Monday, July 9, 2018

चंदन तिलक का महत्त्व

हमारे धर्मं में चन्दन के तिलक का बहुत महत्व बताया गया है। शायद भारत के सिवा और कहीं भी मस्तक पर तिलक लगाने की प्रथा प्रचलित नहीं है। यह प्रथा अत्यंत प्राचीन है। माना जाता है कि मनुष्य के मस्तक के मध्य में विष्णु भगवान का निवास होता है और तिलक ठीक इसी स्थान पर लगाया जाता है। भगवान को चंदन अर्पण - भगवान को चंदन अर्पण करने का भाव यह है कि हमारा जीवन आपकी कृपा से सुगंध से भर जाए तथा हमारा व्यवहार शीतल रहे माने हम ठंडे दिमाग से काम करें। अक्सर उत्तेजना में काम बिगड़ता है। चंदन लगाने से उत्तेजना काबू में आती है। चंदन का तिलक ललाट पर या छोटी सी बिंदी के रूप में दोनों भौहों के मध्य लगाया जाता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण - मनोविज्ञान की दृष्टि से भी तिलक लगाना उपयोगी माना गया है। माथा चेहरे का केंद्रीय भाग होता है, जहाँ सबकी नजर अटकती है। उसके मध्य में तिलक लगाकर, देखने वाले की दृष्टि को बांधे रखने का प्रयत्न किया जाता है। तिलक का महत्व हिन्दू परंपरा में मस्तक पर तिलक लगाना शुभ माना जाता है इसे सात्विकता का प्रतीक माना जाता है। मस्तिष्क के भू-मध्य ललाट में जिस स्थान पर टीका या तिलक लगाया जाता है यह भाग आज्ञाचक्र है। शरीर शास्त्र के अनुसार पीनियल ग्रन्थि का स्थान होने की वजह से, जब पीनियल ग्रन्थि को उद्दीप्त किया जाता है तो मस्तिष्क के अन्दर एक तरह के प्रकाश की अनुभूति होती है। इसे प्रयोगों द्वारा प्रमाणित किया जा चुका है कि हमारे ऋषिगण इस बात को भलीभाँति जानते थे। पीनियल ग्रन्थि के उद्दीपन से आज्ञाचक्र का उद्दीपन होगा। इसी वजह से धार्मिक कर्मकाण्ड, पूजा-उपासना व शुभ कार्यों में टीका लगाने का प्रचलन से बार-बार उस के उद्दीपन से हमारे शरीर में स्थूल-सूक्ष्म अवयन जागृत हो सकें। इस आसान तरीके से सर्वसाधारण की रुचि धार्मिकता की ओर, आत्मिकता की ओर, तृतीय नेत्र जानकर इसके उन्मीलन की दिशा में किया गय प्रयास जिससे आज्ञाचक्र को नियमित उत्तेजना मिलती रहती है। शास्त्रों के अनुसार - शास्त्र के अनुसार माथे को इष्ट इष्ट देव का प्रतीक समझा जाता है। हमारे इष्ट देव की स्मृति हम पर सदैव बनी रहे इस तरह की धारणा क ध्यान में रखकर, ताकि मन में उस केन्द्र बिन्दु की स्मृति हो सके। शरीर व्यापी चेतना शनैःशनैः आज्ञाचक्र पर एकत्रित होती रहे। चुँकि चेतना सारे शरीर में फैली रहती है । अतः इसे तिलक या टीके के माध्यम से आज्ञाचक्र पर एकत्रित कर, तीसरे नेत्र को जागृत करा सकें ताकि हम परामानसिक जगत में प्रवेश कर सकें। चंदन लगाने के प्रकार - स्नान एवं धौत वस्त्र धारण करने के उपरांत वैष्णव ललाट पर ऊर्ध्वपुण्ड्र, शैव त्रिपुण्ड, गाणपत्य रोली या सिन्दूर का तिलक शाक्त एवं जैन क्रमशः लाल और केसरिया बिन्दु लगाते हैं। धार्मिक तिलक स्वयं के द्वारा लगाया जाता है जबकि सांस्कृतिक तिलक दूसरा लगाता है। नारद पुराण में उल्लेख आया है - १. ब्राह्मण को ऊर्ध्वपुण्ड्र २. क्षत्रिय को त्रिपुण्ड ३. वैश्य को अर्धचन्द्र ४. शुद्र को वर्तुलाकार चन्दन से ललाट को अंकित करना चाहिये। योगी सन्यासी ऋषि साधकों तथा इस विषय से संबंधित ग्रन्थों के अनुसार भृकुटि के मध्य भाग देदीप्यमान है। चंदन के प्रकार - १. हरि चंदन - पद्मपुराण के अनुसार तुलसी के काष्ठ को घिसकर उसमें कपूर, अररू या केसर के मिलाने से हरिचन्दन बनता है। २. गोपीचंदन- गोपीचंदन द्वारका के पास स्थित गोपी सरोवर की रज है, जिसे वैष्णवों में परम पवित्र माना जाता है। स्कन्द पुराण में उल्लेख आया है कि श्रीकृष्ण ने गोपियों की भक्ति से प्रभावित होकर द्वारका में गोपी सरोवर का निर्माण किया था, जिसमें स्नान करने से उनको सुन्दर का सदा सर्वदा के लिये स्नेह प्राप्त हुआ था। इसी भाव से अनुप्रेरित होकर वैष्णवों में गोपीचंदन का ऊर्ध्वपुण्ड्र मस्तक पर लगाया जाता है।

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