेल को ही बेचते थे. किसी अफ्रीकी को नहीं. अफ्रीकी मूल के लोगों से भारतीय समुदाय के लोग बराबरी की शर्तों पर सौदे नहीं करते थे. आज़ादी के बावजूद अफ्रीकी लोगों को काम करने की पूरी आज़ादी नहीं थी. ये आज़ादी अधूरी थी और इसके लिए काफ़ी हद तक भारतीय मूल के लोग ज़िम्मेदार थे." युगांडा के राजनीतिक विश्लेषक और इतिहासकार मम्बुत्सिया एंडेबेसा जोएल किबाज़ो से इत्तिफ़ाक़ रखते हैं. वो कहते हैं कि अंग्रेज़ों के जाने के बाद भी युगांडा में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों के मिज़ाज में कतई बदलाव नहीं आया था. मम्बुत्सिया एंडेबेसा कहते हैं कि, "उस वक़्त युगांडा में अगर किसी के पास पूंजी थी तो वो भारतीय या यूरोपीय मूल के समुदाय के पास थी. आज़ादी के बाद जल्द ही भारतीय समुदाय के हित अफ्रीकी समुदाय के हितों से टकराने लगे. हालात से निपटने के लिए मिल्टन ओबोटे की सरकार ने आर्थिक विकेंद्रीकरण की नीति अपनाई. नतीजा ये हुआ कि जिस संपत्ति और कारोबार पर भारतीय मूल के लोगों का एकाधिकार था, उस पर अचानक अफ्रीकी कब्जा करने लगे. संघर्ष के हालात लगातार बने हुए थे." जब ईदी अमीन बने सेनाध्यक्ष युगांडा को आज़ाद हुए क़रीब एक दशक हो चले थे. ओबोटे देश के हालात बदलने में नाकाम रहे थे. वो तानाशाही हुक़ूमत चला रहे थे. देश में ओबोटे के कई दुश्मन बन गए थे, लेकिन वो अपने जनरल ईदी अमीन पर बहुत भरोसा करते थे और उनकी मदद से तानाशाही चला रहे थे. ईदी अमीन इस्लामिक क़बीले काक्वा से ताल्लुक़ रखते थे. अमीन ने कभी औपचारिक तालीम नहीं हासिल की थी. अंग्रेज़ों के दौर में वो सेना में भर्ती हो गए थे. सेना में अमीन ने तेज़ी से तरक्की की थी. 1966 में राष्ट्रपति मिल्टन ओबोटे ने ईदी अमीन को सेनाध्यक्ष नियुक्त किया. ओबोटे की सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हुई थी. देश में अराजकता का माहौल था. तमाम क़बीलों को शिकायत थी कि उनके साथ भेदभाव हो रहा है. उन पर ज़ुल्म ढाए जा रहे हैं. वो दौर शीतयुद्ध का भी था. अमरीका, ब्रिटेन और इसराइल को लगा कि ओबोटे की सरकार का झुकाव सोवियत संघ की तरफ़ बढ़ता जा रहा है. ईदी अमीन ने तख़्तापलट किया 1971 में जब मिल्टन ओबोटे राष्ट्रमंडल की बैठक में शामिल होने सिंगापुर गए हुए थे तो ईदी अमीन ने उनका तख़्तापलट कर दिया. अमीन ने ये तख़्तापलट बहुत फ़ुर्ती और शांतिपूर्ण तरीक़े से किया. पश्चिमी देशों ने भी अमीन के तख़्तापलट का समर्थन किया. देश की जनता ने भी ईदी अमीन के सत्ता में आने का स्वागत किया. जोएल किबाज़ो कहते हैं कि लोग ओबोटे की सरकार से उकता गए थे. जनता ने ख़ूब जश्न मनाया. पश्चिमी देशों ने भी ईदी अमीन के सत्ता में आने को हाथों-हाथ लिया. किबाज़ो बताते हैं, "ब्रिटेन ने तो ईदी अमीन के हाथों में सत्ता आने को यूं देखा जैसे कि युगांडा का निज़ाम दोबारा उनके हाथ में आ गया हो. अमीन का बकिंघम पैलेस में स्वागत किया गया, लेकिन पश्चिमी देशों ने ईदी अमीन के बारे में ग़लत अंदाज़ा लगाया था. उन्हें जल्द ही अपनी ग़लती का एहसास हो गया." ईदी अमीन की सरकार को मान्यता देने में ब्रिटेन अव्वल था, मगर कई अफ्रीकी देशों ने इस तख़्तापलट का विरोध किया. पड़ोसी देश तंज़ानिया ने भी इस पर नाख़ुशी ज़ाहिर की. पूर्व राष्ट्रपति ओबोटे ने तंज़ानिया में ही पनाह ली थी. एशियाई समुदाय पर शोषण का आरोप ब्रिटेन को जल्द ही एहसास हो गया कि ईदी अमीन पर भरोसा नहीं किया जा सकता. अमीन ने सेना की मदद से देश पर पूरा नियंत्रण स्थापित कर लिया. अमीन ने लोगों को डराने और ज़ुल्म ढाने के लिए सेना का भरपूर दुरुपयोग किया. हिंसक तरीक़ों का सहारा लिया. राजनीतिक अस्थिरता के इस दौर में युगांडा की अर्थव्यवस्था की हालत और भी बिगड़ती जा रही थी. हालात से निपटने के लिए अमीन ने बड़ा क़दम उठाने का फ़ैसला किया. अमीन ने एशियाई समुदाय पर देश के लोगों के शोषण का आरोप लगाते हुए उनके देश निकाले का एलान किया. मम्बुत्सिया एंडेबेसा कहते हैं कि आज़ादी के बाद एशियाई मूल के लोगों को शोषक के तौर पर देखा जाता था. इसलिए जब ईदी अमीन ने उन्हें देश से बाहर जाने का फ़रमान सुनाया तो अफ्रीकी समुदाय बेहद ख़ुश हो गया. उनके पास वो क़ाबिलियत नहीं थी कि वो भारतीय मूल के लोगों की जगह ले सकें. मगर फिर भी आम अफ्रीकी ने इस फ़ैसले पर ख़ुशी जताई. वैसे अपने भ्रष्टाचार का ठीकरा एशियाई मूल के लोगों पर फोड़ने वाले ईदी अमीन पहले अफ्रीकी नेता नहीं थे. 70 के दशक की शुरुआत में कई अफ्रीकी और एशियाई मूल के लोग थे जो आपस में घुल-मिल रहे थे. यास्मीन इस छोटे से तबक़े से ही ताल्लुक़ रखती थीं. वो कंपाला की मकेरेरे यूनिवर्सिटी में पढ़ती थीं. वहां पर उनके साथियों में अफ्रीकी समुदाय के लोग भी थे. यास्मीन कहती हैं कि वो युगांडा में उनकी ज़िंदगी के सबसे ख़ुशनुमा दिन थे. ''यूनिवर्सिटी का माहौल बहुत ख़ुला था. कैंपस में चारों तरफ़ हरियाली थी. अक्सर छात्रों के गुटों के बीच सियासी तक़रीरें और तकरारें होती थीं.'' लेकिन ईदी अमीन ने सत्ता में आने के बाद यूनिवर्सिटी में सियासी डिबेट पर रोक लगा दी. छात्रों ने इसका विरोध किया तो अमीन ने उन्हें डराने के लिए यूनिवर्सिटी में सेना की टुकड़ी भेज दी. यास्मीन बताती हैं, "बूट पहनकर टैंकों में सवार होकर जब अमीन के सैनिक यूनिवर्सिटी कैंपस में दाख़िल हुए तो ये मंज़र बेहद डरावना था. युगांडा के बेहतर भविष्य की उम्मीद जो मेरे मन में थी, उस सपने को ईदी अमीन के फ़ौजी बूटों ने कुचल डाला था." यास्मीन के यूनिवर्सिटी के दिनों के साथी ममद अलीभाई ने भी ईदी अमीन के दौर में युगांडा छोड़ दिया था. मगर उसकी तानाशाही ख़त्म होने के बाद ममद अलीभाई युगांडा लौट आए. आजकल वो सिक्योरिटी का कारोबार करते हैं जो बेहद कामयाब है. अलीभाई कहते हैं, "स्कूल और यूनिवर्सिटी के दिन मेरी ज़िंदगी के सबसे हसीन यादों वाले दिन हैं. एशियाई मूल के लोग बहुत कम थे. अफ्रीकी और भारतीय समुदाय के बीच की दूरियां घट रही थीं. लोग घुल-मिल रहे थे. हम एक ही स्कूल और यूनिवर्सिटी में पढ़ने लगे थे. ये काम हमसे पहले की पीढ़ी ने नहीं किया था. हमारे अगर एशियाई मूल के दोस्त थे, तो अश्वेत अफ्रीकी दोस्त भी हमने बनाए थे." हेनरी किएम्बा उस दौर के इतिहास को औरों से बेहतर जानते हैं. हेनरी ने मिल्टन ओबोटे के साथ भी काम किया था और बाद में वो ईदी अमीन की सरकार में भी मंत्री रहे थे. हेनरी के घर की तमाम दीवारें उनके लंबे सियासी सफ़र की गवाही देती हैं. हेनरी कहते हैं, "मैंने आज़ादी के बाद की युगांडा की हर सरकार के साथ काम किया है. अंग्रेज़ों से आज़ादी मिलने के बाद हम बहुत उत्साहित थे. हमें लगता था कि हम और भी बेहतर भविष्य बनाएंगे." लेकिन, ईदी अमीन के आने के बाद सब कुछ बदल गया. हेनरी कहते हैं कि ईदी अमीन एक दिलचस्प शख़्सियत थे. उनके दो चेहरे थे. एक वो जो बहुत मज़ाकिया था. दूसरा वो जो क्रूर था, दूसरों पर ज़ुल्म ढाने वाला था. कई भारतीय वहीं रुक गए थे अध्यापिका पीस ट्वीने भी अमीन के ज़ुल्मो-सितम की शिकार हुई थीं. पीस कभी भी उस दौर को भूल नहीं पाईं. वो कहती हैं, ''हमारी समझ में ही नहीं आया कि हुआ क्या है. हमें बस ये पता था कि देश में बहुत बड़ा बदलाव हुआ है. हम कहीं भी आते-जाते हुए डरते थे. रास्ते में सैनिक दिखने पर आंखें नीची करते थे. एक बार एक लड़की की हत्या हो गई तो यूनिवर्सिटी कैंपस में सैनिक घुस आए. लड़कियों ने ख़ुद को एक कमरे में बंद कर लिया. सैनिकों ने ज़बरदस्ती दरवाज़ा खुलवाया और लड़कियों को बुरी तरह पीटा. ऐसा लगता था कि उनकी नज़र में हम इंसान ही नहीं हैं." पश्चिमी देशों ने ईदी अमीन की हैवान हुकूमत के प्रति आंखें मूंद ली थीं. उनके लिए अश्वेतों की जान की कोई क़ीमत नहीं थी. मार-काट के इस दौर में जब भारतीय मूल के लोगों को युगांडा से निकाला गया तो कई परिवारों ने या तो अपनी मर्ज़ी से वहीं रहने का फ़ैसला किया या फिर उन्हें युगांडा में रहने की इजाज़त मिल गई. हुमा अहमद का परिवार ईदी अमीन के दौर में युगांडा में ही ठहर गया था. उनके बाबा ने युगांडा छोड़कर जाने से इनकार कर दिया. मजबूरी में हुमा के मां-बाप को भी रुकना पड़ा. हुमा बताती हैं कि उस दौर में बहुत कम भारतीय मूल के लोग कंपाला में बचे थे. कुछ लोग ऐसे थे जो ग्रामीण इलाक़ों में रहते थे. 'ईदी अमीन की नीयत साफ़ थी' हुमा कहती हैं कि देश निकाले से पहले युगांडा को भारतीय मूल के लोग ही चला रहे थे. अचानक उनके जाने से देश में एक खालीपन आ गया. लोगों को पता ही नहीं था कि बिना भारतीय मूल के लोगों के युगांडा का क्या होगा. हुमा मानती हैं कि ईदी अमीन को लेकर लोगों की सोच में नाइंसाफ़ी रही है. वो कहती हैं कि ईदी अमीन की नीयत साफ़ थी. वो अपने लोगों का भला चाहते थे. वो चाहते थे कि युगांडा का अफ्रीकी समुदाय तरक्की करे. समृद्ध बने. युगांडा की कमान अफ्रीकी समुदाय के लोगों के हाथ में ही हो. युगांडा के पत्रकार टिमोथी कैलीगेरा कहते हैं, "ईदी अमीन का किरदार डोनल्ड ट्रंप से मिलता था. वो दिल के साफ़ थे. बचकाना बर्ताव करते थे, अपनी ही बात से पलट जाते थे. तुनकमिज़ाज थे. बेवजह भड़क उठते थे, लेकिन वो अपने देश, अपनी जनता से बहुत प्यार करते थे. उसका भला चाहते थे." हालांकि जोएल किबाज़ो ऐसा नहीं मानते. जोएल के क़बीले को ईदी अमीन ने लगातार अपने निशाने पर रखा था. जोएल कहते हैं, "हम ख़ुशक़िस्मत थे कि बच निकले, लेकिन मेरे कई दोस्त सेना के हाथों मारे गए. कहा जाता है कि 10 लाख से ज़्यादा लोगों को ईदी अमीन ने मौत के घाट उतार दिया था. ये युगांडा की कुल आबादी का 7-8 फ़ीसदी था. इनमें बुद्धिजीवी भी थे. डॉक्टर और जज भी थे. हालांकि बहुत कम भारतीय मूल के लोग ईदी अमीन के शासन के दौरान मारे गए थे. वो ईदी अमीन के चंगुल से बचकर नई दुनिया बसा लेने में कामयाब रहे." लौटे कई भारतीय परिवार हेनरी किएम्बा ने काफ़ी वक़्त ईदी अमीन की सरकार में गुज़ारा था, लेकिन आख़िर में वो भी ईदी अमीन से अलग होकर देश छोड़कर चले गए. हेनरी कहते हैं, "ईदी अमीन ने जब मेरे भाई को मरवा दिया तो ये मेरे बर्दाश्त से बाहर हो गया था. मेरी मजबूरी थी कि मैं देश में ही रहूं क्योंकि मेरी मां यहीं थी. ईदी अमीन ने दो मंत्रियों को मौत के घाट उतरवा दिया था. उसने युगांडा के आर्कबिशप की हत्या करा दी. जब मेरे भाई को मार दिया गया तो मजबूर होकर मुझे देश छोड़ना पड़ा. ईदी अमीन के लिए किसी की जान की कोई क़ीमत नहीं थी." हालांकि अब युगांडा में एशियाई मूल और अफ्रीकी समुदाय के बीच दूरियां पाटने की कोशिशें हो रही हैं. भारतीय मूल के मयूर माधवानी के परिवार का युगांडा में चीनी बनाने का बड़ा कारोबार है. ईदी अमीन के दौर में माधवानी का परिवार युगांडा छोड़कर चला गया था. मगर 1979 में ईदी अमीन की तानाशाही ख़त्म होने के बाद माधवानी परिवार दोबारा युगांडा में आकर बस गया. मयूर की भतीजी निमिषा माधवानी संयुक्त अरब अमीरात में युगांडा की राजदूत हैं. दोनों ही मानते हैं कि ईदी अमीन के दौर में भारतीय मूल के लोगों की मुश्किलों को ज़्यादा सुर्ख़ियां मिलीं, लेकिन अफ्रीकी समुदाय ने अमीन के ज़ुल्म ज़्यादा झेले. निमिषा कहती हैं, ''ईदी अमीन के दौर में बमुश्किल दो भारतीय समुदाय के लोग मारे गए होंगे, जबकि उसके दौर में 5 लाख से ज़्यादा अश्वेत मारे गए. हिटलर की तरह ईदी अमीन भी इंसानियत का दुश्मन था.'' युगांडा के मौजूदा राष्ट्रपति योवेरी मुसेवेनी भारतीय और अफ्रीकी समुदायों के बीच दूरियां पाटने की कोशिश कर रहे हैं. 1986 में सत्ता में आने के बाद मुसेवेनी ने देश छोड़कर गए भारतीय समुदाय से युगांडा लौटने की अपील की. उन्होंने ईदी अमीन के दौर में ज़ब्त की गई भारतीय मूल के लोगों की पांच हज़ार से ज़्यादा संपत्तियां लौटा दीं. मुसेवेनी के इस प्रस्ताव को स्वीकारने वाले भारतीय मूल के लोगों में ममद अलीभाई सबसे पहले थे. वो कहते हैं कि आज भी युगांडा में अफ्रीकी और भारतीय मूल के लोगों के बीच बराबरी नहीं है. ये बहुत अफ़सोस की बात है. आज भारतीय समुदाय को युगांडा में निवेशक के तौर पर देखा जाता है. आज फिर युगांडा में भारतीय समुदाय के लोगों को आर्थिक शोषण के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है. ममद अलीभाई कहते हैं कि युगांडा की युवा पीढ़ी बेसब्र है. उसे आज भी भारतीय समुदाय के साथ बराबरी नहीं दिखती. अफ्रीकी समुदाय के लोगों के बीच भारतीय समुदाय को लेकर नाराज़गी फिर से बढ़ रही है. जानकार आशंका जताते हैं कि हालात में बदलाव नहीं हुआ तो 60 और 70 के दशक जैसी स्थिति फिर से बन सकती है. हालांकि यास्मीन समेत बहुत से ऐसे लोग हैं जो युगांडा की युवा पीढ़ी की तरफ़ बहुत उम्मीद से देख रहे हैं.

Tuesday, July 17, 2018

चाहे सारी दुनिया समाप्त हो जाये पर हम समाप्त नहीं होंगें क्योंकि हम तो सनातनी हैं।

हमारे यहाँ बहुत ज्यादा प्रचार है कि हमारा धर्म सनातन है, ये कभी ख़त्म नहीं हो सकता। जब हम ये बात सुनते हैं तो निश्चित हो जाते हैं कि चाहे सारी दुनिया समाप्त हो जाये पर हम समाप्त नहीं होंगें क्योंकि हम तो सनातनी हैं और हम समाप्त होने वाले नहीं हैं। ये एक बेहद ही झूठा, बेहूदा और अनर्गल प्रचार है, जिसे हमारी कायरता ने पैदा किया है। ईसाई और मुसलमान, इन दो संप्रदाय के पैदा होने से पहले पूरे विश्व में केवल हम ही हम थे। अब जरा सोचो कि - आज हम है कहाँ ? हमारी स्थिति क्या है ? हमारा भूतकाल हमारे भविष्य को कितना भयावह बयां कर रहा है ? सभी नेताओं और पार्टियों (कोई विशेष नहीं) ने हम हिन्दुओं से हमारे विनाश के आँकड़े छुपा कर हमें पूर्ण रूप से मूर्ख बना दिया है। जब हिन्दुस्तान में प्रथम लुटेरे मोहम्मद बिन कासिम ने पहली बार हिन्दुओं को जीता तो उस समय पूरी दुनिया में 70 करोड़ हिन्दू और 15 लाख मुसलमान थे। जब अंग्रेजों ने हिन्दुस्तान का राज अपने हाथ में लिया तब हिन्दू लगभग 1000 साल में केवल 20 करोड़ रह गये थे। इसका अर्थ यह नहीं है कि 1000 साल में 50 करोड़ हिन्दुओं का क़त्ल हुआ, इसका अर्थ है कि 1000 साल में कम से कम 500 करोड़ हिन्दुओं का क़त्ल विदेशी लुटेरों ने किया था। हम अंग्रेजों की गुलामी को गुलामी बोलते है किन्तु सत्य तो यह है कि अंग्रेजों ने तो हमारी आज़ादी का मार्ग तैयार किया था। अगर अंग्रेज इस देश में ना आते तो हमारा हिन्दू के रूप में नामो-निशान अब तक मिट चुका होता। इस हिन्दुओं की पवित्र भूमि पर मदरसे और उर्दू ने गुरुकुल और संस्कृत का स्थान ले लिया था। ये बहुत बड़ा विषय है और हमारे व्हाट्स एप और फेसबुक के बेताज बादशाहों को इतनी बड़ी पोस्ट पढ़ने की आदत कम ही है। मैं आपको केवल इतना बताना चाहता हूँ कि झूठी डींगों के कारण आज हिन्दू विनाश की और बहुत तीव्रता से बढ़ रहा है। "हिन्दुओं अब तो धरातल पर आ जाओ और सच का सामना करो" आज अपनी ही भूमि पर हिन्दू संस्कृति अपने अंतिम दौर में है क्योंकि यहाँ बहुत जल्दी मुस्लिम जनसंख्या तथाकथित "अल्पसंख्यक" के स्थान पर "बहुसंख्यक" हो जाने वाली है और अगर एक बार भी ये हो गया तो स्वयं देवाधिदेव भगवान महादेव शिव और जगद्जननी माँ जगदम्बा भी हिन्दुओं को बचाने नहीं आने वाले क्योंकि कायरों का कोई नहीं होता, इसलिये मुर्ख हिन्दुओं भावनाओं में मत बहो। तुम्हारे पास आज अपने धर्म की रक्षा का समय है, जो कल नहीं होगा। फिर तुम्हारे हर बेटे का क़त्ल होगा और तुम्हारी हर बेटी का बलात्कार होगा और वो मंडी में बैठेगी। अबकी बार तुम्हें सर पकड़ कर रोने का भी समय नहीं मिलेगा। इसलिये सारे मुद्दे छोड़कर इस देश के नेताओं को "जनसंख्या नियंत्रण कानून" बनाने के लिये विवश कर दो और जब तक ये कानून नहीं बन जाता अपनी सारी ताकत बच्चे पैदा करने में लगा दो क्योंकि अगर एक भी तुम उन जिहादियों से कम हो गये तो तो तुम्हें तुम्हारे विनाश से कोई नहीं बचा सकेगा। "निर्णय तुम्हारा है!" हर हर महादेव

इस संसार का शाश्वत सत्य केवल "मृत्यु" ही है

इस संसार का शाश्वत सत्य केवल "मृत्यु" ही है, जीवन मे कुछ भी होना पूर्ण संभावित नहीं है जबकि मृत्यु होना 100% संभावित है। एक न एक दिन मृत्यु सभी को आनी है। इस सच्चाई को जानते हुए भी हम मृत्यु से घबराते हैं। शरीर से प्राण निकलने के भी कई कारण होते हैं। यदि आध्यात्मिक रूप से देखा जाए तो मृत्यु का अर्थ है शरीर से प्राण अर्थात आत्मा का निकल जाना। इसके बिना शरीर सिर्फ भौतिक वस्तु रह जाता है। इसे ही मृत्यु कहते हैं। जबकि विज्ञान की दृष्टि से मृत्यु का अर्थ कुछ भिन्न है। उसके अनुसार शरीर में दो तरह की तरंगें होती हैं - पहली भौतिक तरंग और दूसरी मानसिक तरंग। जब किसी कारणवश इन दोनों का संपर्क टूट जाता है तो व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। साधारणत: मृत्यु 3 प्रकार से होती है - भौतिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक। किसी दुर्घटना या बीमारी से मृत्यु का होना भौतिक कारण की श्रेणी मे आता है। इस समय भौतिक तरंग अचानक मानसिक तरंगों का साथ छोड़ देती है और शरीर प्राण त्याग देता है। जब अचानक किसी ऐसी घटना-दुर्घटना के बारे मे सुनकर, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, मृत्यु होती है तो ऐसे समय मे भी भौतिक तरंगें मानसिक तरंगों से अलग हो जाती है और व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। यह मृत्यु का मानसिक कारण है। मृत्यु का तीसरा कारण आध्यात्मिक है। आध्यात्मिक साधना मे मानसिक तरंग का प्रवाह जब आध्यात्मिक प्रवाह मे समा जाता है, तब व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है क्योंकि भौतिक शरीर अर्थात भौतिक तरंग से मानसिक तरंग का तारतम्य टूट जाता है। ऋषि मुनियों ने इसे महामृत्यु कहा है। धर्म ग्रंथों के अनुसार महामृत्यु के बाद नया जन्म नहीं होता और आत्मा जीवन-मरण के बंधन से मुक्त हो जाती है। शस्त्रमेव जयते हर हर महादेव

आधी उर्दू आधा इस्लाम

अगर आपका किसी उर्दू वाले से पाला पड़ा है तो आपने पाया होगा कि उर्दू वाले का उच्चारण कुछ अजीब सा होता है। वो आधी ध्वनियों को पूरा बोलता है। क्लब को किलब, प्रचार को परचार, सरस्वती को सरसुती, प्रजातंत्र को परजा तंतर, ऐसे सैकड़ों उदाहरण दिए जा सकते हैं। कभी इस्लाम के वामपंथी मुखौटे जावेद अख़्तर को, घनघोर मुल्ला ओवैसी भाइयों को टीवी पर बोलते सुनिये। आपको उच्चारण का यह बहुत भौंडा अंतर तुरन्त समझ आ जायेगा। इसका कारण उर्दू वालों से पूछिये तो जवाब मिलता है कि उर्दू में आधे हर्फ़ नहीं लिखे जाते हैं अतः पढ़े-बोले भी नहीं जाते हैं। यहाँ एक तार्किक बात सूझती है कि हर्फ़ को हरफ़ तो नहीं बोला जाता। उर्दू के दो अक्षर स्वाद, ज़्वाद सवाद या सुवाद और ज़वाद नहीं बोले जाते अर्थात आधी ध्वनि लिख न पाने का बहाना झूठ है तो फिर क्या कारण है कि उर्दू वाले दूसरी भाषाओँ के उच्चारण बिगाड़ कर बोलते हैं! आपने कभी कुत्ता पाला है ? न पाला हो तो किसी पालने वाले से पूछियेगा। जब भी कुत्ते को घुमाने ले जाया जाता है तो कुत्ता सारे रास्ते इधर-उधर सूंघता हुआ और सूंघे हुए स्थानों पर पेशाब करता हुआ चलता है। स्वाभाविक है कि यह सूझे यदि कुत्ते को पेशाब आ रहा है तो एक बार में क्यों फ़ारिग़ नहीं होता, कहीं उसे पथरी तो हो नहीं गयी है ? फिर हर कुत्ते को पथरी तो नहीं हो सकती तो उसका पल-पल धार मारने का क्या मतलब है ? मित्रो! कुत्ता वस्तुतः पेशाब करके अपना इलाक़ा चिन्हित करता है। यह उसका क्षेत्र पर अधिकार जताने का ढंग है। बताने का माध्यम है कि यह क्षेत्र मेरी सुरक्षा में है और इससे दूर रहो अन्यथा लड़ाई हो जाएगी। उर्दू वालों का अन्य भाषाओं के शब्दों को उनकी मूल ध्वनियों की जगह बिगाड़ कर बोलना कहीं उन भाषाओं, उनके बोलने वालों में अपना इलाक़ा चिन्हित करना तो नहीं है! ईसाई विश्व का एक समय सबसे प्रभावी नगर कांस्टेंटिनोपल था। 1453 में इस्लाम ने इस नगर को जीता और इसका नाम इस्ताम्बूल कर दिया। स्वाभाविक ही मन में प्रश्न उठेगा कि कांस्टेंटिनोपल में क्या तकलीफ़ थी जो उसे इस्ताम्बूल बनाया गया! बंधुओ, यही इस्लाम है। सारे संसार को, संसार भर के हर विचार को, संसार भर की हर सभ्यता को, संसार भर की हर आस्था को मारकर, तोड़कर, फाड़कर, छीनकर, जीतकर, नोचकर, खसोटकर येन-केन-प्रकारेण इस्लामी बनाना ही इस्लाम का लक्ष्य है। रामजन्भूमि, काशी विश्वनाथ के मंदिरों पर पर इसी कारण मस्जिद बनाई जाती है। कृष्ण जन्मभूमि का मंदिर तोड़ कर वहां पर इसी कारण ईदगाह बनाई जाती है। पटना को अज़ीमाबाद इसी कारण किया जाता है। अलीगढ, शाहजहांपुर, मुरादाबाद, सहारनपुर और ऐसे ही सैकड़ों नगरों के नाम वाराणसी, मथुरा, दिल्ली, अजमेर चंदौसी, उज्जैन जैसे सैकड़ों नगरों में छीन कर भ्रष्ट किये गए मंदिर इन इस्लामी करतूतों के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। इस्लाम अपने अतिरिक्त हर विचार, जीवन शैली से इतनी घृणा करता है कि उसे नष्ट करता आ रहा है, नष्ट करना चाहता है। इसका इलाज ही यह है कि समय के पहिये को उल्टा घुमाया जाये। इन सारे चिन्हों को बीती बात कह कर नहीं छोड़ा जा सकता क्योंकि इस्लामी लोग अभी भी उसी दिशा में काम कर रहे हैं। बामियान के बुद्ध, आई एस आई एस द्वारा सीरिया के प्राचीन स्मारकों को तोड़ा जाना आज भी चल रहा है। इस्लामियों के लिये उनका हत्यारा चिंतन अभी भी त्यागने योग्य नहीं हुआ है, अभी भी कालबाह्य नहीं हुआ है। अतः ऐसी हर वस्तु, मूर्ति, चित्र, मंदिर, नगर, आस्था हमें वापस चाहिये। धर्मावलंबियों! इसका दबाव बनाना प्रारम्भ कीजिये। सोशल मीडिया पर, निजी बातचीत में, समाचारपत्रों में जहाँ बने जैसे बने इस बात को उठाते रहिये। यह दबाव लगातार बना रहना चाहिए। पेट तो रात-दिन सड़कों पर दुरदुराये जाते हुए पशु भी भर लेते हैं। मानव जीवन गौरव के साथ, सम्मान के साथ जीने का नाम है। हमारा सम्मान छीना गया था। समय आ रहा है, सम्मान वापस लेने की तैयारी कीजिये। हर हर महादेव

Friday, July 13, 2018

सफलता की नई शुरुवात आज ही करे

6-8 महीने का बच्चा घिसकना शुरू करता है। उसके बाद वो एक साल के आसपास चलना शुरू करता है। गिरता है फिर कोशिश करता है फिर गिरता है फिर कोशिश करता है लेकिन कोशिश करना बंद नही करता है। हम सब क्या करते हैं? वाह शाबास, आजा, वाह-वाह, भेरी गुड बेहतरीन शाबास अच्छा कर रहा है शानदार या ये कहते है कि बच्चे तुम चलो नही वरना गिर जावोगे मत चलो वरना चोट लग जायेगी। असफलता किसी भी सफलता की नींव है। आज हम क्यो भूल रहे है अपने बचपन की ये कोशिशें? क्यो अपने बचपन की बाते भूलते जा रहे है? हम क्यो भूलते जा रहे है कि असफलता ही सफलता की पहली सीढ़ी है। तो मित्रो उठो आज अपने बेहतर दिन की ही नही अपने जीवन की भी एक नई शुरुवात करो। आज से ही करो अभी से करो। खुद को शाबासी दो बोलो खुद को शाबाश मेरे शेर उठ जा आज चल अपने जीवन का नया आगाज कर।

पाचन तंत्र को जल्दी ठीक करने के उपाय

पाचन तंत्र को जल्दी ठीक करने के उपाय 1. अधिक मात्रा में पानी पीये –  हमारे लिए पानी बहुमूल्य है. अधिकतर लोग बहुत कम पानी पीते है. हमें एक दिन में लगभग 2 लीटर पानी पीना चाहिए. अगर आपका पाचन तन्त्र ठीक नहीं है तो आप इसे अधिक पानी भी पी सकते है. यह हमारे शरीर में पानी की मात्रा को पूरा करता है जिससे भोजन को पचने में आसानी होती है. इसलिए पानी पीये और भरपूर पीये. 2. अपनी दिनचर्या सही रखे – मनुष्य के लिए एक अच्छी दिनचर्या का होना बहुत आवश्यक है. अगर आपकी दिनचर्या संतुलित नहीं है तो आपको दिनभर कई छोटी – छोटी समस्याओ का सामना करना पड़ेगा. पाचनतंत्र को आप बेहतर दिनचर्या से दूर कर सकते हो. सुबह से लेकर रात सोने तक अपनी दिनचर्या सही रखे. सही समय पर अपना भोजन ले.  अगर आपका daily routine ठीक होगा तो आपका शरीर भी उसी अनुसार चलता रहेगा. जिससे पाचन तन्त्र भी दुरुस्त हो जाएगी. 3. रात को जल्दी सो जाए- कई लोग काम के चलते और कई अपनी बुरी दिनचर्या (Dincharya) के कारण देर रात जगे रहते है. वे जल्दी सोते नहीं और सुबह लेट में उठते है. देर रात तक जगे रहने से पाचन तन्त्र पर विपरीत प्रभाव पड़ता है. इसलिए रात को भोजन करने के बाद सो जाए. अगर देर रात तक जगे रहोगे तो आपका पाचन तंत्र का ख़राब होना तय है. इससे बचने का उपाय है की रात को देर से सोने की आदत को बदला जाए. 4.अच्छी नींद ले – नींद का हमारे शरीर से गहरा नाता है. जिस तरह हमारे लिए भोजन करना जरुरी है ठीक उसी तरह हमारे लिए नींद भी जरुरी है. बिना अच्छी नींद के अच्छे स्वास्थ्य की कल्पना करना भी मुश्किल है. कई लोग खुद को ओवर स्मार्ट समझते है और सोचते है की कम नींद लेने पर भी वे खुद को फिट रख सकते है. आप कुछ दिन तक तो ऐसा कर सकते हो पर long time में आपकी helth ख़राब हो ही जाएगी. एक दिन में इसलिए 8 से 9 घंटे की अच्छी नींद जरुर ले. 5. तनाव को करे दूर – तनाव आज लोगो का बहुत बड़ा दुश्मन बन गया है. तनाव आदमी को अन्दर ही अन्दर दीमक की तरह खोखला कर देता है. जिससे व्यक्ति कई रोगों से घिर जाता है. अधिक तनाव लेने से पाचन तन्त्र ख़राब हो जाता है. इसलिए तनाव को अपनी लाइफ से दूर करे. 6. फास्ट फ़ूड को कहे अलविदा–   स्वाद हर कोई लेना चाहता है. इस स्वाद के चक्कर में हम लोग फास्ट फ़ूड खाने लगते है. किसी को यह कम पसंद होता है तो किसी को ज्यादा. जिसको यह ज्यादा पसंद होता है वह ख़राब पाचन तन्त्र का शिकार बन जाता है. महीने में कभी – कभी तो फ़ास्ट फ़ूड (fast food) चल सकता है. लेकिन अगर आप रोजाना फ़ास्ट फ़ूड लेते हो तो इसका नेगेटिव इफ़ेक्ट आपको दिखने लग जायेगा. इसका सेवन बहुत कम मात्रा में ले और इसकी जगह helthi food ले. 7. शारारिक कार्य जरुर करे – अधिकतर पाचन तन्त्र ख़राब उन्ही लोगो का होता है जो शारारिक काम नहीं करते है. ऐसे बहुत से लोग होते है जिनका काम शारारिक नहीं होता. ऐसे लोग अपनी दिनचर्या में कुछ शारारिक काम कर सकते है. अगर काम नहीं है तो वे सुबह उठकर टहल सकते है. पैदल घूम सकते है या दौड़ लगा सकते है. इसके अलावा कोई  स्पोर्ट्स या साइकिलिंग कर सकते है. 8. सही समय पर रोजाना भोजन करे – सही समय पर भोजन करना अच्छी सेहत की निशानी होती है. ब्रेकफास्ट से लेकर डिनर तक आपका खाना खाने का time निश्चित होना चाहिए. हमारा शरीर हमारे डेली रूटीन के हिसाब से खुद को ढाल लेता है. अगर हम कभी 1 घंटे पहले कभी एक घंटे बाद खाना खाये तो हमारा भोजन रोज अनियमित हो जाएगा.  जो हमारे पाचन तन्त्र को गड़बड़ा देता है. माना आप सुबह 8 बजे अपना Breakfast लेते हो तो रोज उसी time पर ले. ऐसा हो Lunch और dinner पर भी करे. 9. खाने – पीने में कमी न करे –  यह बहुत लोगो की problem होती है की जब उनको तेज भूख लगती है तब वे कुछ नहीं खाते और जब भूख न हो तब पेट में कुछ न कुछ ठुसते रहते है. जो गलत है, अगर आप खाने – पीने में कमी करोगे तो आपकी सेहत बनना मुश्किल है. जब भी आपको भूख लगती है तब खुद को न रोके. उस समय कुछ खा लें. भूख के समय शरीर को भोजन दो तो पाचन तन्त्र भी अच्छा बना रहेगा. 10. शराब और सिगरेट से दूर रहे- शराब और सिगरेट हमारे Helth के लिए ठीक नहीं होते यह शायद आपको बताने की जरुरत नहीं है. यह आप जानते हो फिर भी जानने के बावजूद लोग इसका सेवन करते रहते है. इनका लगातार सेवन करते रहने से हमारा पाचन तन्त्र ख़राब हो जाता है और कई बीमारियाँ भी घेर देती है. इसके अलावा चाय और कॉफ़ी से भी दूरी बनाये रखे. 11. अधिक खाना खाने से बचे – आवश्यकता से अधिक भोजन लेना हमारे स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं होता. अधिक खाने से हमें अपच हो सकती है. जितनी भूख हो हमें उतना ही खाना चहिये. कई बार लोग स्वाद के चक्कर में अधिक खाना खा लेते है और बाद में उन्हें पछताना पड़ता है. आप ऐसा न करे. खाने से ज्यादा प्राथमिकता अपने शरीर को दे. अधिक खाना लेने से हमारे पाचन तन्त्र पर अधिक दबाव पड़ता है जो की उचित नहीं है. ऐसा करने से इसलिए बचे. 12. हमेशा बैठे – बैठे काम न करे- अगर आपका काम ऑफिस का है, आपको कंप्यूटर के आगे या कुर्सी पर बैठकर काम करना पड़ता है तो आप बीच – बीच में ब्रेक लेते रहे. अगर आपको लगातार काम करना होता है तो हर दो घंटे में कुछ मिनट निकाल कर थोड़ा टहल ले. बैठे रहने से हमारा भोजन पच नहीं पाता फलस्वरूप हमारे पाचन तन्त्र के लिए इसे  हैंडल कर पाना मुश्किल हो जाता है. 13. ऑयली खाने से परहेज करे– ज्यो हमारी उम्र बढती जाती है.. हमारे लिए ऑयली खाने को पचा पाना मुश्किल होने लग जाता है. अगर हम Oily  खाना ज्यादा खा लेते है तो इससे हमें उल्टी, अपच और खट्टी डकारे हो सकती है. इनसे बचने के लिए जरुरी है कि इन चीजो को बहुत ही कम मात्रा में खायें. ऑयली खाना पचा पाना थोड़ा मुश्किल रहता है. इसलिए अपने पाचन तंत्र की मदद करे और तैलीय खाना कम ही खाएं. 14. वसायुक्त भोजन लेने से बचे- उन चीजो को लेने से बचे जिनमे बहुत ज्यादा Fat होता है. वसा युक्त पदार्थ हमारे पाचन क्रिया को Slow कर देता है. अगर पाचन तंत्र स्लो रहेगा तो भोजन पचने में भी समय लगेगा. जितना हो सके बेहतर पाचन तन्त्र के लिए वसायुक्त भोजन कम ही ले. *15. रोजाना व्यायाम करे* – व्यायाम करना हमारी body के लिए बहुत लाभदायक होता है. रोजाना Exercise को अपनी दिनचर्या में शामिल करे. डेली एक्सरसाइज करने से हमें खाना बेहतर रूप से पचता है. इसके अलावा यह हमारे वजन का सही स्तर बनाये रखता है जो हमारे digestive health के लिए अच्छा है. इसलिए रोजाना एक्सरसाइज करे और एक अच्छी सेहत बनाये. पाचन शक्ति बढ़ाने के लिए इन चीजो का सेवन इलायची का सेवन- इलायची का सेवन एक गर्भवती महिला के लिए बहुत लाभकारी होता है. यह गर्भवती स्त्री के पाचन सम्बन्धी परेशानियों को दूर करता है. आप इलायची को चाय के साथ के सकते है निम्बू ले– नींबू हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभकारी होता है. इसका सेवन करते रहने से यह हमारे पेट की कई समस्याएँ दूर कर देता है. नींबू हमारी बदहजमी और पेट की गैस को दूर करता है. यह हमारे पाचन शक्ति के लिए भी लाभकारी होता है. सलाद का सेवन करे- खाने में अगर सलाद हो तो खाने का मजा दोगुना बढ़ जाता है. सलाद अच्छे खाने के साथ – साथ हमारे हेल्थ के लिए भी अच्छा है. खाने को अगर अच्छी तरह पचाना है तो खाने के साथ सलाद भी ले. जिसमे आप नींबू, टमाटर और प्याज ले सकते है. अमरुद खाएं- अमरुद एक बहुत ही उपयोगी फल है जो पौष्टिक होता है. अमरुद में विटामिन सी, फास्फोरस और पौटेशियम पाया जाता है जो स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है. अमरुद के सेवन करते रहने से मस्तिष्क, ह्रदय और पाचन शक्ति मजबूत बनती है. सौंफ का प्रयोग करे एसिडिटी को दूर करने के लिए, सीने की जलन कम करने के लिए और खाना अच्छी तरह पचाने के लिए आप सौफ ले सकते है. रोजाना एक एक चम्मच सौंफ लेने से पाचन क्रिया सही बनी रहती है. एलोवेरा ले- पाचन क्रिया को मजबूत बनाने के लिए एलोवेरा का इस्तेमाल करे. एलोवेरा हमारी पाचन सम्बन्धी रोगों को दूर करता है जिसमे सुजन और पेट का अल्सर शामिल है.पानी के साथ आप एलोवेरा जेल का इस्तेमाल कर सकते हो. हल्दी का प्रयोग करे – हल्दी हमारे शरीर के अपच, अल्सर,पित्त निकालने और पाचन से सम्बन्धित अन्य समस्याओ को दूर करता है. पाचन सम्बन्धी समस्याएँ दूर करने के लिए एक ग्लास पानी के साथ हल्दी लेते रहे. आंवले लेते रहे– आंवला हमारे शरीर में विटामिन सी की कमी को दूर करता है. आवले का लगातार सेवन करते रहने से यह हमारे पाचन तन्त्र को ख़राब होने से बचाता है. आंवले को पिस करके उसमे काली मिर्च, हींग और जीरा मिला कर भी आप ले सकते है. पपीता का सेवन- कच्चा पपीता सेहत के लिए बहुत अच्छा है. आंत की कमजोरी के कारण शरीर में विटामिन्स का संचय नहीं होता है तो हम पपीते के सेवन से विटामिन सी प्राप्त कर सकते हैं. इसमें पपाइन होता है जो कि प्रोटीन को विभाजित करता है और खाने को पाचन योग्य बनाता है और पाचन क्रिया को प्रबल बनाता हैं. केला खाएं – केला हर मौसम और हर सीजन में मिल जाता है. यह हमारे पेट के लिए बहुत better है. सस्ता होने के साथ – साथ यह हमारे पाचन शक्ति को भी बढाता है. इसलिए केला खाएं और अपनी सेहत बनाये. इसके अलावा भी आप अपने भोजन में मूंग, अंकुरित चना, गेहूं और जौ की रोटियां शामिल करे और इन फलों को आम, अनार, अंजीर, अमरूद और संतरे को लेते रहे. ये फल आपके पेट को साफ़ रखेंगे जिससे आपका पाचन तन्त्र मजबूत बनेगा. पाचन शक्ति को दुरुस्त करने के अन्य घरेलू नुस्खे– अपने भोजन को हमेशा चबा – चबा कर खाएं जिससे भोजन अच्छी तरह पचे. दही का सेवन हमारे पाचन के लिए अच्छा होता है. खाने में दही शामिल करे. मीठे अनार का रस मुँह में लेने से आंत दोष ठीक होता है और पाचन शक्ति बढती है. अजवाइन को पानी में उबाल कर पीने से भी पाचन तंत्र सही रहता है. रोजाना 3 ग्राम काली राई लेने से कब्ज वाली बदहजमी दूर हो जाती है. अनन्नास का रस हमारे पाचन के लिए लाभदायी होता है. अमरूद के पत्तों में शक्कर मिलाकर सेवन करने से बदहजमी दूर हो जाती है. हरड़ का मुरब्बा भी हमारे पाचन के लिए अच्छा होता है. नींबू पर काला नमक लगाकर चाटते रहे इससे बदहजमी दूर हो जाएगी. हींग का उपयोग करे.. इसका प्रयोग बदहजमी और गैस को दूर करने के लिए किया जाता है. लेख पढ़ने के बाद इसके लिंक को अपने व्हाट्सअप ग्रुप में जरूर शेयर करे। अरुण मिश्रा

🌻हींग के प्रयोग 🌻

🕉दांतों में कीड़ा लग जाने पर रात्रि को दांत में हींग दबाकर सोएं। कीड़े खुद-ब-खुद निकल जाएंगे। 🕉यदि शरीर के किसी हिस्से में कांटा चुभ गया हो तो उस स्थान पर हींग का घोल भर दें। कुछ समय में कांटा स्वतः निकल आएगा। 🕉हींग में रोग-प्रतिरोधक क्षमता होती है। दाद, खाज, खुजली व अन्य चर्म रोगों में इसको पानी में घिसकर उन स्थानों पर लगाने से लाभ होता है। 🕉 हींग का लेप बवासीर, तिल्ली व उदरशोथ में लाभप्रद है। 🕉कब्जियत की शिकायत होने पर हींग के चूर्ण में थोड़ा सा मीठा सोड़ा मिलाकर रात्रि को फांक लें, सबेरे शौच साफ होगा। 🕉पेट के दर्द, अफारे, ऐंठन आदि में अजवाइन और नमक के साथ हींग का सेवन करें तो लाभ होगा। 🕉 पेट में कीड़े हो जाने पर हींग को पानी में घोलकर एनिमा लेने से पेट के कीड़े शीघ्र निकल आते हैं। 🕉जख्म यदि कुछ समय तक खुला रहे तो उसमें छोटे-छोटे रोगाणु पनप जाते हैं। जख्म पर हींग का चूर्ण डालने से रोगाणु नष्ट हो जाते हैं। 🕉प्रतिदिन के भोजन में दाल, कढ़ी व कुछ सब्जियों में हींग का उपयोग करने से भोजन को पचाने में सहायक होती है। 🕉 ये सभी फायदे असली हींग से मिलते हैं, सामान्य तौर पर प्रयोग की जाने वाली बँधानी हींग केवल नाम के लिए हींग होती है, उसमे कोई गुण नही होता। अरुण मिश्र

उबलतें दूध में जब डाली जाती हैं तुलसी की पत्तियाँ तो होता है चमत्कार - Tulsi with Milk

🌿 घरेलू नुस्खे बिना किसी साइड इफेक्ट के कई बीमारियों को दूर करते हैं। पीढि़यों से चले आ रहे ये नुस्खे हमेशा से फायदेमंद साबित हुए है और शायद आगे भी होते रहेंगे। ऐसे ही कुछ टिप्स तुलसी को लेकर भी है। तुलसी एक ऐसा हर्ब है जो कई समस्याओं को आसानी से दूर कर सकती है। सर्दी जुकाम हो या सिरदर्द तुलसी का काढ़ा बनाकर पीने से लाभ मिलता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि तुलसी को अगर दूध के साथ मिला लिया जाये तो ये कई बीमारियों के लिए रामबाण साबित होती है। आज हम आपको बता रहे हैं कैसे तुलसी की तीन से चार पत्तियां उबलते हुए दूध में डालकर खाली पेट पीने से आप सेहतमंद रह सकते हैं। किडनी की पथरी में यदि किडनी में पथरी की समस्या हो गई हो और पहले दौर में आपको इसका पता चलता है तो तुलसी वाला दूध का सेवन सुबह खाली पेट करना शुरू कर दें। इस उपाय से कुछ ही दिनों में किडनी की पथरी गलकर निकल जाएगी। आपको इस समस्या से छुटकारा मिल जाएगा। दिल की बीमारी में यदि घर में किसी को दिल से सबंधित कोई बीमारी है या हार्ट अटैक पड़ा हो तो आप तुलसी वाला दूध रोगी को सुबह के समय खाली पेट पिलाएं। इससे दिल से संबंधित कई रोग ठीक होते हैं। सांस की तकलीफ में सांस की सबसे खतरनाक समस्या है दमा। इस रोग में इंसान को सांस लेने में बड़ी परेशानी आती है। खासतौर पर तब जब मौसम में बदलाव आता है। इस समस्या से बचने के लिए जरूरी है कि आप दूध और तुलसी का सेवन करें। नियमित इस उपाय को करने से सांस से संबंधित अन्य रोग भी ठीक हो जाएगें। कैंसर की समस्या एंटीबायोटिक गुणों की वजह से तुलसी कैंसर से लड़ने में सक्षम होती है। दूध में भी कई तरह के गुण होते हैं जब दोनों आपस में मिलते हैं तो इसका प्रभाव बेहद प्रभावशाली और रोग नाशक हो जाता है। यदि आप नियमित तुलसी वाला दूध पीते हैं तो कैंसर जैसी बीमारी शरीर को छू भी नहीं सकती है। फ्लू वायरल फ्लू होने से शरीर कमजोर हो जाता है। यदि आप दूध में तुलसी मिलाकर सुबह खाली पेट इसका सेवन करते हो ता आपको फ्लू से जल्दी से आराम मिल जाएगा। टेंशन में अधिक काम करने से या ज्यादा जिम्मेदारियों से अक्सर हम लोग टेंशन में आ जाते हैं एैसे में हमारा नर्वस सिस्टम काम नहीं कर पाता है और हम सही गलत का नहीं सोचते हैं। यदि इस तरह की समस्या से आप परेशान हैं तो दूध व तुलसी वाला नुस्खा जरूर अपनाएं। आपको फर्क दिखने लगेगा। सिर का दर्द और माइग्रेन में सिर में दर्द होना आम बात है। लेकिन जब यह माइग्रेन का रूप ले लेती है तब सिर का दर्द भयंकर हो जाता है। ऐसे में सुबह के समय तुलसी के पत्तों को दूध में डालकर पीना चाहिए। यह माइग्रेन और सिर के सामान्य दर्द को भी ठीक कर देती है। अक्सर हमारे घर में बहुत सी प्राकृतिक औषधियां होती है जिनके बारे में पता रहने से हम मंहगी दवाओं से होने वाले साइड इफेक्ट से बच सकते हैं। यह मैसेज अगर आपको अच्छा लगे या समझ में आये की यह किसी के लिया रामबाण की तरह काम आएगा तो आप से ?निवेदन है कि इस मैसेज के लिंक को अपने परिचित /मित्र/ या आपके व्हाट्स एप्प ग्रुप फ्रेंड्स तक भेज दे । आपका यह कदम स्वस्थ भारत के निर्माण में योगदान के रूप में होगा प्रार्थना मैं बड़ी ताकत स्वस्थ रहो मस्त रहो व्यस्त रहो और सदा खुश रहो नोट :-अगर आपको प्रतिदिन हेल्थ पोस्ट हमारे द्वारा भेजी जाती है और आपको हमारी पोस्ट अच्छी लगती है तो प्लीज आप अपने किसी ग्रुप मे फोरवरड करे ताकि आपके साथ लोगो को भी फायदा पहुच सके। अरुण मिश्रा

कलाकार जामुन के कुछ अलग गुण

बरसात में जामुन खाने से होता है इन सारी बीमारियों का इलाज सामान्यत: बरसात के मौसम में आने वाला फल जामुन सेहत के लिए बहुत लाभदायक होता है। जामुन अम्लीय प्रवृति वाला होता है यही कारण है कि जामुन को नमक के साथ खाया जाता है। जामुन में ग्लूकोज और फ्रक्टोज पाया जाता है।जामुन में आयरन, विटामिन और फाइबर भी पाया जाता है इसमें खनिजों की मात्रा अधिक होती है। इसके बीज में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और कैल्शियम पाया जाता है। जामुन के इन्हीं गुणों के कारण हम आपको बताने जा रहे हैं जामुन से जुड़े कुछ खास नुस्खे जो रोगों में रामबाण की तरह काम करते हैं। गठिया के उपचार में भी जामुन बहुत उपयोगी है। इसकी छाल को खूब उबालकर बचे हुए घोल का लेप घुटनों पर लगाने से गठिया में आराम मिलता है। गले के रोगों में जामुन की छाल को बारीक पीसकर सत बना लें। इस सत को पानी में घोलकर 'माउथ वॉश' की तरह गरारा करना चाहिए। इससे गला तो साफ होगा ही, साँस की दुर्गंध भी बंद हो जाएगी और मसूढ़ों की बीमारी भी दूर हो जाएगी। जामुन का गूदा पानी में घोलकर या शरबत बनाकर पीने से उल्टी, दस्त, जी-मिचलाना, खूनी दस्त और खूनी बावासीर में लाभ होता है। है। जामुन की गुठली के चूर्ण 1-2 ग्राम पानी के साथ सुबह लेने से मधुमेह रोग ठीक हो जाता है।

Tuesday, July 10, 2018

जो अकेले रहते हैं,उनकी सेहत के लिए।

जो अकेले रहते हैं,उनकी सेहत के लिए। अपने साथ भुने चने भुनी मूंगफली चावल के मुरमुरे मक्की के पीले परमल रखें। जब भूख लगे,खाएं। सुबह या कभी भी जब मन करे,दूध की जगह Amul या पतंजलि के मिल्क पौडर की 3-4 चम्मच ऐसे ही खा लिया करें। छाछ हर जगह मिलती है,आधा लीटर दिन में एक बार कभी भी पानी की जगह ले लिया करें,केल्शियम की पूर्ति होगी,एसिडिटी नहीं होगी। जब मन या समय हो मौसम के 2 सस्ते फल रोज बदल बदल कर खाएं,छुरी अपने साथ रखें। जलजीरा के 2 पाउच हमेशा अपने साथ रखें,दिन में कभी भी पानी में घोलें और पियें। नाश्ते में कभी कुछ न हो तो 4 पिस्ता 4 बादाम 2 अखरोट 8 किशमिश बहुत धीरे धीरे चबा कर खा लिया करें। घर में सूखा नारियल और गुड़ हमेशा रखें,जब मन हो या कुछ खाने की इच्छा हो,नारियल के टुकड़े के साथ थोड़ा गुड़ खा लें। बिस्कुट,नमकीन,कचौड़ी, समोसे से बचें। साथियों की परवाह न कर जब भी खाना खाएं,उसके साथ टमाटर प्याज धनिया हरा लहसुन हरी मिर्च जो मिले और अच्छा लगे,सलाद के तौर पर खाएं। मुरब्बे वाला एक आंवला रोज, नीबू किसी भी रूप में एक रोज रात को सोते समय एक चम्मच त्रिफला रोज व सुबह व रात को पतंजलि का मंजन करने का नियम बना लें। नहाने के बाद सिर में नाक में नाभि में सरसों का तेल लगाएं। रोज एक घण्टा अच्छा साहित्य पढ़ें। मन्दिर जाएं। सुबह,शाम घूमने जाएं। सुबह घर में भजन या जो संगीत अच्छा लगे बजाएं। सम्भव हो तो बदल बदल कर दूध दलिया दाल दलिया सब्जी दलिया स्वयं बनाकर खाएं। कुकर स्टील का ही लें। RO का पानी,कोई भी कोल्ड ड्रिंक, आइसक्रीम बिल्कुल न लें। 30 दिन में आपको स्वयं में परिवर्तन लगेगा।

रैन बसेरा

राजा परीक्षित को भागवत् सुनाते हुए जब शुकदेव को छः दिन बीत गये और सर्प के काटने से मृत्यु होने का एक दिन रह गया तब भी राजा का शोक और मृत्यु भय दूर न हुआ। कातर भाव से अपने मरने की घड़ी निकट आती देखकर राजा क्षुब्ध हो रहा था। शुकदेव जी ने राजा को एक कथा सुनाई - राजन् बहुत समय पहले की बात है। एक राजा किसी जंगल में शिकार खेलने गया। संयोगवश वह रास्ता भूलकर बड़े घने जंगल में जा निकला, रात्रि हो गई। वर्षा पड़ने लगी। सिंह व्याघ्र बोलने लगे। राजा बहुत डरा और किसी प्रकार रात्रि बिताने के लिए विश्राम का स्थान ढूँढ़ने लगा। कुछ दूर पर उसे दीपक दिखाई दिया। वहाँ पहुँचकर उसने एक गन्दे बीमार बहेलिये की झोंपड़ी में ही एक ओर उसने मल-मूत्र त्यागने का स्थान बना रखा था। अपने खाने के लिये जानवरों का माँस उसने झोंपड़ी की छत पर लटका रखा था। बड़ी गन्दी, छोटी, अन्धेर और दुर्गन्ध युक्त वह कोठरी थी। उसे देखकर राजा पहले तो ठिठके पर पीछे उसने और कोई आश्रय न देखकर विवशता वश उस बहेलिये से अपनी कोठरी में रात भर ठहर जाने देने के लिए प्रार्थना की। बहेलिये ने कहा- आश्रय हेतु कुछ राहगीर कभी-कभी यहाँ आ भटकते हैं और मैं उन्हें ठहरा लेता हूँ। लेकिन दूसरे दिन जाते समय वे बहुत झंझट करते हैं। इस झोंपड़ी की गन्ध उन्हें ऐसी भा जाती है कि फिर उसे छोड़ना ही नहीं चाहते। इसी में रहने की कोशिश करते हैं और अपना कब्जा जमाते हैं। ऐसे झंझट में मैं कई बार पड़ चुका हूँ। अब किसी को नहीं ठहरने देता। आपको भी इसमें नहीं ठहरने दूँगा।” राजा ने प्रतिज्ञा की, कसम खाई कि वह दूसरे दिन इस झोंपड़ी को अवश्य खाली कर देगा। उसका काम तो बहुत बड़ा है। यहाँ तो वह संयोगवश ही आया है। सिर्फ एक रात ही काटनी है। बहेलिये न अन्यमनस्क होकर राजा को झोंपड़ी के कोने में ठहर जाने दिया, पर दूसरे दिन प्रातःकाल ही बिना झंझट किये झोंपड़ी खाली कर देने की शर्त की फिर दुहरा दिया। राजा एक कोने में पड़ा रहा। रात भर सोया। सोने में झोंपड़ी की दुर्गन्ध उसके मस्तिष्क में ऐसी बस गई कि सवेरे उठा तो उसे वही सब परमप्रिय लगने लगा। राज-काज की बात भूल गया और वहीं निवास करने की बात सोचने लगा। प्रातःकाल जब राजा और ठहरने के लिये आग्रह करने लगा तो बहेलिये ने लाल पीली आँखें निकाली और झंझट शुरू हो गया। झंझट बढ़ा। उपद्रव और कलह का रूप धारण कर लिया। राजा मरने मारने पर उतारू हो गया। उसे छोड़ने में भारी कष्ट और शोक अनुभव करने लगा। शुकदेव जी ने पूछा - परीक्षित बताओ, उस राजा के लिए क्या यह झंझट उचित था ? परीक्षित ने कहा - भगवान वह कौन राजा था, उसका नाम तो बताइए। वह तो बड़ा मूर्ख मालूम पड़ता है कि ऐसी गन्दी कोठरी में अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर राज-काज छोड़कर, नियत अवधि से भी अधिक रहना चाहता था। उसकी मूर्खता पर तो मुझे भी क्रोध आता है। शुकदेव जी ने कहा - परीक्षित वह और कोई नहीं तुम स्वयं हो। इस मल मूत्र की कोठरी देह में जितने समय तुम्हारी आत्मा को रहना आवश्यक था वह अवधि पूरी हो गई। अब उस लोक को जाना है जहाँ से आप आये थे। इस पर भी आप झंझट फैला रहे हैं। मरना नहीं चाहते एवं मरने का शोक कर रहे हो। क्या यह उचित है ? राजा ने कथा के मर्म को स्वयं पर आरोपित किया एवं मृत्यु भय को भुलाते हुए मानसिक रूप से निर्वाण की अपनी तैयारी कर ली। अंतिम दिन का कथा श्रवण उन्होंने पूरे मन से किया। वस्तुतः मरने के लिये हर मानव हो हर घड़ी तैयार रहना चाहिये। यह शरीर तो कभी न कभी विनष्ट होना ही है। लेकिन आत्मा कभी नहीं मरती। उसी को ऊँचा उठाने के प्रयास जीवन पर्यन्त किये जाते रहें तो भागी जन्म सार्थक किया जा सकता है।

अपने डॉक्टर स्वयं बने

1 *नमक केवल सेन्धा प्रयोग करें।थायराइड, बी पी, पेट ठीक होगा?* 2=कुकर स्टील का ही काम में लें। एल्युमिनियम में मिले lead से होने वाले नुकसानों से बचेंगे 3=तेल कोई भी रिफाइंड न खाकर केवल तिल, सरसों, मूंगफली, नारियल प्रयोग करें। रिफाइंड में बहुत केमिकल होते हैं जो शरीर में कई तरह की बीमारियाँ पैदा करते हैं । 4=सोयाबीन बड़ी को 2 घण्टे भिगो कर, मसल कर ज़हरीली झाग निकल कर ही प्रयोग करें। 5= रसोई में एग्जास्ट फैन जरूरी है, प्रदूषित हवा बाहर करें। 6= काम करते समय स्वयं को अच्छा लगने वाला संगीत चलाएं।खाने में अच्छा प्रभाव आएगा और थकान कम होगी। 7= देसी गाय के घी का प्रयोग बढ़ाएं।अनेक रोग दूर होंगे, वजन नहीं बढ़ता। 8=ज्यादा से ज्यादा मीठा नीम/कढ़ी पत्ता खाने की चीजों में डालें, सभी का स्वास्थ्य ठीक करेगा। 9=ज्यादा चीजें लोहे की कढ़ाई में ही बनाएं। आयरन की कमी किसी को नहीं होगी। 10=भोजन का समय निश्चित करें, पेट ठीक रहेगा। भोजन के बीच बात न करें, भोजन ज्यादा पोषण देगा। 11=नाश्ते में अंकुरित अन्न शामिल करें। पोषक विटामिन, फाइबर मिलेंगें। 12=सुबह के खाने के साथ देशी गाय के दूध का बना ताजा दही लें, पेट ठीक रहेगा। 13=चीनी कम से कम प्रयोग करें, ज्यादा उम्र में हड्डियां ठीक रहेंगी। 14=चीनी की जगह बिना मसले का गुड़ या देशी शक्कर लें। 15= छौंक में राई के साथ कलौंजी का भी प्रयोग करें, फायदे इतने कि लिख ही नहीं सकते। 16= चाय के समय, आयुर्वेदिक पेय की आदत बनाएं व निरोग रहेंगे. 17- डस्ट बिन एक रसोई में एक बाहर रखें, सोने से पहले रसोई का कचरा बाहर के डस्ट बिन में डालें। 18- रसोई में घुसते ही नाक में घी या सरसों तेल लगाएं, सर और फेफड़े स्वस्थ रहेंगें। 19- करेले, मैथी, मूली याने कड़वी सब्जियां भी खाएँ, रक्त शुद्ध रहेगा। 20- पानी मटके वाले से ज्यादा ठंडा न पिएं, पाचन व दांत ठीक रहेंगे। 21- प्लास्टिक, एल्युमिनियम रसोई से हटाये, केन्सर कारक हैं। 22- माइक्रोवेव ओवन का प्रयोग केन्सर कारक है। 23- खाने की ठंडी चीजें कम से कम खाएँ, पेट और दांत को खराब करती हैं। 24- बाहर का खाना बहुत हानिकारक है, खाने से सम्बंधित ग्रुप से जुड़कर सब घर पर ही बनाएं। 25- तली चीजें छोड़ें, वजन, पेट, एसिडिटी ठीक रहेंगी। 26- मैदा, बेसन, छौले, राजमां, उड़द कम खाएँ, गैस की समस्या से बचेंगे। 27- अदरक, अजवायन का प्रयोग बढ़ाएं, गैस और शरीर के दर्द कम होंगे। 28- बिना कलौंजी वाला अचार हानिकारक होता है। 29- पानी का फिल्टर R O वाला हानिकारक है। U V वाला ही प्रयोग करें, सस्ता भी और बढ़िया भी। 30- रसोई में ही बहुत से कॉस्मेटिक्स हैं, इस प्रकार के ग्रुप से जानकारी लें। 31- रात को आधा चम्मच त्रिफला एक कप पानी में डाल कर रखें, सुबह कपड़े से छान कर इस जल से आंखें धोएं, चश्मा उतर जाएगा। छान कर जो पाउडर बचे उसे फिर एक गिलास पानी में डाल कर रख दें। रात को पी जाएं। पेट साफ होगा, कोई रोग एक साल में नहीं रहेगा। 32- सुबह रसोई में चप्पल न पहनें, शुद्धता भी, एक्यू प्रेशर भी। 33- रात का भिगोया आधा चम्मच कच्चा जीरा सुबह खाली पेट चबा कर वही पानी पिएं, एसिडिटी खतम। 34- एक्यूप्रेशर वाले पिरामिड प्लेटफार्म पर खड़े होकर खाना बनाने की आदत बना लें तो भी सब बीमारी शरीर से निकल जायेगी। 35- चौथाई चम्मच दालचीनी का कुल उपयोग दिन भर में किसी भी रूप में करने पर निरोगता अवश्य होगी। 36- रसोई के मसालों से बना चाय मसाला स्वास्थ्यवर्धक है। 37- सर्दियों में नाखून बराबर जावित्री कभी चूसने से सर्दी के असर से बचाव होगा। 38- सर्दी में बाहर जाते समय 2 चुटकी अजवायन मुहं में रखकर निकलिए, सर्दी से नुकसान नहीं होगा. 39. रस निकले नीबू के चौथाई टुकड़े में जरा सी हल्दी, नमक, फिटकरी रख कर दांत मलने से दांतों का कोई भी रोग नहीं रहेगा 40- कभी-कभी नमक-हल्दी में 2 बून्द सरसों का तेल डाल कर दांतों को उंगली से साफ करें, दांतों का कोई रोग टिक नहीं सकता। 41- बुखार में 1 लीटर पानी उबाल कर 250 ml कर लें, साधारण ताप पर आ जाने पर रोगी को थोड़ा थोड़ा दें, दवा का काम करेगा। 42- सुबह के खाने के साथ घर का जमाया देशी गाय के ताजा दही जरूर शामिल करें, प्रोबायोटिक का काम करेगा. ---------------------------------- *हृदय की बीमारी आयुर्वेदिक इलाज* हमारे देश भारत मे 3000 साल पहले एक बहुत बड़े ऋषि हुये थे, उनका नाम था महाऋषि वागवट जी !! उन्होने एक पुस्तक लिखी थी, जिसका नाम है अष्टांग हृदयम!! (Astang hrudayam) इस पुस्तक मे उन्होने बीमारियो को ठीक करने के लिए 7000 सूत्र लिखे थे ! यह उनमे से ही एक सूत्र है !! वागवट जी लिखते है कि कभी भी हृदय को घात हो रहा है ! मतलब दिल की नलियों मे blockage होना शुरू हो रहा है तो इसका मतलब है कि रकत (blood) मे acidity (अम्लता) बढ़ी हुई है ! अम्लता आप समझते है ! जिसको अँग्रेजी मे कहते है acidity !! अम्लता दो तरह की होती है ! एक होती है पेट कि अम्लता ! और एक होती है रक्त (blood) की अम्लता. आपके पेट मे अम्लता जब बढ़ती है तो आप कहेंगे पेट मे जलन सी हो रही है. खट्टी खट्टी डकार आ रही है ! मुंह से पानी निकाल रहा है और अगर ये अम्लता (acidity) और बढ़ जाये तो hyperacidity होगी ! और यही पेट की अम्लता बढ़ते-बढ़ते जब रक्त मे आती है तो रक्त अम्लता (blood acidity) होती hai और जब blood मे acidity बढ़ती है तो ये अम्लीय रक्त दिल की नलियो मे से निकल नहीं पाता और नलिया मे blockage कर देता है ! तभी heart attack होता है ! इसके बिना heart attack नहीं होता और ये आयुर्वेद का सबसे बढ़ा सच है जिसको कोई डाक्टर आपको बताता नहीं ! क्योंकि इसका इलाज सबसे सरल है !! *इलाज क्या है ??* वागबट जी लिखते है कि जब रक्त (blood) मे अम्लता (acidity) बढ़ गई है ! तो आप ऐसी चीजों का उपयोग करो जो क्षारीय है ! आप जानते है दो तरह की चीजे होती है ! अम्लीय और क्षारीय !! acidic and alkaline अब अम्ल और क्षार को मिला दो तो क्या होता है ? acid and alkaline को मिला दो तो क्या होता है ? neutral होता है सब जानते है !! तो वागबट जी लिखते है कि रक्त की अम्लता बढ़ी हुई है तो क्षारीय (alkaline) चीजे खाओ ! तो रक्त की अम्लता (acidity) neutral हो जाएगी और रक्त मे अम्लता neutral हो गई ! तो heart attack की जिंदगी मे कभी संभावना ही नहीं ! ये है सारी कहानी !! अब आप पूछोगे जी ऐसे कौन सी चीजे है जो क्षारीय है और हम खाये? आपके रसोई घर मे ऐसी बहुत सी चीजे है जो क्षारीय है ! जिनहे आप खाये तो कभी heart attack न आए और अगर आ गया है ! तो दुबारा न आए ! सबसे ज्यादा आपके घर मे क्षारीय चीज है वह है लौकी ! जिसे दुधी भी कहते है ! English मे इसे कहते है bottle gourd ! जिसे आप सब्जी के रूप मे खाते है ! इससे ज्यादा कोई क्षारीय चीज ही नहीं है तो आप रोज लौकी का रस निकाल-निकाल कर पियो या कच्ची लौकी खायो ! वागवतट जी कहते है रक्त की अम्लता कम करने की सबसे ज्यादा ताकत लौकी मे ही है ! तो आप लौकी के रस का सेवन करे ! *कितना सेवन करे* रोज 200 से 300 ग्राम पियो ! कब पिये ? सुबह खाली पेट (toilet जाने के बाद) पी सकते है. या नाश्ते के आधे घंटे के बाद पी सकते है ! इस लौकी के रस को आप और ज्यादा क्षारीय बना सकते है ! इसमे 7 से 10 पत्ते के तुलसी के डाल लो तुलसी बहुत क्षारीय है ! इसके साथ आप पुदीने से 7 से 10 पत्ते मिला सकते है. पुदीना बहुत क्षारीय है. इसके साथ आप काला नमक या सेंधा नमक जरूर डाले ! ये भी बहुत क्षारीय है ! लेकिन याद रखे नमक काला या सेंधा ही डाले ! वो दूसरा आयोडीन युक्त नमक कभी न डाले ! ये आओडीन युक्त नमक अम्लीय है. तो मित्रों आप इस लौकी के जूस का सेवन जरूर करे 2 से 3 महीने आपकी सारी heart की blockage ठीक कर देगा. 21 वे दिन ही आपको बहुत ज्यादा असर दिखना शुरू हो जाएगा ! कोई आपरेशन की आपको जरूरत नहीं पड़ेगी ! घर मे ही हमारे भारत के आयुर्वेद से इसका इलाज हो जाएगा और आपका अनमोल शरीर और लाखो रुपए आपरेशन के बच जाएँगे और पैसे बच जाये तो किसी गौशाला मे दान कर दे ! डाक्टर को देने से अच्छा है किसी गौशाला दान दे ! हमारी गौ माता बचेगी तो भारत बचेगा !! *हल्दी का पानी* *पानी में हल्दी मिलाकर पीने से होते है यह 7 फायदें.....* 1. *गुनगुना हल्दी वाला पानी पीने से दिमाग तेज होता है. सुबह के समय हल्दी का गुनगुना पानी पीने से दिमाग तेज और उर्जावान बनता है.* 2. *रोज यदि आप हल्दी का पानी पीते हैं तो इससे खून में होने वाली गंदगी साफ होती है और खून जमता भी नहीं है. यह खून साफ करता है और दिल को बीमारियों से भी बचाता है.* 3. *लीवर की समस्या से परेशान लोगों के लिए हल्दी का पानी किसी औषधि से कम नही है. हल्दी के पानी में टाॅक्सिस लीवर के सेल्स को फिर से ठीक करता है. हल्दी और पानी के मिले हुए गुण लीवर को संक्रमण से भी बचाते हैं.* 4. *हार्ट की समस्या से परेशान लोगों को हल्दी वाला पानी पीना चाहिए. हल्दी खून को गाढ़ा होने से बचाती है. जिससे हार्ट अटैक की संभावना कम हो जाती है.* 5. *जब हल्दी के पानी में शहद और नींबू मिलाया जाता है तब यह शरीर के अंदर जमे हुए विषैले पदार्थों को निकाल देता है जिसे पीने से शरीर पर बढ़ती हुई उम्र का असर नहीं पड़ता है. हल्दी में फ्री रेडिकल्स होते हैं जो सेहत और सौंदर्य को बढ़ाते हैं.?* 6. *शरीर में किसी भी तरह की सजून हो और वह किसी दवाई से ना ठीक हो रही हो तो आप हल्दी वाला पानी का सेवन करें. हल्दी में करक्यूमिन तत्व होता है जो सूजन और जोड़ों में होने वाले असहय दर्द को ठीक कर देता है. सूजन की अचूक दवा है हल्दी का पानी.?* 7. कैंसर खत्म करती है हल्दी। हल्दी कैंसर से लड़ती है और उसे बढ़ने से भी रोक देती है. हल्दी एंटी-कैंसर युक्त होती है. यदि आप सप्ताह में तीन दिन हल्दी वाला पानी पीएगें तो आपको भविष्य में कैंसर से हमेशा बचे रहेगें. हमारे वेदों के अनुसार स्वस्थ रहने के १५ नियम १- खाना खाने के १.३० घंटे बाद पानी पीना है ? २- पानी घूँट घूँट करके पीना है जिससे अपनी मुँह की लार पानी के साथ मिलकर पेट में जा सके, पेट में acid बनता है और मुँह में छार, दोनो पेट में बराबर मिल जाए तो कोई रोग पास नहीं आएगा। ३- पानी कभी भी ठंडा (फ़्रीज़ का) नहीं पीना है ? ठंडा पानी पीना सलौ पाइजन का काम करता है ?* *ठंडा पानी ही पीना हो तो घड़े और सुराही का पानी पिये ? ४- सुबह उठते ही बिना क़ुल्ला किए २ ग्लास पानी पीना है ,रात भर जो अपने मुँह में लार है वो अमूल्य है उसको पेट में ही जाना ही चाहिए। ५- खाना, जितने आपके मुँह में दाँत है उतनी बार ही चबाना है । ६ - खाना ज़मीन में पलोथी मुद्रा या उखड़ूँ बैठकर ही भोजन करे। ७ - खाने के मेन्यू में एक दूसरे के विरोधी भोजन एक साथ ना करे जैसे दूध के साथ दही, प्याज़ के साथ दूध, दही के साथ उड़द दल ? ८ - समुद्री नमक की जगह सेंधा नमक या काला नमक ही खाना चाहिए ? ९- रीफ़ाइन तेल, डालडा ज़हर है इसकी जगह अपने इलाक़े के अनुसार सरसों, तिल, मूँगफली, नारियल का तेल उपयोग में लाए । सोयाबीन के कोई भी प्रोडक्ट खाने में ना ले इसके प्रोडक्ट को केवल सुअर पचा सकते है ? आदमी में इसके पचाने के एंज़िम नहीं बनते है ।? १०- दोपहर के भोजन के बाद कम से कम ३० मिनट आराम करना चाहिए और शाम के भोजन बाद ५०० क़दम पैदल चलना चाहिए ? ११- घर में चीनी (शुगर ) का उपयोग नहीं होना चाहिए क्योंकि चीनी को सफ़ेद करने में १७ तरह के ज़हर (केमिकल ) मिलाने पड़ते है इसकी जगह गुड़ का उपयोग करना चाहिए और आजकल गुड बनाने में कॉस्टिक सोडा (ज़हर) मिलाकर गुड को सफ़ेद किया जाता है इसलिए सफ़ेद गुड ना खाए । प्राकृतिक गुड ही खाये । और प्राकृतिक गुड चोकलेट कलर का होता है ? १२ - सोते समय आपका सिर पूर्व या दक्षिण की तरफ़ होना चाहिए। १३- घर में कोई भी अलूमिनियम के बर्तन, कुकर नहीं होना चाहिए। हमारे बर्तन मिट्टी, पीतल लोहा, काँसा के होने चाहिए . १४ -दोपहर का भोजन ११ बजे तक अवम शाम का भोजन सूर्यास्त तक हो जाना चाहिए . १५- सुबह भोर के समय तक आपको देशी गाय के दूध से बनी छाछ (सेंधl नमक और ज़ीरा बिना भुना हुआ मिलाकर) पीना चाहिए । यदि आपने ये नियम अपने जीवन में लागू कर लिए तो आपको डॉक्टर के पास जाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी और देश के ८ लाख करोड़ की बचत होगी । यदि आप बीमार है तो ये नियमों का पालन करने से आपके शरीर के सभी रोग (BP, शुगर ) अगले ३ माह से लेकर १२ माह में ख़त्म हो जाएँगे। सर्दियों में उठायें मेथी दानों से भरपूर लाभ ➡ मेथीदाना उष्ण, वात व कफनाशक, पित्तवर्धक, पाचनशक्ति व बलवर्धक एवं ह्रदय के लिए हितकर है | यह पुष्टिकारक, शक्ति, स्फूर्तिदायक टॉनिक की तरह कार्य करता है | सुबह–शाम इसे पानी के साथ निगलने से पेट को निरोग बनाता है, कब्ज व गैस को दूर करता है | इसकी मूँग के साथ सब्जी बनाकर भी खा सकते हैं | यह मधुमेह के रोगियों के लिए खूब लाभदायी हैं | ➡ अपनी आयु के जितने वर्ष व्यतीत हो चुके हैं, उतनी संख्या में मेथीदाने रोज धीरे–धीरे चबाना या चूसने से वृद्धावस्था में पैदा होने वाली व्याधियों, जैसे– घुटनों व जोड़ों का दर्द, भूख न लगना, हाथों का सुन्न पड़ जाना, सायटिका, मांसपेशियों का खिंचाव, बार-बार मूत्र आना, चक्कर आना आदि में लाभ होता है | गर्भवती व स्तनपान कराने वाली महिलाओं को भुने मेथी दानों का चूर्ण आटे के साथ मिला के लड्डू बना के खाना लाभकारी है | शक्तिवर्धक पेय दो चम्मच मेथीदाने एक गिलास पानी में ४–५ घंटे भिगोकर रखें फिर इतना उबालें कि पानी चौथाई रह जाय, इसे छानकर २ चम्मच शहद मिला के पियें औषधीय प्रयोग 1. कब्ज : २० ग्राम मेथीदाने को २०० ग्राम ताजे पानी में भिगो दें. ५-६ घंटे बाद मसल के पीने से मल साफ़ आने लगता है. भूख अच्छी लगने लगती है और पाचन भी ठीक होने लगता है | 2. जोड़ों का दर्द : १०० ग्राम मेथीदाने अधकच्चे भून के दरदरा कूट लें | इसमें २५ ग्राम काला नमक मिलाकर रख लें | २ चम्मच यह मिश्रण सुबह- शाम गुनगुने पानी से फाँकने से जोड़ों, कमर व घुटनों का दर्द, आमवात (गठिया) का दर्द आदि में लाभ होता है | इससे पेट में गैस भी नहीं बनेगी | 3. पेट के रोगों में : १ से ३ ग्राम मेथीदानों का चूर्ण सुबह, दोपहर व शाम को पानी के साथ लेने से अपच, दस्त, भूख न लगना, अफरा, दर्द आदि तकलीफों में बहुत लाभ होता है | 4. दुर्बलता : १ चम्मच मेथीदानों को घी में भून के सुबह–शाम लेने से रोगजन्य शारीरिक एवं तंत्रिका दुर्बलता दूर होती है | 5. मासिक धर्म में रुकावट : ४ चम्मच मेथीदाने १ गिलास पानी में उबालें | आधा पानी रह जाने पर छानकर गर्म–गर्म ही लेने से मासिक धर्म खुल के होने लगता है | 6. अंगों की जकड़न : भुनी मेथी के आटे में गुड़ की चाशनी मिला के लड्डू बना लें | १–१ लड्डू रोज सुबह खाने से वायु के कारण जकड़े हुए अंग १ सप्ताह में ठीक हो जाते हैं तथा हाथ–पैरों में होने वाला दर्द भी दूर होता है | 7. विशेष : सर्दियों में मेथीपाक, मेथी के लड्डू, मेथीदानों व मूँग–दाल की सब्जी आदि के रूप में इसका सेवन खूब लाभदायी हैं | IMPORTANT HEART ATTACK & गर्म पानी पीना यह भोजन के बाद गर्म पानी पीने के बारे में ही नहीं Heart Attack के बारे में भी एक अच्छा लेख है। चीनी और जापानी अपने भोजन के बाद गर्म चाय पीते हैं, ठंडा पानी नहीं। अब हमें भी उनकी यह आदत अपना लेनी चाहिए। जो लोग भोजन के बाद ठंडा पानी पीना पसन्द करते हैं यह लेख उनके लिए ही है।  भोजन के साथ कोई ठंडा पेय या पानी पीना बहुत हानिकारक है क्योंकि ठंडा पानी आपके भोजन के तैलीय पदार्थों को जो आपने अभी अभी खाये हैं ठोस रूप में बदल देता है। इससे पाचन बहुत धीमा हो जाता है। जब यह अम्ल के साथ क्रिया करता है तो यह टूट जाता है और जल्दी ही यह ठोस भोजन से भी अधिक तेज़ी से आँतों द्वारा सोख लिया जाता है। यह आँतों में एकत्र हो जाता है। फिर जल्दी ही यह चरबी में बदल जाता है और कैंसर के पैदा होने का कारण बनता है।  इसलिए सबसे अच्छा यह है कि भोजन के बाद गर्म सूप या गुनगुना पानी पिया जाये। एक गिलास गुनगुना पानी सोने से ठीक पहले पीना चाहिए। इससे खून के थक्के नहीं बनेंगे और आप हृदयाघात से बचे रहेंगे। 

Monday, July 9, 2018

पश्चिमी देश व उनका अन्य गैर पश्चिमी देशों को देखने का नज़रिया

भारत को ही क्यों शर्म आनी चाहिए? पश्चिमी देश क्या दूध के धुले हैं? भारत को महिलाओं के लिए दुनिया का सबसे ख़तरनाक देश बताती थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन की हालिया रिपोर्ट में कई तथ्यों को अनदेखा करती है ‘थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन’ कनाडा की ‘थॉमसन रॉयटर्स’ नाम की अंतरराष्ट्रीय समाचार संस्था की लंदन स्थित ‘परोपकारी’ शाखा है. ब्रिटेन और अमेरिका ने उसे दूसरों का भला करने वाले प्रतिष्ठान के तौर पर औपचारिक मान्यता दे रखी है. यहां ‘दूसरे’ और कोई नहीं, ब्रिटेन, अमेरिका और कनाडा जैसे पश्चिमी देश स्वयं ही हैं, जिनके भले के लिए दूसरों से उनका गुणगान करवाना ही ‘परोपकार’ है. 1983 से यह प्रतिष्ठान 15 हज़ार विदेशी पत्रकारों को दुनिया को पश्चिमी चश्मे से देखने और उसी के अनुरूप रिपोर्टिंग करने का प्रशिक्षण भी दे चुका है. ऐसे ही कुछ पत्रकारों के सहयोग से ‘थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन’ ने 26 जून 2018 को प्रकाशित अपने वैश्विक सर्वे में भारत को महिलाओं के लिए दुनिया का सबसे ख़तरनाक देश घोषित किया है. यह सर्वे पश्चिमी दुनिया के काले चश्मे से ग़ैर-पश्चिमी दुनिया को देखने का सबसे ताज़ा नमूना है. ‘थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन’ का कहना है कि उसके निष्कर्ष 548 महिला और पुरुष विशेषज्ञों की राय पर आधारित हैं. ये कथित ‘विशेषज्ञ’ सरकारी अधिकारी, वैज्ञानिक, विकास सहायताकर्मी, डॉक्टर और पत्रकार हैं. फाउंडेशन का बड़बोला दावा है, ‘हम मानव तस्करी और ग़ुलामी, महिलाओं के अधिकार तथा पर्यावरण और समुत्थान के क्षेत्र में निष्पक्ष चिंतन के नेतृत्वकारी स्रोत का काम करते हैं.’ सर्वे की कमियां पहली बात, फाउंडेशन ने इन कथित विशेषज्ञों को अपनी पसंद के अनुसार चुना, इसलिए उनकी राय निष्पक्ष या तथ्यपरक होना अनिवार्य नहीं है. दूसरी बात, यह सर्वे महिलाओं के बीच जा कर उनसे प्रत्यक्ष बातचीत पर आधारित नहीं है, इसलिए इसे वास्तविकता की सही तस्वीर नहीं माना जा सकता. तीसरी बात, केवल 548 कथित विशेषज्ञ दुनिया की कुल जनसंख्या की आधी, यानी पौने चार अरब महिलाओं और लड़कियों के बारे में इतनी सटीक जानकारी नही रख सकते कि वे जो कहें सो मान लिया जाये. चौथी और सबसे निर्णायक बात यह है कि इस सर्वे में महिलाओं के साथ हुई घटनाओं की संख्या और देशों की जनसंख्या के बीच कोई अनुपात बताये बिना, एक अरब 33 करोड़ जनसंख्या वाले भारत की तुलना, परोक्ष रूप से, अधिकतर अराजकताग्रस्त ऐसे-ऐसे देशों से की गई है, जो उससे कई गुना छोटे हैं. 10 सबसे ख़तरनाक देशों की सूची में अमेरिका को दसवें स्थान पर रख कर यह दिखावा किया गया है कि सर्वे निष्पक्ष था. ये कमियां सर्वे को पूरी तरह से पूर्वाग्रही, बेतुका और दुर्भावनापूर्ण बना देती हैं. उसका महत्व ‘विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र’ भारत को किसी न किसी तरह नीचा दिखाते हुए पश्चिमी देशों की पीठ थपथपाने और अपने मुंह मियां मिठ्ठू बनने से अधिक नहीं माना जा सकता. क्या पश्चिमी देश दूध के धुले हैं? इससे कोई इन्कार नहीं करेगा कि भारत में महिलाओं के साथ बढ़ता हुआ दुराचार बहुत ही चिंता और शर्म का विषय है, पर, क्या यूरोप के स्कैन्डिनेवियाई देशों सहित वे पश्चिमी देश दूध के धुले हैं, जिन्हें ब्रिटेन में लंदन स्थित ‘थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन’ ने अपने सर्वे में ‘टॉप टेन’ से बाहर रखा है? बात लंदन और ब्रिटेन से ही शुरू करते हैं. ब्रिटिश दैनिक ‘दि इंडिपेंडेंट’ की वेबसाइट पर 23 फ़रवरी 2018 को प्रकाशित एक समाचार का शीर्षक था, ‘लंदन ने एक ही साल में बलात्कार के मामलों को 20 प्रतिशत बढ़ते देखा, पर पुलिस स्वीकार करती है कि वह इसका कारण समझ नहीं पा रही है.’ इस समाचार के अनुसार, 81 लाख 36 हज़ार की जनसंख्या वाले लंदन के मेयर के अधीनस्थ पुलिस और अपराध कार्यालय (एमओपीएसी) ने 2017 में बलात्कार के 7,613 मामले दर्ज किये. 12 महीने पहले यह आंकड़ा 6,392 था. लंदन में हर दिन 21 बलात्कार दूसरे शब्दों में, दिल्ली या मुंम्बई की अपेक्षा आधी से भी कम जनसंख्या वाले अकेले लंदन शहर में, पिछले वर्ष हर दिन, औसतन कम से कम 21 बलात्कार हो रहे थे! कह सकते हैं कि लंदन में हर घंटे क़रीब एक बलात्कार होता है. दूसरी ओर ‘थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन’ के सर्वे का कहना है कि भारत में – यानी एक अरब 33 करोड़ की जनसंख्या वाले पूरे भारत में – 2016 में बलात्कार के हर घंटे औसतन चार मामले दर्ज किये जा रहे थे. सोचने की बात है कि जब 81 लाख 36 हज़ार की जनसंख्या वाले अकेले लंदन में ही, हर घंटे औसतन एक बलात्कार हो रहा है, और एक अरब 33 करोड़ निवासियों वाले पूरे भारत में औसतन चार, तो फिर कौन-सा देश महिलाओं के लिए सबसे अधिक ख़तरनाक़ है, भारत या ब्रिटेन? सोचने की बात यह भी है कि सर्वे के द्वारा यदि भारत पर निशाना साधने की दुर्भावना काम नहीं कर रही थी, तो लंदन में ही बैठे हुए ‘थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन’ के अधिकारियों को लंदन में ही हो रहा यह घोर पतन या लंदन के बारे में 23 फ़रवरी का यह समाचार क्यों नहीं दिखा? उनका सर्वे इस समाचार के चार महीने बाद प्रकाशित हुआ है. ब्रिटेन बलात्कारियों का देश! भारत पर यह आरोप भी लगाया गया है कि बलात्कार और यौन-दुराचार के अपराधियों को बहुत कम ही कोई सज़ा भुगतनी पड़ती है. ठीक यही शिकायत ‘दि इंडिपेंडेंट’ ने ब्रिटेन के बारे में भी की है. उसने लिखा कि ब्रिटेन के अकेले इंग्लैंड और वेल्स प्रदेश के बारे में हुए एक सर्वे के आधार पर अनुमान लगाया गया कि मार्च 2017 से पहले के 12 महीनों में वहां 5 लाख 10 हजार महिलाओं और एक लाख 38 हजार पुरुषों को गंभीर क़िस्म के यौन दुराचार झेलने पड़े. हर छह में से पांच पीड़ितों (83 प्रतिशत) ने पुलिस के पास शिकायत नहीं की, क्योंकि उन्हें डर था कि केस-मुकदमा लंबा चलेगा और अदालत में अपनी बात प्रमाणित कर पाना उनके लिए और अधिक पीड़ादायक होगा. ब्रिटेन के केवल इंग्लैंड और वेल्स प्रदेश में ही यौनदुराचारों में ऐसी बाढ़ आ गयी है कि उसे एक गंभीर संकट के रूप में देखा जाने लगा है. वहां प्रकाशित 2017-18 के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार हर साल 85 हजार महिलाओं और 12 हजर पुरुषों को बलात्कार का शिकार बनाया जाता है. केवल वयस्कों के साथ ही बलात्कार के हर दिन औसतन 11 मामले होते हैं, जिनमें जबरन शारीरिक संबंध बनाने के मामले भी शामिल हैं. यह हाल है संसदीय लोकतंत्र के जन्मदाता और दुनिया भर पर राज कर चुके ब्रिटेन का, जहां अब महिलाओं को ही नहीं, पुरुषों को भी भारी संख्या में यौनदुराचार का शिकार बनाया जा रहा है. यूरोप में ब्रिटेन नंबर एक यूरोपीय संघ के सांख्यिकी कार्यालय ‘यूरोस्टाट’ ने भी 24 नंवंबर 2017 को ब्रिटेन के बारे में कुछ चौंकाने वाले आंकड़े प्रकाशित किये. इन आंकड़ों के अनुसार ब्रिटेन के अकेले इंग्लैंड और वेल्स प्रदेश की पुलिस द्वारा दर्ज किये गये बलात्कारों के मामले, पूरे यूरोपीय संघ के किसी भी देश की अपेक्षा, सबसे अधिक हैं. इन मामलों की संख्या दूसरे नंबर पर रहे फ्रांस से भी क़रीब तीन गुनी अधिक है. गौर करने वाली बात यह भी है कि इन आंकड़ों में ब्रिटेन के दो अन्य प्रदेशों स्कॉटलैंड और उत्तरी आयरलैंड का कोई उल्लेख नहीं मिलता. हो सकता है कि वहां के आंकड़े भी जोड़ने पर स्थिति इतनी भयावह लगे कि उस पर विश्वास करना ही कठिन हो जाये. ‘यूरोस्टाट’ ने पाया कि 2015 में ब्रिटेन के अकेले इंग्लैंड (जनसंख्या करीब साढ़े पांच करोड़ )और वेल्स प्रदेश (जनसंख्या लगभग 30 लाख) में कुल मिलाकर 35,700 बलात्कार हुए, जबकि फ्रांस में (जनसंख्या करीब साढ़े छह करोड़) उस वर्ष 12, 900 बलात्कार दर्ज किये गए. उस समय जर्मनी की जनसंख्या आठ करोड़ से कुछ ज्यादा थी और वहां हुए बलात्कारों की संख्या सात हज़ार से कुछ अधिक रही. बलात्कारों के लिए कुख्यात स्कैन्डिनेवियाई देश स्वीडन में (जनसंख्या 98 लाख) जर्मनी से कुछ ही कम (5,500) बलात्कार हुए. प्रति एक लाख निवासियों के पीछे प्रतिवर्ष औसतन 62 बलात्कारों के साथ इंग्लैंड और वेल्स ने औसतन 57 बलात्कारों वाले स्वीडन को दूसरे नंबर पर धकेल दिया है. जर्मनी में हर दिन 30 बलात्कार यूरोप में सबसे अधिक जनसंख्या वाले देश जर्मनी में बलात्कारों का अनुपात पश्चिमी यूरोप के अन्य देशों की अपेक्षा कुछ कम अवश्य था, पर अब जर्मनी में भी यह समस्या गंभीर रूप धारण करने लगी है. 2017 के आधिकारिक आंकड़े कहते हैं कि वाकई बलात्कार या बलात्कार के लिए ज़ोर- ज़बर्दस्ती करने के अपराधों की संख्या 2015 में लगभग सात हज़ार से बढ़ कर 2017 में 11,282 हो चुकी थी जिसका औसत हर दिन 30 बैठता है. जर्मनी में हर सप्ताह बलात्कार की औसतन दो से तीन घटनाओं का अंत पीड़िता की हत्या के साथ होता है, ताकि वह जीवित रह कर कोई गवाही न दे सके. भारत और जर्मनी के बीच जनसंख्या के भारी अंतर को देखते हुए यदि भारत को भी जर्मनी की बराबरी करनी हो, तो भारत में हर दिन 480 से अधिक बलात्कार होने चाहिये, जबकि होते हैं 100 से भी कम. ‘थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन’ के सर्वे में भारत में महिलाओं की सुरक्षा के लिए ख़तरों को वर्षों से युद्ध या गृहयुद्ध से बर्बाद अफ़ग़ानिस्तान, सीरिया या सोमालिया से भी अधिक बताया गया है. खुद यह दावा ही उसके निष्कर्षों का खंडन करने के लिए पर्याप्त हैं. बेढब तर्क की बेशर्मी कौन नहीं जानता कि अफ़ग़ानिस्तान में लगभग चार दशकों से भयंकर मार-काट चल रही है. मार-काट यदि सुरक्षा का पर्याय होती, तो लाखों अफ़ग़ान जान बचाने के लिए भाग कर अन्य देशों में शरण नहीं लेते. सीरिया 2011 से एक ऐसे गृहयुद्ध में झुलस रहा है, जो 2017 तक साढ़े चार लाख से भी ज्यादा लोगों के प्राण ले चुका था. वहां से भाग रहे लाखों शरणार्थियों को 2015 से शरण दे रही जर्मनी की सरकार अपने सहयोगी दलों के बीच भारी मतभेद के कारण अभी-अभी (जुलाई के पहले सप्ताह में) गिरने से बाल-बाल बची है. सोमालिया में तो 1990 वाले दशक से ही कोई ढंग की सरकार नहीं बन पा रही है, वहां लुटेरों-डकैतों और आतंकवादियों का राज है. यमन भी, जिसे भारत की अपेक्षा कहीं अधिक सुरक्षित माना गया है, 2011 से गृहयुद्ध और पड़ोसी देशों के सैन्य हस्तक्षेपों से न केवल खंडहर बन गया है, भुखमरी और महामारियों से भी लड़ रहा है. ऐसे में कोई ‘आंख का अंधा, नाम नयनसुख’ ही इन देशों को, महिलाओं तो क्या किसी के लिए भी, भारत से अथिक सुरक्षित देश बताने की बेशर्मी करेगा . भारत को ‘शर्म’ आने की दुहाई हद तो यह है कि ‘थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन’ ने उल्टे भारत को ही ‘शर्म’ आने की दुहाई दी है. अपनी मीडिया-रिपोर्ट में उसने लिखा है कि विश्व के ‘सबसे बड़े लोकतंत्र’ भारत को, जो अपने आप को ‘विश्व की सबसे तेज़ विकासदर वाली अर्थव्यवस्था और अंतरिक्ष की खोज तथा तकनीक का अगुआ मानता है, महिलाओं के विरुद्ध होने वाली हिंसा के लिए शर्म आनी चाहिये.’ भारत को ही क्यों शर्म आनी चाहिये? अमेरिका को, ब्रिटेन को, फ्रांस को, बल्कि सभी पश्चिमी देशों को भी क्यों नहीं शर्म आनी चाहिये? यूरोप-अमेरिका के लगभग सभी देशों में प्रति एक लाख जनसंख्या पर भारत से अधिक यौनदुराचार और बलात्कार होते हैं. वे क्या भारत की अपेक्षा अधिक अविकसित, अशिक्षित या ग़रीब हैं कि अपनी महिलाओं को इतनी भी सुरक्षा नहीं दे पाते कि उनकी असुरक्षा का स्तर कम से कम भारत से तो बेहतर ही रहता? बलात्कार का बढ़ता आयाम अपनी जनसंख्या के कारण भारत यदि सबसे बड़ा लोकतंत्र है तो अमेरिका भी अपने धनबल, साधन-संपन्नता, सैन्य-शक्ति, ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी वर्चस्व के कारण क्या विश्व का सबसे शक्तिशाली लोकतंत्र नहीं है? ब्रिटेन को भी क्या संसदीय लोकतंत्र का जन्मदाता होने का गर्व नहीं होता? छोटा-सा स्वीडन भी क्या पूरी दुनिया में नारी-समानता का अगुआ और संसार की पहली नारीवादी सरकार वाला देश होने का ढिंढोरा नहीं पीटता? तो फिर इन सब देशों में भी नारी के साथ दुराचार और बलात्कार का आयाम निरंतर बढ़ता ही क्यों जा रहा है? भारत की ही तरह उनकी भी कठोर निंदा-आलोचना क्यों नहीं होती? यह कहना कि भारत में महिलाओं के साथ दुराचारों और बलात्कारों की असली संख्या सरकारी आंकड़ों से कहीं अधिक है, निरा कुतर्क है. पश्चिमी देशों में भी यही माना जाता है कि 70 से 90 प्रतिशत महिलाएं अनेक कारणों से पुलिस के पास शिकायत करने नहीं जातीं. ब्रिटेन के बारे में हम ऊपर देख चुके हैं कि वहां 83 प्रतिशत पीड़ित पुलिस के पास शिकायत दर्ज नहीं कराते. अधिकतर पश्चिमी देशों में अपराधियों के विरुद्ध मुकदमों और सज़ाओं का अनुपात भारत से भी कम है. सज़ाएं भी उतनी कठोर नहीं हैं, जितनी भारत में हैं. समाज में बेइज़्ज़त होने या मुंह दिखाने लायक नहीं रह जाने का डर तो नहीं के बराबर ही होता है. संसार की पहली नारीवादी सरकार ‘थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन’ के सर्वे में स्कैन्डिनेविया कहलाने वाले उत्तरी यूरोप के नॉर्वे, स्वीडन, डेनमार्क और फ़िनलैंड को महिलाओं के मान-सम्मान के लिए सबसे सुरक्षित देश माना गया है. जनसंख्या की दृष्टि से स्वीडन इन देशों में सबसे बड़ा है. इस समय उसकी जनसंख्या है 99 लाख. वहां की सरकार अपने आप को संसार की पहली नारीवादी सरकार बताती है. मार्च 2018 में गठित मौजूदा मंत्रिमंडल में कैबिनेट स्तर की 12 महिला मंत्री और प्रधानमंत्री स्तेफ़ान ल्यौएफ़न सहित 11 पुरुष मंत्री हैं. तब भी स्वीडन महिलाओं के लिए जितना असुरक्षित इस समय है, उतना पहले कभी नहीं था. लंबे समय तक संसार का सबसे समाज-कल्याणकारी राज्य (वेलफ़ेयर स्टेट) कहलाने वाले स्वीडन की संसद ने, 1975 में, एकमत से यह निर्णय किया कि स्वीडन को अब एक ऐसे बहुसांस्कृतिक यानी एक ऐसे बहुजातीय मिश्रित समाज में बदल देना चाहिये, जिसमें अन्य देशों, धर्मों, संस्कृतियों से आये लोगों के लिए भी बराबरी का स्थान हो. उस समय स्वीडन की जनसंख्या 82 लाख थी. आदर्शवादिता से भरपूर यह प्रशंसनीय निर्णय जितना मानवतावादी था, समय के साथ उसके सामाजिक प्रभाव उतने ही अमानवीय रूप लेते गये हैं. स्वीडिश समाज अहिंसक से हिंसक बना इस निर्णय के बाद के 40 वर्षों में, यानी 2014 तक स्वीडन में जनसंख्या 19 प्रतिशत, हिंसात्मक अपराध 300 प्रतिशत और महिलाओं-बच्चों के साथ बलात्कार 1472 प्रतिशत बढ़ गये! प्रति एक लाख जनसंख्या पर बलात्कारों के अनुपात वाले पैमाने अनुसार दक्षिणवर्ती अफ्रीका में स्थित लेसोथों के बाद, स्वीडन ही लंबे समय तक बलात्कारों की सूची में संसार में दूसरे नंबर रहता था. अब यह स्थान शायद ब्रिटेन को मिल जायेगा. हुआ यह कि विदेशियों के प्रति उदारतापूर्ण स्वीडन के नये नियमों-क़ानूनों का लाभ उठाते हुए मुख्यतः तुर्की, सीरिया, इराक़, सोमालिया, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान जैसे अभावग्रस्त या संकटग्रस्त इस्लामी देशों के आप्रवासी और शरणार्थी भारी संख्या में वहां आ कर बसने लगे. स्वीडन के नियम-क़ानून किसी के उद्भव या धर्म को दर्ज करने की अनुमति नहीं देते, इसलिए कोई नहीं जानता कि कहां से किस धर्म या किस राष्ट्रीयता के कितने लोग वहां आ कर बस गये हैं. नागरिकता स्वीडिश, संस्कार इस्लामी प्रवासियों की पहली पीढ़ी की स्वीडन में जन्मी संतानों और बाद की पीढ़ियों को पूरी तरह स्वीडिश नागरिक माना जाता है, हालांकि इससे उनकी संस्कारगत सोच-समझ स्वीडिश नहीं बन जाती. अपनी महिलाओं को बुर्कानशीन देखने के आदी ये विदेशी, स्वीडिश महिलाओं के कथनानुसार ‘नीली आंखों वाली स्वर्णकेशी गौरवर्ण मूल स्वीडिश महिलाओं को देखते ही लार टपकाने लगते हैं.’ विदेशियों के रहने-बसने के लिए दरवाज़े खोल देने के बाद स्वीडन में छोटे-मोटे अपराधों के साथ-साथ यौनदुराचार और बलात्कार जैसे गंभीर अपराध भी तेज़ी से बढ़ने लगे. सरकार इसे दोटूक स्वीकार नहीं करती, पर जानती वह भी है. पर्दे की आड़ में इसे मानते सभी हैं. स्वीडन के सांख्यिकी कार्यालय ‘बीआरए’ के 28 जनवरी 2018 को प्रकाशित नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, 2017 में वहां बलात्कार के 7,320 मामले दर्ज किये गये, एक साल पहले की अपेक्षा 10 प्रतिशत अधिक. कहने की आवश्यकता नहीं कि स्वीडन में भी हर पीड़िता पुलिस के पास शिकायत करने नहीं जाती. केवल 11 प्रतिशत पीड़िताएं पुलिस के पास जाती हैं. पुलिस का हाल यह है कि स्वघोषित ‘शरिया पुलिस’ वालों के डर से देश के 61 स्थान उसके लिए ‘नो गो एरिया’ (वर्जित क्षेत्र) बन गये हैं. स्वीडन के राष्ट्रीय पुलिस कमिश्नर दान एलियाससोन ने राष्ट्रीय टेलीविज़न पर यह कह कर खलबली मचा दी कि पुलिस कानून का पालन करवाने की हालत में नहीं है, उसे देश की भली शक्तियों की सहायता चाहिये. स्वीडन के जानेमाने अराजकता विशेषज्ञ पत्रीक एन्गेलाउ ने चेतावनी दी, ‘मुझे डर है कि वह सुव्यवस्थित समतावादी स्वीडन, जिसे हम अब तक जानते थे, अब अपने अंतकाल में पहुंच गया है. निजी तौर पर मुझे कोई आश्चर्य नहीं होगा यदि किसी प्रकार का गृहयुद्ध छिड जाता है. कुछ जगहों पर गृहयुद्ध संभतः छिड़ भी चुका है.’ नारीवादियों की सरकार, हर दिन 20 बलात्कार 2017 में बलात्कार के 7,320 मामलों का अर्थ है कि महिला मंत्रियों की प्रधानता वाली स्वीडन की नारीवादी सरकार की नाक के नीचे हर दिन कम से कम 20 बलात्कार हो रहे हैं. स्वीडन की महिलाओं के बीच एक नये सर्वे से सामने आया कि हर दो में से एक महिला सार्वजनिक जगहों पर अपने साथ हिंसा या बलात्कार के डर से अपनी स्वतंत्रता बहुत सीमित हो गई देखती है. हर पांचवीं महिला को लगता है कि उसके साथ कभी भी बलात्कार हो सकता है. दिसंबर 2017 में स्वीडन के दूसरे सबसे बड़े शहर मालम्यौ में 17 वर्ष की एक युवती के साथ यही हुआ. शहर के ग़ैर-यूरोपीय विदेशियों की बहुलता वाले सोफ़ीलुंद मुहल्ले के एक खेल के मैदान के पास, तीसरे पहर तीन बजे, कई लोगों ने उसके साथ बर्बरतापूर्ण सामूहिक बलात्कार किया. बलात्कार के बाद उन्होंने उसके गुप्तांग पर कोई ज्वलनशील द्रव छिड़ कर आग लगा दी और भाग गये. युवती की जान बचा ली गयी है, पर जनवरी आने तक कोई पकड़ा नहीं जा सका था. बताया जाता है कि कई बलात्कारी आज तक पकड़े नहीं जा सके हैं. सामूहिक बलात्कार एक नया रुझान सामूहिक बलात्कार स्वीडन में एक नया रुझान है. अगस्त 2016 में राजधानी स्टाकहोम के एक उपनगर फ़ित्तया में इसका एक अवर्णनीय वीभत्स रूप देखने में आया था. 30 वर्ष की एक महिला के साथ संभवतः20 लोगों ने एक मकान की सीढ़ियों के पास न केवल जम कर बलात्कार किया बल्कि उसे लातों-मुक्कों से खूब मारा-पीटा, उसे छुरा भोंक कर मार डालने की धमकी दी. इन हमलावरों ने उसके सिर को फ़र्श पर तब तक पटका, जब तक वह बेहोश नहीं हो गयी. उसके चेहरे और बालों को वीर्य से सान दिया. घटनास्थल के पास का एक निवासी इसे देख रहा था, पर उसने पुलिस को ख़बर तक नहीं दी. होश आने के बाद वह महिला जैसे-तैसे उठी. सहायता पाने और पुलिस को बुलाने के लिए उसने एक फ्लैट की घंटी बजायी. पर जिस आदमी ने दरवाज़ा खोला, उसने उसे फटकार दिया. वह महिला तब फ़ित्तया के व्यापारिक केंद्र की तरफ पैदल चल पड़ी. वहां भी लोगों ने यह कहते हुए उसे दुत्कार दिया कि वह बहुत ही मैली-कुचैली और ‘’घिनौनी’’ दिख रही है. उसके ‘’बालों में वीर्य’’ भरा है. निराश हो कर उस महिला ने फ़ित्तया मेट्रो स्टेशन के सुरक्षा गार्ड से कुछ करने का अनुरोध किय. उसने भी मुंह फेर लिया. शर्मनाक दशा में मेट्रो से यात्रा कोई मदद पाने के लिए अंततः उस बेचारी को अपनी शर्मनाक दशा में मेट्रो ट्रेन से स्टाकहोम के मुख्य स्टेशन जना पड़ा. ज़रा सोचिये. सामूहिक बलात्कार की मर्मांतक पीड़ा, पीटे और पटके जाने की शारीरिक वेदना, बार-बार ठुकराये जाने की हताशा और ट्रेन में घृणाभाव से घूर-घूर कर देखे जाने के अपमान से घायल उस बेचारी महिला पर क्या-क्या बीती होगी. पुलिस ने इस बीच कई गिरफ्तारियां की हैं. हमलावर विदेशी मूल के बताये जाते हैं. उन्होंने बलात्कार का वीडियो भी बनाया है, जिस में वे भद्दी गालियां देते और ठहाके लगाते दिखते बताये जाते हैं. स्वीडन के टेलीविज़न और मुख्य धारा के मीडिया ने भी, जो अन्यथा ऐसे समाचार नहीं देते, इस वीभत्स बलात्कार के समाचर दिये. इस घटना से क्रुद्ध सैकड़ों लोगों ने प्रदर्शन भी किये. नारी राज में नारी नाराज़ स्वीडन के दैनिक ‘स्वेन्स्का दागेब्लात’ ने, नवंबर 2017 में, अपने कार्यस्थानों पर यौनदुराचार की भुक्तभोगी फ़िल्म और रंगमंच की 456 अभिनेत्रियों की आपबीती प्रकाशित की. कुछ ही दिन बाद 653 महिला गायिकाओं और और अन्य महिला कलाकारों ने भी अपने कटु अनुभव बताये. इन सभी महिलाओं ने फ़िल्म और रंगमंच जगत के निर्माताओं, निर्देशकों और साथ ही राजनेताओं पर भी आरोप लगाये कि वे ऐसे कार्यस्थान बनाने के अपने उत्तरदायित्व नहीं निभा रहे हैं, जहां महिलाएं अपने साथ दुराचार होने के भय से मुक्त रह सकें. प्रधानमंत्री स्तेफ़ान ल्यौएफ़न को भी स्वीकार करना पड़ा कि ‘समस्या उससे कहीं बड़ी हैं, जितनी समझी जा रही थी.’ पहली जुलाई 2018 से स्वीडन की नारीवादी सरकार ने देश में एक नया नारीवीदी क़ानून लागू किया है, जिसे ‘सहमति क़ानून’ नाम दिया गया है. इस क़ानून का कहना है कि बलात्कार का दोषी मान कर ऐसे हर पुरुष के विरुद्ध मुकदमा चलाया जा सकता है, जिसने शारीरिक संबंध के लिए पहले से ही अपने साथ की महिला की स्पष्ट सहमति नहीं प्राप्त की या जिसे महिला ने अपनी स्वीकृति का साफ़-साफ़ इशारा नहीं किया. इस क़ानून का पालन केवल विवाहेतर संबंधों के प्रसंग में ही नहीं, अविवाहित जोड़ों और विवाहित दंपतियों को भी हर शारीरिक संबंध से पहले करना होगा. नारीवादी सरकार भी बेबस आलोचक कहते हैं कि यह क़ानून स्त्री-पुरुष संबंधों की सारी स्वाभाविक मधुरता को कटुता में बदल देगा. वकीलों की राय है कि क्योंकि बाद में खड़े हो गये किसी विवाद की स्थिति में ‘पूर्वसहमति’ की पुष्टि करने वाला कोई गवाह नहीं होगा, इसलिए पुरुषों को चाहिये कि वे अपने साथ की महिला से, चाहे वह उनकी पत्नी ही क्यों न हो, हर बार लिखवा कर ले लें कि वह सहवास से सहमत है! कहने की आवश्यकता नहीं कि महिला मंत्रियों की प्रधानता वाली स्वीडन की नारीवादी सरकार भी किंकर्तव्यविमूढ़ है कि सुरसा के मुंह की तरह बढ़ते हुए बलात्कारों से देश की नारियों की रक्षा कैसे की जाए. जब स्वीडन जैसे मात्र 99 लाख जनसंख्या वाले छोटे, सुरम्य, सुशिक्षित, सुशासित और उच्च जीवनस्तर वाले भ्रष्टाचार-मुक्त देश के पास भी महिलाओं को यौनदुराचारों से बचाने का कोई कारगर उपाय नहीं है, तो भारत जैसे बड़े देश कौन-सा भाड़ फोड़ लेंगे! स्वीडिश कला और साहित्य जगत के उच्चपदस्थ बुद्धिजीवी भी अपने आस-पास की बड़ी संख्या में सुशिक्षित महिलाओं के साथ भी जब सभ्य व्यवहार नहीं कर पाते, तो भारत की सरकारों को कोसने-धिक्कारने वाले स्वदेशी-विदेशी, किसी रामबाण दवा जैसी कौन-सी ऐसी राजनैतिक-सामाजिक क्रांति लाना चाहते हैं, जिससे इस विश्वव्यापी असाध्य बीमारी की कम से कम रोकथाम ही हो जाये, उन्मूलन तो असंभव ही है।

चंदन तिलक का महत्त्व

हमारे धर्मं में चन्दन के तिलक का बहुत महत्व बताया गया है। शायद भारत के सिवा और कहीं भी मस्तक पर तिलक लगाने की प्रथा प्रचलित नहीं है। यह प्रथा अत्यंत प्राचीन है। माना जाता है कि मनुष्य के मस्तक के मध्य में विष्णु भगवान का निवास होता है और तिलक ठीक इसी स्थान पर लगाया जाता है। भगवान को चंदन अर्पण - भगवान को चंदन अर्पण करने का भाव यह है कि हमारा जीवन आपकी कृपा से सुगंध से भर जाए तथा हमारा व्यवहार शीतल रहे माने हम ठंडे दिमाग से काम करें। अक्सर उत्तेजना में काम बिगड़ता है। चंदन लगाने से उत्तेजना काबू में आती है। चंदन का तिलक ललाट पर या छोटी सी बिंदी के रूप में दोनों भौहों के मध्य लगाया जाता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण - मनोविज्ञान की दृष्टि से भी तिलक लगाना उपयोगी माना गया है। माथा चेहरे का केंद्रीय भाग होता है, जहाँ सबकी नजर अटकती है। उसके मध्य में तिलक लगाकर, देखने वाले की दृष्टि को बांधे रखने का प्रयत्न किया जाता है। तिलक का महत्व हिन्दू परंपरा में मस्तक पर तिलक लगाना शुभ माना जाता है इसे सात्विकता का प्रतीक माना जाता है। मस्तिष्क के भू-मध्य ललाट में जिस स्थान पर टीका या तिलक लगाया जाता है यह भाग आज्ञाचक्र है। शरीर शास्त्र के अनुसार पीनियल ग्रन्थि का स्थान होने की वजह से, जब पीनियल ग्रन्थि को उद्दीप्त किया जाता है तो मस्तिष्क के अन्दर एक तरह के प्रकाश की अनुभूति होती है। इसे प्रयोगों द्वारा प्रमाणित किया जा चुका है कि हमारे ऋषिगण इस बात को भलीभाँति जानते थे। पीनियल ग्रन्थि के उद्दीपन से आज्ञाचक्र का उद्दीपन होगा। इसी वजह से धार्मिक कर्मकाण्ड, पूजा-उपासना व शुभ कार्यों में टीका लगाने का प्रचलन से बार-बार उस के उद्दीपन से हमारे शरीर में स्थूल-सूक्ष्म अवयन जागृत हो सकें। इस आसान तरीके से सर्वसाधारण की रुचि धार्मिकता की ओर, आत्मिकता की ओर, तृतीय नेत्र जानकर इसके उन्मीलन की दिशा में किया गय प्रयास जिससे आज्ञाचक्र को नियमित उत्तेजना मिलती रहती है। शास्त्रों के अनुसार - शास्त्र के अनुसार माथे को इष्ट इष्ट देव का प्रतीक समझा जाता है। हमारे इष्ट देव की स्मृति हम पर सदैव बनी रहे इस तरह की धारणा क ध्यान में रखकर, ताकि मन में उस केन्द्र बिन्दु की स्मृति हो सके। शरीर व्यापी चेतना शनैःशनैः आज्ञाचक्र पर एकत्रित होती रहे। चुँकि चेतना सारे शरीर में फैली रहती है । अतः इसे तिलक या टीके के माध्यम से आज्ञाचक्र पर एकत्रित कर, तीसरे नेत्र को जागृत करा सकें ताकि हम परामानसिक जगत में प्रवेश कर सकें। चंदन लगाने के प्रकार - स्नान एवं धौत वस्त्र धारण करने के उपरांत वैष्णव ललाट पर ऊर्ध्वपुण्ड्र, शैव त्रिपुण्ड, गाणपत्य रोली या सिन्दूर का तिलक शाक्त एवं जैन क्रमशः लाल और केसरिया बिन्दु लगाते हैं। धार्मिक तिलक स्वयं के द्वारा लगाया जाता है जबकि सांस्कृतिक तिलक दूसरा लगाता है। नारद पुराण में उल्लेख आया है - १. ब्राह्मण को ऊर्ध्वपुण्ड्र २. क्षत्रिय को त्रिपुण्ड ३. वैश्य को अर्धचन्द्र ४. शुद्र को वर्तुलाकार चन्दन से ललाट को अंकित करना चाहिये। योगी सन्यासी ऋषि साधकों तथा इस विषय से संबंधित ग्रन्थों के अनुसार भृकुटि के मध्य भाग देदीप्यमान है। चंदन के प्रकार - १. हरि चंदन - पद्मपुराण के अनुसार तुलसी के काष्ठ को घिसकर उसमें कपूर, अररू या केसर के मिलाने से हरिचन्दन बनता है। २. गोपीचंदन- गोपीचंदन द्वारका के पास स्थित गोपी सरोवर की रज है, जिसे वैष्णवों में परम पवित्र माना जाता है। स्कन्द पुराण में उल्लेख आया है कि श्रीकृष्ण ने गोपियों की भक्ति से प्रभावित होकर द्वारका में गोपी सरोवर का निर्माण किया था, जिसमें स्नान करने से उनको सुन्दर का सदा सर्वदा के लिये स्नेह प्राप्त हुआ था। इसी भाव से अनुप्रेरित होकर वैष्णवों में गोपीचंदन का ऊर्ध्वपुण्ड्र मस्तक पर लगाया जाता है।

बच्चों के लिए 5 बेहतरीन जूस

1. बच्चों को चुकंदर का जूस पीने के लिए जरूर देना चाहिए। यह जूस भले ही पीने में अच्छा ना लगे, लेकिन यह जूस दिमाग तक जाने वाले रक्त प्रवाह को तेज करता है।चुकंदर आयरन, फोलिक एसिड, नाइट्रेट्स, बीटेन और मैग्नीशियम का एक अच्छा स्रोत है।  2. अनार के स्वास्थ्य लाभ असंख्य हैं।अनार में एंटीऑक्सिडेंट, एंटी वायरल और एंटी-ट्यूमर गुण होते हैं और इसे विटामिन, विशेष रूप से विटामिन ए, विटामिन सी, और विटामिन ई के साथ-साथ फोलिक एसिड का अच्छा स्रोत भी कहा जाता है। 3. टमाटर एंटीऑक्सिडेंट लाइकोपीन का प्रमुख आहार स्रोत है। जिससे हृदय रोग और कैंसर का खतरा कम है। ये विटामिन सी, विटामिन ए, विटामिन डी, पोटेशियम, फोलेट और विटामिन के का एक बड़ा स्रोत भी हैं। 4. एलोवेरा में पोषक तत्वों, जैसे विटामिन ए, विटामिन सी, विटामिन ई और विटामिन बी12, के साथ-साथ पोटेशियम, जस्ता, और मैग्नीशियम जैसे खनिजों में समृद्ध है। यह इम्यून सिस्टम को भी ठीक रखता है और मेटाबॉलिज्म को संतुलित करने में मदद करता है। 5. नारियल को ब्रेन फूड भी कहते हैं। वैसे कम लोगों को ही पता होगा कि हमारे ब्रेन को फैट की आवश्यकता होती है और नारियल में भरपूर मात्रा में फैट मौजूद होता है। इसका सेवन करने से दिमाग को तेज करने और फोकस बढ़ाने में मदद मिलती है।

पत्तो की महत्ता व सनातन

वैसे आपने कड़ी पत्ता, पत्तागोभी, तेजपत्ता, पुदीना, पालक, बेल पत्ता, हरे प्याज के पत्ते आदि का उपयोग तो किया ही होगा। पत्तों का उपयोग खाने, पूजा करने और घाव आदि पर लगाने में किया जाता है। हालांकि कुछ पत्ते ऐसे हैं जिन्हें शुभ और पवित्र मानकर उनका पूजा में उपयोग किया जाता है। ऐसे ही कुछ पत्ते की जानकारी यहाँ प्रस्तुत है... १. तुलसी पत्ता भगवान विष्णु को सबसे प्रिय है तुलसी का पत्ता। भगवान को जब भोग लगाते हैं या उन्हें जल अर्पित करते हैं तो उसमें तुलसी का एक पत्ता रखना जरूरी होता है। तुलसी का पत्ता खाते रहने से किसी भी प्रकार का रोग और शोक नहीं होता। तुलसी के पत्ते को शाम को नहीं तोड़ते। दूषित पानी में तुलसी की कुछ ताजी पत्तियां डालने से पानी का शुद्धिकरण किया जा सकता है। तांबे के लोटे में एक तुलसी का पत्ता डालकर ही रखना चाहिए। तांबा और तुलसी दोनों ही पानी को शुद्ध करने की क्षमता रखते हैं। २. बिल्वपत्र हिन्दू धर्म में बिल्व अथवा बेल (बिल्ला) पत्र भगवान शिव की आराधना का मुख्य अंग है। कहते हैं शिव को बिल्वपत्र चढ़ाने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या और किसी माह की संक्राति को बिल्वपत्र नहीं तोडऩा चाहिए। बिल्वपत्र का सेवन, त्रिदोष यानी वात (वायु), पित्त (ताप), कफ (शीत) व पाचन क्रिया के दोषों से पैदा बीमारियों से रक्षा करता है। यह त्वचा रोग और डायबिटीज के बुरे प्रभाव बढ़ने से भी रोकता है व तन के साथ मन को भी चुस्त-दुरुस्त रखता है। ३. पान का पत्ता पान को संस्कृत में तांबूल कहते हैं। इसका उपयोग पूजा में किया जाता है। दक्षिण भारत में तो पान के पत्ते के बीच पान का बीज एवं साथ ही एक रुपए का सिक्का रखकर भगवान को चढ़ाया जाता है, जबकि उत्तर भारत में पूजा की सुपारी के साथ एक रुपए का सिक्का चढ़ाया जाता है। कलश स्थापना में आम और पान के पत्तों का उपयोग होता है। प्राचीनकाल में पान का इस्तेमाल रक्तस्राव को रोकने के लिए किया जाता था। इसे खाने से भीतर कहीं बह रहा खून भी रुक जाता है। दूध के साथ पान का रस लिया जाए, तो पेशाब की रुकावट दूर हो जाती है। ४. केला के पत्ते केला का पत्ता हर धार्मिक कार्य में इस्तेमाल किया जाता रहा है। केले का पेड़ काफी पवित्र माना जाता है। भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को केले का भोग लगाया जाता है। केले के पत्तों में प्रसाद बांटा जाता है। माना जाता है कि समृद्धि के लिए केले के पेड़ की पूजा अच्छी होती है। केला रोचक, मधुर, शक्तिशाली, वीर्य व मांस बढ़ाने वाला, नेत्रदोष में हितकारी है। ५. आम के पत्ते अक्सर मांगलिक कार्यों में आम के पत्तों का इस्तेमाल मंडप, कलश आदि सजाने के कार्यों में किया जाता है। इसके पत्तों से द्वार, दीवार, यज्ञ आदि स्थानों को भी सजाया जाता है। तोरण, बांस के खंभे आदि में भी आम की पत्तियां लगाने की परंपरा है। घर के मुख्य द्वार पर आम की पत्तियां लटकाने से घर में प्रवेश करने वाले हर व्यक्ति के प्रवेश करने के साथ ही सकारात्मक ऊर्जा घर में आती है। आम के पेड़ की लकड़ियों का उपयोग समिधा के रूप में वैदिक काल से ही किया जा रहा है। माना जाता है कि आम की लकड़ी, घी, हवन सामग्री आदि के हवन में प्रयोग से वातावरण में सकारात्मकता बढ़ती है। वैज्ञानिक दृष्टि के अनुसार आम के पत्तों में डायबिटीज को दूर करने की क्षमता है। कैंसर और पाचन से संबंधित रोग में भी आम का पत्ता गुणकारी होता है। ६. सोम की पत्तियां सोम की पत्तियां प्राचीन काल में सभी देवी और देवताओं को अर्पित की जाती थी। वर्तमान में यह दुर्लभ है इसलिए इसका प्रचलन नहीं रहा। सोम की लताओं से निकले रस को सोमरस कहा जाता है। उल्लेखनीय है कि यह न तो भांग है और न ही किसी प्रकार की नशे की पत्तियां। सोम लताएं पर्वत श्रृंखलाओं में पाई जाती हैं। ७. शमी के पत्ते दशहरे पर खास तौर से सोना-चांदी के रूप में बांटी जाने वाली शमी की पत्त‍ियां, जिन्हें सफेद कीकर, खेजडो, समडी, शाई, बाबली, बली, चेत्त आदि भी कहा जाता है, हिन्दू धर्म की परंपरा में शामिल है। आयुर्वेद में भी शमी के वृक्ष का काफी महत्व बताया गया है। मान्यता अनुसार बुधवार के दिन गणेश जी को शमी के पत्ते अर्पित करने से तीक्ष्ण बुद्धि होती है। इसके साथ ही कलह का नाश होता है। ८. पीपल के पत्ते पीपल के पत्तों का भी हिंदू धर्म में खास महत्व है। जय श्री राम लिखकर पीपल के पत्तों की माला हनुमानजी को पहनाने से वे प्रसन्न हो जाते हैं। पीपल के पत्ते के और भी कई उपयोग हैं। ९. बड़ के पत्ते मान्यता अनुसार आटे का दीपक बनाकर बड़ के पत्तों पर रखकर उसे हनुमानजी मंदिर में रखा जाता है जिससे कर्ज से मुक्ति मिलती है। बड़ के पत्ते का भी पूजा में और भी कई उपयोग है।

मोहे गिरधर गोपाल : जन्माष्टमी विशेष

अदभुत देवेन्द्र सिकरवार का लेख अदभुत! ***************************************** #मो_मन_गिरिधर_छवि_पे_अटक्यो भारत अपने अधोपतन के कालखंड स...