Wednesday, August 22, 2018
अटल मोदी व महाभारत
महाभारत काल के दौरान आप देखिए कि कौरवों को सिर्फ युधिष्टिर सबसे अच्छे लगते थे...!
जानते हैं क्यों...???
क्योंकि वो धर्मराज थे, हर कार्य को धर्म की कसौटी से ही देखा करते थे, सीधे थे, सरल थे, और कई बार धर्म का हवाला देकर और धार्मिक मान्यताओं के कारण अन्य पांडवों पर दबाव डालने में भी सफल रहते थे...!
कई ऐसे मौके और उदाहरण है, चाहे वनवास के लिए तैयार हो जाना हो, चाहे अज्ञातवास जैसी कठिन शर्त को सहर्ष तैयार हो जाना हो, चाहे पूरे राज्य को छोड़ 5 गांव मांगने का प्रस्ताव हो, चाहे द्रौपदी को जुए में दांव लगाने को तैयार हो जाना हो........युधिष्टिर हमेशा ही सर्व सुलभ होते थे, और अन्य पांडवों की अपेक्षा उन्हें मनाना आसान हुआ करता था, और धर्म के नाम पे तो उन्हें बड़ी आसानी से मिलाया जा सकता था...!
अब आइये ये जानते हैं कि कौन से पांडव से कौरव या दुर्योधन सबसे ज्यादा चिढ़ते थे...???
तो इसका उत्तर है अर्जुन और भीम...!
भीम से तो दुर्योधन का पुराना वैमनस्य था ही, दोनों ही गदा धारी थे और लगभग समान बलशाली भी थे, भीम थोड़े से आक्रामक भी थे, युधिष्टिर के लिहाज की वजह से वो मन मसोस कर रह जाते थे, अन्यथा तो वो अकेले ही सभी कौरवों को मारने में समर्थ थे.....और महाभारत के रण में ये काम उन्होंने किया भी था...!
अर्जुन हमेशा से ही कौरवों की आंखों में इसलिए खटकते रहे थे, क्योंकि वो गुरु द्रोणाचार्य के प्रिय भी थे और उन जैसा धनुर्धारी कोई था ही नही.........ऊपर से अर्जुन का सबसे बड़ा शत्रु कर्ण था, जो दुर्योधन का सबसे बड़ा मित्र था, लेकिन अर्जुन भी धर्मराज युधिष्टिर द्वारा बनाई गई मर्यादाओं में बंधे थे...!
लेकिन फर्क तब पड़ा जब पांडवों को श्रीकृष्ण का साथ मिला, कृष्ण ने ही अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया, धर्म और अधर्म का फर्क समझाया, उन्होंने ही ये समझाया कि धर्म की विजय के लिए जो तरीका अपनाना पड़े, अपनाना चाहिए...!
इसी वजह से अर्जुन को कई विजय प्राप्त हुई, इसी वजह से अर्जुन भीष्म पितामह पर विजय प्राप्त कर पाए, फिर जयद्रथ का संहार हो, या कर्ण का वध हो, ये सब कुछ तभी संभव था जबतक श्री कृष्ण अपनी लीला ना दिखाते और अर्जुन को धर्म-अधर्म के मायाजाल से ना निकालते...!
कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि कौरव युधिष्ठिर को इसलिए मानते थे, क्योंकि वो एक आसान से शिकार थे उनके लिए, उन्हें मनाना आसान था........वहीं ये लोग अर्जुन और भीम से इसलिए चिढ़ा करते थे, क्योंकि ये उन्ही के तौर तरीकों को इस्तेमाल करने में विश्वास किया करते थे...!
धर्म से धर्म और अधर्म से अधर्म को काटने की कला इन दोनों में ही थी, जिसमे श्री कृष्ण का भी योगदान था...!
अब जैसा कि आप लोगों ने भी देखा होगा कि जब से अटल जी देहावसान हुआ है तभी से अलग अलग चैनलो पर बहस, सोशल मीडिया पर अनगिनत पोस्ट, नाना प्रकार के तर्क कुतर्क किये जा रहे हैं...!
यदि विरोधियों के इन सब प्रपंच का सारांश निकालें तो यह बात निकलती है कि वाजपेयी जी एक अजातशत्रु थे...!
सभी पक्ष और विपक्ष के लोग उनका सम्मान करते थे...!
वे एक सर्वमान्य नेता थे जो सेक्युलर और लिबरल ढांचे में फिट होते थे...!
और इन्ही बातों के सहारे मोदीजी की सरकार और उनके अन्य नेताओं पर टीका टिप्पणी भी की गयी...!
सब मिलाकर कोई कोर कसर और मौका नही छोड़ा गया मोदीजी और उनकी सरकार को नीचा दिखाने का, जबकि चाहे मोदी जी हों, चाहे शाह हों, आडवाणी जी हों, राजनाथ सिंह जी हों या स्वयं वाजपेयी जी हों......इन सभी की विचारधारा एक ही रही है, हां समय और काल का फर्क इनके कार्यो पर जरूर दिख जाता है......और ये ठीक ही है...!
लेकिन इनकी चिढ़ का कारण क्या है मेरे समझ मे यही नहीं आ रहा है......वाजपेयी जी कर्म योगी थे, लेकिन वो राजनीत को एक धर्म मान कर चलते थे, इसमे उनकी कोई गलती नही थी, वो शायद गलत विपक्ष के बीच मे अवतरित हुए थे, उनके हर धर्म का जवाब विपक्ष ने अधर्म से दिया था...!
जोड़ तोड़ की सरकार को चिमटे तक से ना छूने वाले वाजपेयी जी को सत्ता का लालची बता कर, सारे अनैतिक रास्ते अपना कर कभी 13 दिन में कभी 13 महीने में, एक एक वोट से सरकार गिरा भारत को अनिश्चितता के दौर में धकेलने का दुष्कर्म इस अनैतिक विपक्ष ने ही किया था...!
सब कुछ सही हो कर भी, जनमत संदेश पा कर भी सत्ता से अपदस्थ किये जाने के बाद के वाजपेयी जी के बयानों को सुनिए.....उन्हें सत्ता का लालच तो नही था, लेकिन इस राजनीति द्युत के खेल में उन्हें हर बार विपक्ष के शकुनि छलते थे, और वे कातर दृष्टि से देखने के अलावा कुछ नही कर पाते थे...!
संसद में मजाक उड़ाया जाता था, कहा जाता था कि ये तो गायों के तबेले की पार्टी है........इन्हें जानता ही कौन है......हरियाणा से ऊपर और गुजरात से नीचे इन्हें पहचानता ही कौन है...?
2004 में हार के जो कारण रहे हो, लेकिन उससे आज की राजनीति के धर्मराज को ऐसा झटका लगा था कि कुछ सालों में वे सार्वजनिक जीवन से सन्यास ही ले बैठे, बोलना तक बिसार दिया...!
लेकिन ये विपक्षी शायद ये भूल गए थे कि कहीं भीम और अर्जुन तो पल रहे थे, बड़े हो रहे थे...!
10 साल के शासन के पश्चात 2014 में बाजी फिर से पलटती है, एक ऐसा नेता चुन कर आता है जिसे पिछले 12 सालो से हर दिन हर क्षण एक नई कसौटी पे परखा गया हो। जिसे जहां मौका लगा हो विपक्ष ने बेइज्जत करने का कोई मौका ना छोड़ा हो...!
और पहले ही दिन से विपक्षी खेमे में कोलाहल मच जाता है, उस इंसान से इतना डर कि हर दूसरे दिन कोई नया शिगूफा पैदा किया जाता है, ताकि उसकी बढ़ती मान्यता को कम किया जा सके...!
अरे ये तो चाय बेचने वाला है, अरे इसको गुजरात से बाहर जानता ही कौन है, अरे ये तो नीच है, मौत का सौदागर है, हिटलर है, फ़ासिस्ट है और ना जाने क्या क्या...!
लेकिन वो बदले में क्या करता है.........वो आपकी ही तरकीबो को इस्तेमाल करता है......वो भी साम दाम दण्ड भेद सब कुछ इस्तेमाल करता है और एक के बाद एक राज्यो से आपके नामो निशान हटाता जाता है.......आपको समझ ही नही आ रहा कि हो क्या रहा है...???
आप चिल्ला रहे हैं, चीख रहे है, तड़प रहे हैं, तिलमिला रहे है.......आप चाह रहे हैं कि कैसे इसका चक्रव्यूह तोड़ें......कैसे इससे बचें......कैसे अपने बचे हुए आधार को बचाए रखें...???
जब आपको मौके नही मिलते तो आप बनाने लगते हैं...........असहिंष्णुता का स्वांग रचते हैं.......फिर दलित हिंसा पर छाती पीटते हैं.....कभी अल्पसंख्यकों की याद आती है......कभी सेना की आड़ लेते हैं.........कभी व्यापारियों को चारा बनाते हैं, लेकिन कुछ नही होता...!
फिर आपको ये राजनीति बुरी लगने लगती है.......आपको वाजपेयी जी अच्छे लगने लगते हैं.....क्योंकि वे सौम्य थे.....सरल थे.....ईमानदार थे......आसानी से विश्वास कर लेते थे......आसानी से आपके चंगुल में फंस जाते थे...!
लेकिन ये नया योद्धा तो आपको आपकी ही भाषा मे जवाब देने में पारंगत है.....तो वो भला क्यों अच्छा लगेगा...!
खैर.....छोड़िये ये तो आदत है आपकी.......पहले मुखर्जी बुरे लगे, उन्हें गिरफ्तार किया और मरवा दिया, फिर आपको वाजपेयी और आडवाणी बुरे लगे.....धीरे धीरे वाजपेयी आपको अच्छे लगने लगे क्योंकि कोसने के लिए आडवाणी थे.....बाकि आपका व्यवहार दोनों के ही किये समान था.....आज मोदी हैं तो आपको वाजपेयी-आडवाणी की विरासत पे प्यार आता है...!
ये सब को मालूम है कि आज नहीं तो कल आपको मोदी भी भगवान सरीखे लगने लगेंगे जब वो अपनी राजनीतिक विरासत को अपने उत्तराधिकारी के कांधो पे रखेंगे......क्योंकि वो योद्धा तो आपको सांस भी नही लेने देगा......... क्या करें आप ही से तो सीखे हैं ये राजनीति के दांव पेंच......अब तो अमल में लाने शुरू किए है......आगे आगे देखिए होता है क्या...?
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
मोहे गिरधर गोपाल : जन्माष्टमी विशेष
अदभुत देवेन्द्र सिकरवार का लेख अदभुत! ***************************************** #मो_मन_गिरिधर_छवि_पे_अटक्यो भारत अपने अधोपतन के कालखंड स...
-
महाभारत को हम सही मायने में विश्व का प्रथम विश्वयुद्ध कह सकते हैं क्यूंकि शायद ही कोई ऐसा राज्य था जिसने इस युद्ध में भाग नहीं लिया। . आर...
-
विशेष रूप से जो मोटे लोग है, जिनको सर्दी जुकाम अक्सर हो जाता है,वह जरूर करें। लेडी पीपर ( पिप्पली ) चूर्ण लीजिये। पंसारी के यहां साबुत मि...
-
पुरुषों के शरीर में शुक्राणुओं की कमी का सीधा असर महिलाओं पर पड़ता है। इससे महिलाओं में फर्टिलिटी की समस्या हो जाती है। जिस व्यक्ति में शुक...
-
🕉दांतों में कीड़ा लग जाने पर रात्रि को दांत में हींग दबाकर सोएं। कीड़े खुद-ब-खुद निकल जाएंगे। 🕉यदि शरीर के किसी हिस्से में कांटा चुभ गया हो...
-
1. बच्चों को चुकंदर का जूस पीने के लिए जरूर देना चाहिए। यह जूस भले ही पीने में अच्छा ना लगे, लेकिन यह जूस दिमाग तक जाने वाले रक्त प्रवाह को...
-
।। बाल संस्कार ।। अपने बच्चों को निम्नलिखित श्लोकों को नित्य दैनन्दिनी में शामिल करने हेतु संस्कार दें एवं खुद भी पढें प्रात: कर-दर्शनम...
-
मोतियाबिंद/cataract मोतियाबिंद एक आम समस्या बनता जा रहा है, अब तो युवा भी इस रोग के शिकार होने लगे हैं। अगर इस रोग का समय रहते इलाज न ...
-
गले में किनती भी ख़राब से ख़राब बीमारी हो, कोई भी इन्फेक्शन हो, इसकी सबसे अच्छी दवा है हल्दी । जैसे गले में दर्द है, खरास है , गले मे...
-
भोजन का मन पर प्रभाव हमारे शरीर की वृद्धि, स्थिति और कार्यशक्ति जिस प्रकार भोजन पर आधारित है, वैसे ही हमारा मन भी भोजन से प्र...
-
🌿 घरेलू नुस्खे बिना किसी साइड इफेक्ट के कई बीमारियों को दूर करते हैं। पीढि़यों से चले आ रहे ये नुस्खे हमेशा से फायदेमंद साबित हुए है और शा...
No comments:
Post a Comment