Tuesday, July 17, 2018

इस संसार का शाश्वत सत्य केवल "मृत्यु" ही है

इस संसार का शाश्वत सत्य केवल "मृत्यु" ही है, जीवन मे कुछ भी होना पूर्ण संभावित नहीं है जबकि मृत्यु होना 100% संभावित है। एक न एक दिन मृत्यु सभी को आनी है। इस सच्चाई को जानते हुए भी हम मृत्यु से घबराते हैं। शरीर से प्राण निकलने के भी कई कारण होते हैं। यदि आध्यात्मिक रूप से देखा जाए तो मृत्यु का अर्थ है शरीर से प्राण अर्थात आत्मा का निकल जाना। इसके बिना शरीर सिर्फ भौतिक वस्तु रह जाता है। इसे ही मृत्यु कहते हैं। जबकि विज्ञान की दृष्टि से मृत्यु का अर्थ कुछ भिन्न है। उसके अनुसार शरीर में दो तरह की तरंगें होती हैं - पहली भौतिक तरंग और दूसरी मानसिक तरंग। जब किसी कारणवश इन दोनों का संपर्क टूट जाता है तो व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। साधारणत: मृत्यु 3 प्रकार से होती है - भौतिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक। किसी दुर्घटना या बीमारी से मृत्यु का होना भौतिक कारण की श्रेणी मे आता है। इस समय भौतिक तरंग अचानक मानसिक तरंगों का साथ छोड़ देती है और शरीर प्राण त्याग देता है। जब अचानक किसी ऐसी घटना-दुर्घटना के बारे मे सुनकर, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, मृत्यु होती है तो ऐसे समय मे भी भौतिक तरंगें मानसिक तरंगों से अलग हो जाती है और व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। यह मृत्यु का मानसिक कारण है। मृत्यु का तीसरा कारण आध्यात्मिक है। आध्यात्मिक साधना मे मानसिक तरंग का प्रवाह जब आध्यात्मिक प्रवाह मे समा जाता है, तब व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है क्योंकि भौतिक शरीर अर्थात भौतिक तरंग से मानसिक तरंग का तारतम्य टूट जाता है। ऋषि मुनियों ने इसे महामृत्यु कहा है। धर्म ग्रंथों के अनुसार महामृत्यु के बाद नया जन्म नहीं होता और आत्मा जीवन-मरण के बंधन से मुक्त हो जाती है। शस्त्रमेव जयते हर हर महादेव

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