Sunday, September 2, 2018

जन्म अष्टमी विशेष

भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की मध्यरात्रि को रोहिणी नक्षत्र व अष्टमी तिथि के संयोग से जयन्ती नामक सर्वाधिक शुभ योग में लगभग 3112 ई०पू० हुआ माना जाता है। संदर्भित मूल ग्रन्थों में वर्णित नक्षत्रों की गणना के आधार पर भगवान श्रीराम का अवतरण इनसे लगभग 2002 वर्ष पूर्व यानी 5114 ई०पू० हुआ माना जाता है। यह मानते हैं कि श्रीराम की 51वीं पीढ़ी के शल्य ने महाभारत के युद्ध में कौरवों की तरफ़ से हिस्सा लिया था..जबकि ख़ुद श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी ने अपनों के ही इस युद्ध में हिस्सा लेने से साफ़ इनकार कर दिया था..!! मानते हैं कि वसुदेव जी व देवकी माता के पुत्र वासुदेव श्रीकृष्ण को जन्म के समय ही उनके मामा कंस की वज़ह से नन्दगाँव के सरपँच नन्दगोप जी व यशोदा माता के पास पहुँचा दिया गया, जिन्होंने श्रीकृष्ण उर्फ़ गोपाल जी का पालन-पोषण किया..!! हमें श्रीकृष्ण के बाल्यकाल में उनकी (बाँके बिहारी जी) लीलाओं की खूब चर्चा सुनने को मिलती है। श्रीकृष्ण से उम्र में लगभग 5-6 वर्ष बड़ी राधा जी के बारे में हम सबने सुना है, पर आश्चर्यजनक रूप से राधा जी की चर्चा न हम महाभारत में सुनते हैं, न भागवत पुराण में..!! महाभारत में बस एक बार जिन राधा जी का जिक्र होता है, वह अँगराज कर्ण की पालक माता थीं। दरअसल राधा जी की चर्चा काफ़ी बाद के ग्रन्थों पद्मपुराण व ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलती है, जिनके आधार पर मध्यकाल या भक्तिकाल के संतों यथा निम्बार्क देव, चैतन्य प्रभु, वल्लभ देव इत्यादि ने श्रीराधा-कृष्ण के युग्म रूप का भरपूर महिमामंडन किया। इन भक्तिकाल के संतों ने राधा जी व कृष्ण जी के आध्यात्मिक प्रेम का तो वर्णन भक्ति संगीत के माध्यम से किया, पर श्रीकृष्ण के योद्धा रूप को भूल गए..!! माना जाता है कि श्रीकृष्ण अन्तिम बार जब राधा जी से मिले, तो श्रीकृष्ण की उम्र महज़ 11 वर्ष थी। उसके बाद श्रीकृष्ण यानी बाँके बिहारी जी की बाल-लीला समाप्त हुई व जिस उद्देश्य से उनका अवतरण द्वापर में हुआ था, वह उसकी पावन प्राप्ति में लग गए..!! ऐसा मानते हैं कि राधा जी की शादी कंस की सेना में कार्यरत रायण से हुई थी। ब्रह्मवैवर्त पुराण की जानकारी भी थोड़ी उलझन भरी है। ऐसा प्रतीत होता है कि बाद में क्षेपक जोड़, उसे और उलझा दिया गया। यह भी मानते हैं कि राधा जी ख़ुद ही श्रीकृष्ण का दूसरा रूप (श्रीलक्ष्मी) थीं। भले ही राधा जी के पिता वृषभानु जी (गोप या वैश्य) थे तथा माता कीर्ति जी थी वैसे, परन्तु उन्हें ईश्वर का अंश होने के नाते 'अयोनिजा' ही माना जाता है यानी जो किसी गर्भ से नहीं, वरन साक्षात अवतरित हुई थीं..!! इनसे सम्बन्धित भी एक कथा है, जिसकी चर्चा फिर कभी.. आधुनिक काल में सनातन के दुष्ट विरोधियों ने जानबूझकर श्रीकृष्ण की छवि को ख़राब करने के लिए ज़बरन उनके व राधा जी के बाल्यकाल के आध्यात्मिक प्रेम को उनके चरित्रहनन के लिए इस्तेमाल किया। इसी प्रकार जिस नरकासुर को मार कर श्रीकृष्ण ने लगभग 16000 कन्यायों को उससे छुड़वाया, उनसे भी उनका नाम गलत तरीक़े से जोड़ कर मज़ाक उड़ाने की कोशिश की जाती है। मध्यकाल में जब भारतभूमि लगातार आक्रान्ताओं व आंतरिक राजनीतिक-सामरिक उछलकूद से त्रस्त थी, तब श्रीकृष्ण की दार्शनिक, स्थिरप्रज्ञ, दूरद्रष्टा व योद्धा छवि को निखारने की बजाए..क्योंकर उनके बाल्यकालीन प्रेमी छवि को उभारा गया, यह वाकई सोचने को बाध्य करता है..!!!!! जहाँ सुदर्शन चक्र की जरूरत थी, वहाँ बाँसुरी बजाया जाने लगा..जबकि वक्त की माँग मध्यकाल में कुछ और थी। जब वीर रस की जरूरत थी, तो वहाँ शृंगार (श्रृंगार) रस पर बल दिया गया..!! ख़ैर..महाभारत के जितने भी प्रमुख पात्र हैं, यहाँ तक कि ख़ुद दुर्योधन भी..श्रीकृष्ण के महान चरित्र की प्रशंसा करते हैं। यहाँ तक कि उनसे चिढ़ा हुआ शिशुपाल भी उनके चरित्र पर कदापि उँगली नहीं उठाता.. श्रीकृष्ण की पटरानी विदर्भ के राजा रुक्मी की बहन रुक्मिणी थीं। जबकि श्रीकृष्ण के पितामह शूरसेन जी (वसुदेव जी के पिता) थे तथा बड़े भाई हलधर बलराम जी व बहन सुभद्रा जी थीं। उनके चचेरे भाइयों के नाम उद्धव व अंगिरस थे। श्रीकृष्ण जी की आयु लगभग 119 वर्ष आँकी गयी है.. यह विविध नामों से जाने गए..जैसे राजस्थान में श्रीनाथ जी या ठाकुर जी, महाराष्ट्र में विट्ठल जी, ओडिशा में जगन्नाथ जी, बंगाल में गोपाल जी, गुजरात में द्वारकाधीश, दक्षिण भारत में वेंकटेश जी या गोविन्दा जी, उत्तर भारत, पूर्वोत्तर भारत व नेपाल में श्रीकृष्ण जी आदि..!! भगवान श्रीकृष्ण के धनुष का नाम 'सारँग', शँख का नाम 'पाञ्चजन्य' व भगवान परशुराम जी द्वारा दिये गए चक्र का नाम 'सुदर्शन' था..!! और हाँ, श्रीराम हों या श्रीकृष्ण या फिर परशुराम जी, ये सारे लोग सनातन परम्परा के अंतर्गत ईश्वर के अवतार माने जाते हैं, न कि ईश्वर के धरती पर भेजे गए कोई दूत..इस बारीक अंतर को ध्यान में रखियेगा..!! साथ ही ईश्वर के अवतार को किसी भी जाति विशेष से जोड़कर अपनी क्षुद्रबुद्धि का परिचय कदापि न देंगे..ऐसा करके आप सनातन परम्परा का तो अपमान करते ही हैं, ख़ुद उन परमपिता परमेश्वर का भी अपमान करते हैं। याद रखें, वर्ण व्यवस्था कर्म-आधारित थी, न कि जन्म-आधारित..!! सुदर्शन चक्रधारी भगवान श्रीकृष्ण की जय हो..🙏

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