Saturday, August 18, 2018

अटल विहारी वाजपेयी : एक महान योद्धा

वर्ष 1957 में जब अटल जी ने बलरामपुर से अपना पहला लोकसभा चुनाव जीता था, तब तक उन्होंने एक बार भी बलरामपुर की यात्रा नहीं की थी। इस चुनाव की भी बड़ी रोचक कहानी है। 1952 में जब पहले लोकसभा चुनाव हुए, तब पंडित जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल में शामिल दो कर्णधार अपनी स्वतंत्र पार्टियां बनाकर उनके विरुद्ध चुनाव लड़ रहे थे। डॉ. भीमराव आंबेडकर शेड्यूल्ड कास्ट फ़ेडरेशन की ओर से, जिसका नामकरण बाद में रिपब्लिकन पार्टी कर दिया गया। और पं. श्यामाप्रसाद मुखर्जी भारतीय जनसंघ से, जिसका गठन गांधी-वध के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लगाए गए प्रतिबंध के परिप्रेक्ष्य में एक राजनीतिक दल की आवश्यकता महसूस किए जाने पर किया गया था। कुल 489 सीटों पर लड़े गए चुनाव में नेहरू जी की कांग्रेस 364 सीटें जीत गईं। आंबेडकर की पार्टी को 2 और श्यामाप्रसाद जी की पार्टी को 3 ही सीटें मिलीं। अटल जी तब राजनीति में नहीं थे। वे लखनऊ से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका "राष्ट्रधर्म" में सम्पादक थे। वे एक पत्रकार के रूप में ही पं. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के सम्पर्क में आए थे और फिर उनके साथ निरंतर यात्राएं करने लगे। 1953 में कश्मीर में मुखर्जी की संदेहास्पद मृत्यु के बाद अटल जी के मन में पत्रकारिता के बजाय लोकप्रिय राजनीति का संकल्प सुदृढ़ हो गया। भारतीय जनसंघ का चुनाव चिह्न दीपक हुआ करता था। तब पार्टी के कार्यकर्तागण चुनाव प्रचार के तौर पर दीवारों पर चढ़कर दिया जलाते थे। अटल जी इन कार्यकर्ताओं में शामिल थे। किंतु अन्य कार्यकर्ताओं से अधिक वे एक ओजस्वी वक्ता भी थे। वर्ष 1957 में जब दूसरा लोकसभा चुनाव हुआ तो अटल जी को उनकी वक्तृता शैली के कारण ही चुनाव लड़ाने का निश्चय किया गया। तीन सांसदों वाली जनसंघ तब छोटी-सी पार्टी थी, जिसके क़द्दावर संस्थापक का देहांत हो चुका था। आचार्य देवप्रसाद घोष तब उसके अध्यक्ष थे। दीनदयाल उपाध्याय, बलराज मधोक, लालकृष्ण आडवाणी और अटल जी उसके कर्णधार थे। तय किया गया कि प्रखर वक्ता अटल जी को तीन सीटों से चुनाव लड़ाया जाएगा- मथुरा, लखनऊ और बलरामपुर। मथुरा से इसलिए कि पार्टी एक ऐसा उम्मीदवार खोज रही थी, जो ज़मानत ज़ब्त होने से बचा सके। जीत का तो सवाल ही नहीं था। लखनऊ से इसलिए कि अटल जी वहीं के निवासी थे और एक उपचुनाव में अच्छे वोट प्राप्त कर चुके थे। अलबत्ता जीत की उम्मीद यहां भी नगण्य थी। बलरामपुर से इसलिए कि वहां पर अवश्य पार्टी की स्थिति ठीक-ठाक मानी जा सकती थी। वहां पार्टी के कार्यकर्ता प्रतापनारायण तिवारी ने संगठन को मज़बूती प्रदान कर दी थी। एक और बात यह थी कि बलरामपुर में तब मुस्लिम ज़मींदारों का आधिपत्य था और उनके शोषण के शिकार छोटे किसानों की सहानुभूति पार्टी जीत सकती थी। अटल जी इससे पहले कभी बलरामपुर गए भी नहीं थे। "बिंदु-बिंदु विचार" में अटल जी ने लिखा है- "न मुझे बलरामपुर के भूगोल का कोई ज्ञान था, न इतिहास का। गोंडा से गोरखपुर के लिए छोटी लाइन जाती थी, बलरामपुर स्टेशन उसी पर स्थित था। आधी रात को रेलगाड़ी गोंडा से चलती थी और ब्रह्ममुहूर्त में बलरामपुर पहुंचती थी। मैं गोंडा से गाड़ी में चढ़ा और संकरी-सी बर्थ पर बिस्तर बिछाकर सो गया। आंख खुली तो गाड़ी एक स्टेशन पर खड़ी थी। खिड़की खोलकर देखा तो सैकड़ों कौए स्टेशन पर लगे पेड़ों पर कांव-कांव कर रहे थे। सारा आकाश गूंज रहा था। मैंने पूछा- यह कौन-सा स्टेशन है? उत्तर मिला- कौवापुर।" कौवापुर और इंटियाथोक के बीच ही नेपाल सीमा पर बलरामपुर था, जहां रेलगाड़ी के फ़र्श पर सोते हुए अटल जी चुनाव लड़ने पहुंचे थे। अटल जी ने लिखा है कि वहां पर मुस्लिम ज़मींदारों का ऐसा ख़ौफ़ था कि शंख-घड़ियाल बजाने पर भी रोक थी। जनसंघ की विचारधारा से वहां का उत्पीड़ित किसान वर्ग तुरंत जुड़ा। चुनाव हुए। मथुरा में ज़मानत नहीं बचाई जा सकी। लखनऊ में करारी हार मिली। किंतु बलरामपुर में विजयश्री ने अटल जी का प्रथम वरण किया। 1957 के चुनाव में भारतीय जनसंघ ने 4 सीटें जीती थीं। उनमें से एक बलरामपुर के सांसद अटल बिहारी वाजपेयी थे। शेष तीन सीटें हरदोई, धूलिया और रत्नागिरी से प्राप्त हुई थीं। जिस लोकसभा में पंडित जवाहरलाल नेहरू 371 सीटों के धुंआधार बहुमत से प्रधानमंत्री बने हों और उनके मंत्रिमंडल में मौलाना आज़ाद, गोविंदवल्लभ पंत, मोरारजी देसाई, जगजीवनराम जैसे मूर्धन्य हों, उसमें भारतीय जनसंघ के चारों सांसदों में जिस एक सांसद ने सबका, स्वयं प्रधानमंत्री का, ध्यान खींचा, उसका नाम अटल बिहारी वाजपेयी था। अपने पहले ही लोकसभा भाषण में अटल जी ने एक वाक्य कहा था- "बोलने के लिए वाणी चाहिए, किंतु चुप रहने के लिए वाणी और विवेक दोनों चाहिए।" इस एक बात ने पं. नेहरू का दिल जीत लिया था। पंडितजी अंग्रेज़ी में भाषण करते थे, किंतु उन्होंने अटल जी का नाम लेकर उनके द्वारा कही गई ये पंक्तियां हिंदी में दोहराईं और प्रभावी युवा नेता-वक्ता का अभिनंदन किया। वो 1957 था, उसके पूरे 42 साल बाद अटल जी को प्रधानमंत्री के उसी सिंहासन पर विराजमान होना था, जिस पर तब नेहरूजी आसीन थे। किंतु केवल 13 दिनों के लिए। चार दशक की तपस्या और तेरह दिन का राज, किंतु पराजय का वह क्षण अटल जी के प्रधानमंत्रित्व का अंत नहीं था, वास्तव में वह तो उसका यशस्वी शंखनाद था, पाञ्चजन्य के जयघोष से भरा। कवि, पत्रकार, स्वयंसेवक, कार्यकर्ता, जनप्रतिनिधि, सांसद, राजनेता, प्रधानमंत्री, गठबंधन सरकार के मुखिया - अटल-व्यक्तित्व को देखना हो तो इतने वैराट्य में ही देखना समीचीन होगा। और सत्ता का दम्भ सिर चढ़कर बोलने लगे, तो 3 सीटें जीतने वाली जनसंघ की गंगोत्री का स्मरण संसदीय राजनीति में विनम्रता बनाए रखने का निमित्त होगा, जिसके लिए युवा अटल जी ने दिये जलाए थे। इति शुभम्। 🙏 सुशोभित सक्तवत के फेसबुक से

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